यह जान कर आपको षायद आश्चर्य होगा कि असुर शब्द सुर से पुराना है। ऋग्वेद में असुर हैं और देव हैं किन्तु सुर नहीं। असुर देवों से पूर्ववर्ती हैं। वरुण आकाश के देवता हैं और नैतिकता और न्याय के अधीक्षक हैं। वरुण को ऋग्वेद में असुर कहा गया है। ऋग्वेद के एक सूक्त में कहा गया है:
"महत्तं देवानाम् असुरत्वम् एकम्।"
(महान है देवों का असुरत्व)
पौराणिक काल में जब देवों को अच्छा और असुरों को बुरा माना जा चुका था किसी ने सुर शब्द (जिसका विलोम असुर बनेगा) का अाविष्कार किया।
आपको यह भी पता होगा कि हिन्दुओं के तीर्थ देवों के नाम पर हैं और उनकी पूजा-आराधना के लिए हैं। किन्तु प्रसिद्ध तीर्थ स्थान गया जहाँ लोग पूर्वजों का श्राद्ध करने के लिए जाते है, का नाम असुर गय यानी गयासुर के नाम पर है। सम्भवत: इस तीर्थ का मूल वैदिक काल में हो जब असुर इतने बुरे नहीं थे।
गयासुर की कहानी इस प्रकार है। प्राचीन काल में गय नामक एक असुर भगवान विष्णु को प्रसन्न करने के लिए घोर तप कर रहा था। विष्णु जब प्रसन्न होकर उसे वर देने के लिए आए, उसने केवल यह माँगा कि उसका शरीर सभी तीर्थों से अधिक पवित्र हो जाए। विष्णु ने उसे यह वर दिया जिसका फल बड़ा अाप्रत्याशिक हुआ। गय को देख कर ही लोग मुक्ति पा जाते थे तो देवताओं के लिए यज्ञ होने बन्द हो गए। बिना यज्ञ के देवगण क्षीण होने लगे। वे घबरा कर ब्रह्मा जी के पास गए। ब्रह्मा जी गय के पास गए और उन्होंने कहा कि यज्ञ के लिए कुछ पवित्र स्थल चाहिए और गय के शरीर जैसा पवित्र स्थल कहीं नहीं है। गय के सिर पर एक विशालकाय शिला रखी गई और ब्रह्मा, शिव आदि देवता शिला पर बैठ कर यज्ञ करने लगे किन्तु गय का शरीर अभी भी चलायमान था। अन्त में जब विष्णु भी शिला पर बैठे, गय स्थिर हो गया और उसने कहा कि जब तक यह धरती, ये पर्वत, सूर्य, चन्द्र और तारे हैं तब तक ब्रह्मा, विष्णु और शिव इस शिला पर विराजेंगे। इस तीर्थ का नाम मेरे नाम पर गया होगा। इस तीर्थ से समस्त मानव जाति का कल्याण होगा।
कहते हैं कि गया में जिसका श्राद्ध हो गया हो, उसका पुनर्जन्म नहीं होता। इसी लिए गया में श्राद्ध और पिंडदान के बाद फिर श्राद्ध की आवश्यकता नहीं होती। 'गया' शब्द एक क्रिया बन गया है। लोग कहते हैं कि वे अमुक व्यक्ति की गया करने गए हैं।
---लक्ष्मीनारायण गुप्त
---१९ जुलाई २०१२