Sunday, October 16, 2011

मटका चतुर्दसी



कल करवा चौथ थी। हिन्दू सधवा महिलाएं पति की आयु वृद्धि के लिए यह व्रत सारे दिन रखती हैं और चाँद को देखने के बाद ही जल ग्रहण करती हैं। पति केवल मौज मस्ती करते हैं। कुछ सम्वेदनशील पतियों को लगता है कि पतियों को भी अपनी पत्नियों के लिए कुछ करना चाहिए। मेरा निम्न सुझाव इस कमी को पूरा करने का एक प्रयास है।

पतियों के लिए भी एक व्रत होना चाहिए जो करवा चौथ का चीनी यिन-यांग की तरह सम्पूरक (कॅाम्प्लीमेन्टरी) हो। मेरा सुझाव है कि पतियों को मटका चतुर्दसी का व्रत रखना चाहिए। यह व्रत ज्येष्ट बदी १४ के सायंकाल से लेकर अगले सूर्योदय तक यानी सारी रात रहेगा। करवे की जगह मटका रखा जाएगा और मोहल्ले के सारे पति एकत्र होकर मटका चतुर्दसी के माहात्म्य की कथा सुन कर सूर्य देव की आरती करने के बाद ही पानी पी सकेंगे। जेठ के महीने में कड़ाके की गर्मी होती है इसलिए मटके में कोई शीतल पेय रखा जा सकता है जो व्रत तोड़ने बाद पिया जा सकता है।

अब कथा कौन सी सुनाई जाएगी। इस कथा के विकास लिए कुछ समय चाहिए। प्रारंभ कुछ इस तरह हो सकता है। एक बार पवित्र नैमिषारण्य क्षेत्र में ऋषि मुनि एकत्र हुए और उन्होंने वैसम्पायन जी से निवेदन किया कि हे मुनिवर कलिकाल में पतियों का घोर पतन होगा और पत्नियों के प्रति उनकी सम्वेदनशीलता बहुत कम हो जाएगी। कृपया इसके निवारण का कोई उपाय बताइए। वैसम्पायन जी ने कहा, हे मुनियो एक व्रत है जो श्री रामचन्द्र जी ने त्रेता युग में अश्वमेध यज्ञ में सीता जी के पृथ्वी में समा जाने के बाद रखा था। सीता जी के पृथ्वी में समा जाने के बाद श्री राम को घोर पश्चाताप हुआ और वे बड़ी दीनता से विलाप करने लगे तब वशिष्ठ जी ने कृपा करके श्री राम को मटका चतुर्दसी का व्रत रखने को कहा। इस व्रत से श्री राम जी को बड़ी शान्ति प्राप्त हुई। यह व्रत काल गति से लुप्त हो चुका है किन्तु अब इस को पुन: प्रकट करने का समय आ गया है।

अब कोई ऐसी कहानी होनी चाहिए जिसमें पति के व्रत न रखने से पत्नी कि मृत्यु हो जाती है और फिर पति के पश्चाताप और वादा करने के बाद अगले साल वह अवश्य व्रत रखेगा, पत्नी फिर जीवित हो जाती है। पत्नी ने कहा बड़ी गहरी नींद आई। पति ने कहा, हाँ यदि मैं नहीं होता तो कभी नहीं टूटती।

पतियो, इस व्रत से तुम्हारा ही लाभ होगा। पत्नियाँ बड़ी दयालु होती हैं। सवेरा होते ही, भूख प्यास से अधमरे विचारे पति के लिए चाय, पूरी कचौरी, हलवा, इत्यादि बनाने लगेंगी। फिर एक मधुर चुम्बन देंगी और इसके बाद की चीज़ों की सम्भावना भी बढ़ सकती है।

हिन्दू धर्म में हमेशा नए व्रत ईज़ाद होते रहते हैं। मुझे याद है कि बचपन में सन्तोषी माँ का कोई व्रत नहीं था। जब मैं दस ग्यारह  साल का था, गाँव में कुछ पन्डों पुजारियों का आना शुरू हुआ और उन्होंने सन्तोषी माता और उनके व्रत की चर्चा शुरू की। इसके बाद सन्तोषी माता वाली पिक्चर आई। बाकी सब इतिहास है।

---लक्ष्मीनारायण गुप्त
---१६ अक्टूबर २०११



7 comments:

Udan Tashtari said...

हा हा!! आधे पति तो जान बूझ कर व्रत तोड़ देंगे मटका चतुर्दसी का. :)

Anonymous said...

"अब कोई ऐसी कहानी होनी चाहिए जिसमें पति के व्रत न रखने से पत्नी कि मृत्यु हो जाती है और फिर पति के पश्चाताप और वादा करने के बाद अगले साल वह अवश्य व्रत रखेगा, पत्नी फिर जीवित हो जाती है।"
गुप्ताजी :
कुछ लोग तो हर साल ही व्रत नहीं रखना चाहेंगे. "अच्छी गयी, ऐश करो, मटका भर खीर खाओ," कहेंगे. यह तो बडा अन्याय होगा.
-मिश्रा

Anonymous said...

लक्ष्मी जी बाकी तो खैर पुराने हैं हाँ सन्तोषी माँ के बारे में सर्वविदित है कि इस नाम की कोई देवी हिन्दू धर्म में है ही नहीं। किसी हिन्दू ग्रन्थ में इस नाम की देवी का कोई उल्लेख नहीं है। हमारे बड़े बताते हैं कि कुछ सालों पहले सन्तोषी माँ की सुपरहिट फिल्म आयी थी, शायद गुलशन कुमार की, उसी से यह देवी चल पड़ी, व्रत कथायें छप गयी और बिकने लगीं। स्त्रियाँ मंदिरों में पूछने लगीं कि सन्तोषी माता की मूर्ति क्यों नहीं है, उनकी अनुशंसा पर मूर्ति लगायी जाने लगी।

आगे पिताजी बताते हैं कि यह शब्द सन्तोषी पुल्लिंग है, इसका स्त्रीलिंग सन्तोषिणी बनेगा, इसलिये किसी देवी का नाम हो भी नहीं सकता।
ई-पंडित (श्रीश शर्मा)

Anonymous said...

जहां तक में समझा हूं "महिलाएं पति की आयु वृद्धि के लिए यह व्रत सारे दिन रखती हैं " ये तो हिन्दू धरम का हिस्सा हॆ लेकिन "मेरा सुझाव है कि पतियों को मटका चतुर्दसी का व्रत रखना चाहिए" ये तो आपकी तजवीज़ हॆ. एक तो भगवान का हुक्म दूसरा आपका सुझाव ये दोनो बराबर नही होसकते.
आपने कहा "हिन्दू धर्म में हमेशा नए व्रत ईज़ाद होते रहते हैं। " ईजाद होने से कोई पूजा धरम का हिस्स नही बन जाती.
मुसलमानो में इस पर इत्तफ़ा हॆ के Prophet Mohammad की ज़िन्दगी में जो होता रहा वोही मज़हब हॆ, उस के बद कि चीज़ेण अच्छी हों या बुरी मज़हब का हिस्सा नहीं होअसकतीं.
आपकी तजावीज़ या सुझाव बोहोत अच्छ ऒर कार आमद हें , इस्से मोअब्बत बढ़े गी ( It is gesture of goodwill )
, इसे ऎसे ही क़बूल करलेना चाहिये बगेर धरम में शामिल किये
मुझे ख़तरा हॆ के लोग आपको criticize करें गे हिन्दू धरम में तबदीलियों के लिये

---कलीम उल्लाह

Anonymous said...

यह मजाक है अच्छा है .....ठीक है....महिलाए भी क्यों करे उपवास...उन्हें भी बक्श दो....


स्व. गुलशन कुमार ने फिल्म बनाई....मन से नही बनाई.... क्योकि कोई भी इतना कल्पनाशील या मौलिक रचना लिखने का आदि नही है...सब कॉपी-पेस्ट चलता है.... और फिल्मो का असर इतना कब से होने लगा की कि लोग वहा से अपनी धार्मिक भावनाओ को ग्रहण करे....दूसरी बहुत सी फालतू बातें जरुर ले सकते है....
आप भी है.. कुछ तो भी थेओरी कही से भी दिमाग दौड़ा के लगा लाये...खेर अच्छा है बात करने का कोई बहाना अच्छा है....


धृष्टता के लिए क्षमा चाहूँगा.....

---ललित कर्मा

अभय तिवारी said...

बढ़िया है! :)

Anonymous said...

Prof. Gupta has a point. If there is Karwa Chauth for women, there should be something like Matka Chaturdashi for men. Time to remove inequalities from "religion".

---Raman Kaul