Monday, March 28, 2011

भगवान को प्यारे


क्या अभी आपने सोचा है
जब कोई मर जाता है
कहते हैं भगवान को प्यारे हो गए
यदि आप किसी से कहें
कि फलाँ सख़्श भगवान
को प्यारा हो गया
तो वह यही समझेगा कि
वह सख़्श मर गया
यानी कि भगवान को प्यारा होना
और मर जाना एक ही बात है

भगवान का भजन करने वालों के लिए
यह कठिन सवाल उठता है
यदि आप बहुत ही निष्ठा से भजन करेंगे
तो भगवान को प्यारे लगने लगेंगे
और फिर आप भगवान को प्यारे हो जायेंगे
यानी कि मर जायेंगे

अब यह सत्य है कि किसी
को भी मरने का आइडिया
पसन्द नहीं आता
कोई आश्चर्य है कि
कोई बिरला ही
भगवान का सच्चा
भक्त होता है

---लक्ष्मीनारायण गुप्त
---२८ मार्च २०११

Wednesday, March 16, 2011

जीवन्मृत्यु




मजलिसों में दोस्तों की प्यार के गाने सुनाते रह गए
प्यार करने की जगह वे प्यार का इज़हार करते रह गए
था समन्दर प्यार का आगे मगर डूबने का ख़ौफ़ करते रह गए
बूँद तक पीने न पाए खारेपन के ख़ौफ़ से,
बदनसीबी अपनी को वे दोष देते रह गए

ज़िन्दगी में सभी ख़तरों से सदा डरते रहे
ज़िन्दगी मुर्दों की माफ़िक़ वे सदा जीते रहे
सभी ख़तरों से बचे पर हाय वे,
ज़िन्दगी के हर मज़े से हाथ धोते रह गए

हाथ फैलाया नहीं उनने किसीके सामने,
हाथ लेकिन किसीका भी पकड़ने से रह गए
मरने को मरते सभी संसार में,
लेकिन वे तो जीते जीते मर गए

---लक्ष्मीनारायण गुप्त
---१६ मार्च २०११

Friday, March 04, 2011

करि फुलेल को आचमन

आपने शायद बिहारी का यह दोहा सुना होगा:

करि फुलेल को आचमन मीठो कहत सराहि।
रे गंधी मतिमन्द तू इतर दिखावत काहिं।।

नीचे दिया कार्टून विचारों की सार्वभौमिकता का उदाहरण है। बिहारी का यही विचार इस कार्टूनिस्ट को भी आया है, तीन चार सौ साल बाद। देखिये:


इस कार्टून स्ट्रिप का नाम है, "विज़र्ड अॅाफ़ इड।"

---लक्ष्मीनारायण गुप्त
---४ मार्च २०११