Sunday, October 30, 2011

देव लोक में हाहाकार

देव लोक में मचा है हाहाकार
भारी संकट से सभी हैं लाचार

देवों की सुरक्षा के लिए आवश्यक
यज्ञ और हवन और सर्वाधिक सोम रस

सोम रस का हो गया है पृथ्वी पर लोप
हवन सामग्री पर है मिलावट का प्रकोप

यज्ञ भी लोग अब कहाँ करते हैं
वे तो मूर्तियों पर धन लुटाते हैं

परेशान हैं इन्द्र, अग्नि और वरुण
अश्विनीकुमार, चन्द्र, सूर्य और अरुण

ब्रह्मा का भी कट चुका है पत्ता
उनकी भी पूजा करता कोई अलबत्ता

शिव और विष्णु और उनके अवतार
लक्ष्मी और पार्वती का लगता दरबार

कुमार और गणपति हैं शेष के भागी
उनकी भी है काफी जनता अनुरागी

गायत्री मंत्र से बनी है सूर्य देव की हस्ती
करवा चौथ से है चन्द्र देव की पुष्टि

शेष देव हो गए हैं यदि मृत नहीं तो मृतक समान
भगवान भी नहीं रख रहे हैं उनका ध्यान

---लक्ष्मीनारायण गुप्त
---३० अक्टूबर २०११

























5 comments:

Kunal Agrawal said...

great poem

Udan Tashtari said...

भगवान भी कितने लाचार हैं ......बेहतरीन!!

Anonymous said...

Guptaji: They say that the heaven and hell are all here. So your observation of 'hahakar in the heaven' is correct as Iwe can see all around us. The demonstration s near Wall Street and in so many places in America, Europe, in India, the ooh's and aah.s of the unemployed all give credence to your poem.
Good one.
-Anand

Anonymous said...

Ati sunder. Per Isme Krishan ka to kahin naam hi ahin hai. Lagta hai mujhe apna naam badal kar Laxmi rakhna parega. :)
-Krishan

Anonymous said...

आदरणीय, यह कविता यथार्थ दर्शाती है और मुझे बहुत अच्छी लगी. जिज्ञासा वश प्रश्न है: क्या यज्ञ और हवन में अंतर है?

सादर
मनोज