Sunday, October 30, 2011

देव लोक में हाहाकार

देव लोक में मचा है हाहाकार
भारी संकट से सभी हैं लाचार

देवों की सुरक्षा के लिए आवश्यक
यज्ञ और हवन और सर्वाधिक सोम रस

सोम रस का हो गया है पृथ्वी पर लोप
हवन सामग्री पर है मिलावट का प्रकोप

यज्ञ भी लोग अब कहाँ करते हैं
वे तो मूर्तियों पर धन लुटाते हैं

परेशान हैं इन्द्र, अग्नि और वरुण
अश्विनीकुमार, चन्द्र, सूर्य और अरुण

ब्रह्मा का भी कट चुका है पत्ता
उनकी भी पूजा करता कोई अलबत्ता

शिव और विष्णु और उनके अवतार
लक्ष्मी और पार्वती का लगता दरबार

कुमार और गणपति हैं शेष के भागी
उनकी भी है काफी जनता अनुरागी

गायत्री मंत्र से बनी है सूर्य देव की हस्ती
करवा चौथ से है चन्द्र देव की पुष्टि

शेष देव हो गए हैं यदि मृत नहीं तो मृतक समान
भगवान भी नहीं रख रहे हैं उनका ध्यान

---लक्ष्मीनारायण गुप्त
---३० अक्टूबर २०११

























Sunday, October 16, 2011

मटका चतुर्दसी



कल करवा चौथ थी। हिन्दू सधवा महिलाएं पति की आयु वृद्धि के लिए यह व्रत सारे दिन रखती हैं और चाँद को देखने के बाद ही जल ग्रहण करती हैं। पति केवल मौज मस्ती करते हैं। कुछ सम्वेदनशील पतियों को लगता है कि पतियों को भी अपनी पत्नियों के लिए कुछ करना चाहिए। मेरा निम्न सुझाव इस कमी को पूरा करने का एक प्रयास है।

पतियों के लिए भी एक व्रत होना चाहिए जो करवा चौथ का चीनी यिन-यांग की तरह सम्पूरक (कॅाम्प्लीमेन्टरी) हो। मेरा सुझाव है कि पतियों को मटका चतुर्दसी का व्रत रखना चाहिए। यह व्रत ज्येष्ट बदी १४ के सायंकाल से लेकर अगले सूर्योदय तक यानी सारी रात रहेगा। करवे की जगह मटका रखा जाएगा और मोहल्ले के सारे पति एकत्र होकर मटका चतुर्दसी के माहात्म्य की कथा सुन कर सूर्य देव की आरती करने के बाद ही पानी पी सकेंगे। जेठ के महीने में कड़ाके की गर्मी होती है इसलिए मटके में कोई शीतल पेय रखा जा सकता है जो व्रत तोड़ने बाद पिया जा सकता है।

अब कथा कौन सी सुनाई जाएगी। इस कथा के विकास लिए कुछ समय चाहिए। प्रारंभ कुछ इस तरह हो सकता है। एक बार पवित्र नैमिषारण्य क्षेत्र में ऋषि मुनि एकत्र हुए और उन्होंने वैसम्पायन जी से निवेदन किया कि हे मुनिवर कलिकाल में पतियों का घोर पतन होगा और पत्नियों के प्रति उनकी सम्वेदनशीलता बहुत कम हो जाएगी। कृपया इसके निवारण का कोई उपाय बताइए। वैसम्पायन जी ने कहा, हे मुनियो एक व्रत है जो श्री रामचन्द्र जी ने त्रेता युग में अश्वमेध यज्ञ में सीता जी के पृथ्वी में समा जाने के बाद रखा था। सीता जी के पृथ्वी में समा जाने के बाद श्री राम को घोर पश्चाताप हुआ और वे बड़ी दीनता से विलाप करने लगे तब वशिष्ठ जी ने कृपा करके श्री राम को मटका चतुर्दसी का व्रत रखने को कहा। इस व्रत से श्री राम जी को बड़ी शान्ति प्राप्त हुई। यह व्रत काल गति से लुप्त हो चुका है किन्तु अब इस को पुन: प्रकट करने का समय आ गया है।

अब कोई ऐसी कहानी होनी चाहिए जिसमें पति के व्रत न रखने से पत्नी कि मृत्यु हो जाती है और फिर पति के पश्चाताप और वादा करने के बाद अगले साल वह अवश्य व्रत रखेगा, पत्नी फिर जीवित हो जाती है। पत्नी ने कहा बड़ी गहरी नींद आई। पति ने कहा, हाँ यदि मैं नहीं होता तो कभी नहीं टूटती।

पतियो, इस व्रत से तुम्हारा ही लाभ होगा। पत्नियाँ बड़ी दयालु होती हैं। सवेरा होते ही, भूख प्यास से अधमरे विचारे पति के लिए चाय, पूरी कचौरी, हलवा, इत्यादि बनाने लगेंगी। फिर एक मधुर चुम्बन देंगी और इसके बाद की चीज़ों की सम्भावना भी बढ़ सकती है।

हिन्दू धर्म में हमेशा नए व्रत ईज़ाद होते रहते हैं। मुझे याद है कि बचपन में सन्तोषी माँ का कोई व्रत नहीं था। जब मैं दस ग्यारह  साल का था, गाँव में कुछ पन्डों पुजारियों का आना शुरू हुआ और उन्होंने सन्तोषी माता और उनके व्रत की चर्चा शुरू की। इसके बाद सन्तोषी माता वाली पिक्चर आई। बाकी सब इतिहास है।

---लक्ष्मीनारायण गुप्त
---१६ अक्टूबर २०११



Friday, October 14, 2011

भ्रष्टाचार पर कुछ विचार


आज कल भारत में अन्ना हज़ारे का भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ अभियान चल रहा है। लोकपाल विधेयक की बात ज़ोर शोर से चल रही है। हर कोई भ्रष्टाचार विरोधी हो गया है। लेकिन ऐसा कैसे हो सकता है। लगता है कि भ्रष्टाचार लेने वाले भी भ्रष्टाचार विरोधी हो गए हैं। भ्रष्टाचारी लोग क्यों नहीं बोल रहे हैं कि भ्रष्टाचार उनका जन्मसिद्ध अधिकार है? यह अधिकार हमें अपनी परम्परा से मिला है। अरे! हम तो भगवान को भी घूस देते हैं। जब हम मनौती करते हैं कि भगवान मेरे बेटे को नौकरी दिला दो तो इतना चढ़ावा मन्दिर में चढ़ाऊँगा। यह घूस नहीं तो क्या है? अन्तर इतना है कि अॅाफीसर या पुलिस वाले को काम के पहले घूस देनी पड़ती है किन्तु भगवान को बाद में और भगवान हमसे घूस नहीं माँगते हैं , हम स्वत: देते हैं।

कई साल पहले किसी पत्रिका में एक लेख पढ़ा था जिसमें चीन और भारत में भ्रष्टाचार की तुलना की गई थी। फर्ज़ करिए कि आप एक फैक्टरी खोलना चाहते हैं। घुस आप को दोनों ही जगह देनी पड़ेगी।  चीन में एक बार घूस दे कर काम हो जाएगा; दो महीनों में आपकी फैक्टरी एप्रूव हो जाएगी। भारत में एक बार घूस देने के दो महीनों बाद  वह बन्दा आएगा और कहेगा कि साहब और पैसा लगेगा। जो काम चीन में दो महीने में हो जाता है उसके लिए भारत में एक साल लगेगा।

इस लिए मैं कहता हूँ कि भ्रष्टाचार उन्मूलन के पहले भ्रष्टाचार को एफीशिएन्ट बनाने की ज़रूरत है। अब यह कैसे किया जाए यह समझाने के लिए आपको एक उदाहरण देता हूँ। सन्१९२० के आस पास अमेरिका में शराब गैर कानूनी करार कर दी गई थी लेक लोग शराब तो पिएंगे ही तो सारे मुल्क में गैर कानूनी शराब धड़ल्ले से बिक रही थी। लोग कुछ दिन जेल काट आते थे और फिर धन्धा शुरू कर देते थे।   आखिरकार सरकार को शराब बेचना और खरीदना फिर से कानूनी करना पड़ा।

अमेरिका में शराब की लत की तरह भारतवासियों को भ्रष्टाचार की लत लग गई है। इस लिए इसको हटाना मुश्किल है किन्तु इसकी कुशलता बढ़ाई जा सकती है। हम कई कदम इस रास्ते पर ले सकते हैं। पहले तो भ्रष्टाचार पर लगे स्टिग्मा को ख़त्म किया जाय। घूस न कह कर उसे सुविधा शुल्क कहा जाय और उसकी दरें नियत कर दी जाएं। जैसे कि पुलिस में एफ़ आई आर दर्ज कराने के १००० रुपए लगेंगे आदि आदि। इससे हमारे जैसे लोग भी भ्रष्टाचार का फायदा उठा सकेंगे। हमें तो पता ही नहीं है कि घूस कैसे दी जाती है। डरते रहते हैं कि अगर अधिकारी किसी तरह ईमान दार है तो वह हमें घूस देने के ज़ुर्म में अन्दर करा देगा। मैंने ज़िन्दगी में केवल एक बार घूस दी है। मैं क़रीब ३० साल पहले की बात कर हूँ। भारत गया था; सामान मेरे साथ नहीं पहुँचा। कई दिन बाद जब सामान आया और मैं लेने गया तो कस्टम वाले ने कहा, "अरे, गुप्ता जी आप तो कुछ भी नहीं लाए। गेट पर खड़े आदमी को ४०० रुपए दे दीजिएगा।" मैंने सोचा कि यदि मैंने इन्कार किया तो यह सारा सामान सूटकेस से निकाल कर काउन्टर पर पटक देगा और मुझे घंटों तक तंग करेगा। तो मैं ४०० रुपए सुविधा शूल्क देकर चुपचाप निकल आया।

कुछ दिन पहले विक्रमचन्द्र का उपन्यास सैक्रेड गेम्स पढ़ा था। उसमैं मुम्बई पुलिस के बारे में बताया था। जब कोई अॅाफीसर घूस लेता है तो उसका कुछ हिस्सा सीनियर अधिकारियों को मिलता है, कुछ हिस्सा अॅाफिस के खर्चों के फन्ड में जाता है और बाकी घसख़ोर पुलिसवाले को मिलता है। अब यदि भ्रष्टाचार को कानूनी बना दिया जाय तो ५% सरकारी ख़ज़ाने में जा सकता है। लोग खुले आम घूस देकर काम करा सकते हैं। अधिकारी काम न करे तो आ उससे आप खुले आम कह सकते है कि आप घूस लेकर भी काम नहीं कर रहे हैं।

निवेदन है कि आप इस विचार का परिमार्जन और संशोधन करें। यह देशभक्ति का काम होगा।

---लक्ष्मीनारायण गुप्त
---१४ अक्टूबर २०११