Thursday, January 27, 2011

कलियुगी नारद-हरि सम्वाद

क्षीर सागर पर पहुँचे मुनि नारद
प्रभु ने कहा बैठिए विज्ञान विशारद
मृत्यु लोक के कुछ हाल बताइए
क्या हैं लोगों के सुख दु:ख फरमाइए

नारद बोले प्रभु आप को सब कुछ है ज्ञान
सेवक को फिर भी देते हैं सम्मान
पूछते हैं आप तो मैं बताता हूँ
नहीं तो मैं सदा आपही के गुण गाता हूँ

विज्ञान ने बड़ी तरक्की की है
शारीरिक श्रम की आवश्यकता बहुत कम कर दी है
फलस्वरूप मोटापा बहुत बढ़ रहा है
मोटापाजनित बीमारियाँ बढ़ रही हैं
मधुमेह, हृदय रोग, वात रोग
सबकी वृद्धि हो रही है
बिग फर्मा और डाक्टरों की चाँदी हो रही है

प्रभु बोले नारद, वत्स तुम अभी भी हो नादान
सबसे बड़ी समस्या का नहीं किया तुमने निदान
बोरडम से बड़ी कोई नहीं और समस्या है
इसके कारण इन्सान क्या क्या नहीं करता है

इस समस्या का मैंने किया है समाधान
मानव से करवाया इन्टरनेट ईजॅाद
समय नष्ट करने का अद्भुत साधन
कभी तुम कम्प्यूटर पर बैठे हो नारद

दूसरे मैंने बढ़ा दी उसकी बीमारियाँ
हृदय रोग, वात रोग, मधुमेह शर्तिया
मानव खोजता है इन्टरनेट पर इन मर्ज़ों का इलाज
या फिर करता है दर्द से प्रलाप
या करता है डाक्टरों और नर्सों की ज़िन्दगी तबाह
किन्तु उस परम असाध्य रोग से बच जाता है
बिस्तरे पर लेटे लेटे ऊब ऊब कर नहीं मरता है

नारद मुनि ने कहा प्रभु धन्य हैं आप
मूर्ख मानव करता है व्यर्थ प्रलाप
आप उसका भला ही करते हैं


जो कुछ करते हैं अच्छा ही करते हैं

---लक्ष्मीनारायण गुप्त
---२७ जनवरी २०११
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Monday, January 24, 2011

श्री राम कथा चालीसा



दोहा: जिन रघुबर की कृपा ते, मूक होंहिं वाचाल।
         बन्दहुँ उन रघुनाथ कहुँ, साहिब दीन दयाल।।

श्री रघुबीर कथा मैं गाऔँ। अन्य विचार न मैं उर लाऔं।।
जन्म लियो दसरथ के धामा। सब जन के सुख दाई रामा।।
मुनि हित मानि ताड़का मारी। तुम रघुनाथ दीन हितकारी।।
फिरि पद परस अहिल्या तारी। गौतम मुनि के पास सिधारी।।
भंजि चाप जानकी बियाही। परसुराम कर दाप मिटाई।।
अनरथ कियो कैकई माई। राज छोड़ि बनबासु देवाई।।
बाप का राज त्यागि तुम दीन्हो। हर्ष विषाद न कछु हिय कीन्हो।।
पुनि निषाद गृह आश्रय लीन्हाँ। दलित जनन कहँ आदरु दीन्हाँ।।
केवट कथा बहुत मन हारी। भगत जनन कहँ है अति प्यारी।।
भरत बोलावन तुम कहँ आयो। अति सनेह तुम उनहिं बुझायो।।
तुम करि कृपा पादुका दीन्ह्यो। मान सबन को प्रभु रखि लीन्ह्यो।।
खर दूषन को बध तुम कीन्हा। दंडक बनहिं सुरच्छित कीन्हा।।
सीय हरन जब रावन कीन्हा। तिय वियोग प्रभु तुम अति दुख कीन्हा।।
धन्य जटायू पंछी भाई। रघुपति हाथन किरिया पाई।।
शबरी नाम भीलनी रहई। छोट जाति जेहिं मानैं सबहीं।
तेहि के हाथ बेर तुम खाई। रघुपति तुम सब जन सुखदाई।।
पुनि सुग्रीव मिताई कीन्हा। बालिहिं मारि राजपद दीन्हा।।
हनूमान तब लंका जाई। सीता कै सब खबरि लगाई।।
हनुमति मुँदरी सीतहिं दियो। तपत हियो कछु सीतल कियो।।
तुम्हरिहि कृपा दीन हितकारी। हनूमान जब लंका जारी।।
अंगद दूत बनाइ पठावा। अरिहू को तुम मान निभावा।।
रावन शठ मानइ नहिं बाता। अनुज बिभीषन मारी लाता।।
लंका छाँड़ि प्रभुहिं पहिं आयो। तुम शरणागत ताहिं बनायो।
बहु विरोध सुग्रीवा कीन्हा। तेहिं परतोष प्रभू तुम कीन्हा।।
तुरतहिं तिलक बिभीषन कीन्हो। लंका केर राजि दै दीन्हो।
रावन संकर सीस चढ़ायो। अति सम्पदा तबै तेहिं पायो।।
वहि सम्पदा बिभीषन दीन्हो। तुम रघुनाथ सकुच बहु कीन्हो।।
बहु बिनती सागर कै कीन्हा। मारग देहि न जड़ हठ कीन्हा।।
रघुपति तब सागर पहिं कोपा। सोखहुँ सब जल जो मोहिं रोका।।
तब समुद्र प्रकटो हे भाई। सेतु बन्ध की राह बताई।।
तुम्हरी कृपा सुनौ रघुराई। पाथर तब जल पर उतराई।।
तब नल नील बँधाएहु सेतू। सुर नर मुनिन आचरज हेतू।।
सागर माँह सेतु तुम कीन्हा। रावन बहुत आचरज कीन्हा।।
थापन रामेश्वर कहँ कीन्हो। बैस्नौ शैव एकता चीन्हो।।
उतरा बानर कटक अपारा। कौन दृश्य यह बरननि पारा।।
लछिमन हृदय लाग जब बाना। धीरज त्यागि प्रभू बिलपाना।।
तब संजीवनि हनुमत लाए। लछिमन के तेहिं प्रान बचाए।।
मारि रावनहिं सीता लाए। अवधपुरी पुष्पक महिं आए।।
किरपा तब कैकइ तन कीन्ही। पुनि पुनि मिले सांत्वना दीन्ही।।
बहु सन्तोष भरत को भयो। राम चरन निज सिर को दयो।।
प्रभु सिंगासन बैठे जाई। सुर नर मुनि सब कीरति गाई।।
लक्ष्मीगुप्त कथा तव गाई। मो कहँ रघुपति होहु सहाई।।

दोहा: संछेपहिं रघुपति कथा, बरनेउँ मैं कर जोरि।
       कृपा करहु प्रभु दास पहिं, प्रभु मोरी मति थोरि।।

---लक्ष्मीनारायण गुप्त
---२४ जनवरी २०११