अँखियों
के झरोखे से
देखते
थे जिसे कभी अँखियों के झरोखे
से,
आज
वही सामने खड़ी शरमा रही है।
शरमा
रही है, लरजा रही
है,
छुई
मुई सी बिन छुए ही सिकुड़ रही
है।
देखती
है मेरी तरफ यूँ दिलकश निगाहों
से,
या
ख़ुदा क़यामत की घड़ी आ रही
है।
बदन
कैसे लूँ आगोश में,
दुल्हन
मेरी आँखों से ओझल होती जा रही
है।
आँख
खुलती है, मालूम
होता है, लेटा हूँ
अकेले अपने बिस्तर पर,
केवल
अपने अकेलेपन की बू आ रही है।
क्या
पता था कि मेरी माशूका,
केवल
मेरे ख़्वाबों में आ जा रही
है।
देखते
थे जिसे कभी अंखियों के झरोखे
से,
ख़्वाबों
के झरोखे से नज़र आ रही है।
---लक्ष्मीनारायण
गुप्त
---१२
जून २०१२