आज कल भारत में अन्ना हज़ारे का भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ अभियान चल रहा है। लोकपाल विधेयक की बात ज़ोर शोर से चल रही है। हर कोई भ्रष्टाचार विरोधी हो गया है। लेकिन ऐसा कैसे हो सकता है। लगता है कि भ्रष्टाचार लेने वाले भी भ्रष्टाचार विरोधी हो गए हैं। भ्रष्टाचारी लोग क्यों नहीं बोल रहे हैं कि भ्रष्टाचार उनका जन्मसिद्ध अधिकार है? यह अधिकार हमें अपनी परम्परा से मिला है। अरे! हम तो भगवान को भी घूस देते हैं। जब हम मनौती करते हैं कि भगवान मेरे बेटे को नौकरी दिला दो तो इतना चढ़ावा मन्दिर में चढ़ाऊँगा। यह घूस नहीं तो क्या है? अन्तर इतना है कि अॅाफीसर या पुलिस वाले को काम के पहले घूस देनी पड़ती है किन्तु भगवान को बाद में और भगवान हमसे घूस नहीं माँगते हैं , हम स्वत: देते हैं।
कई साल पहले किसी पत्रिका में एक लेख पढ़ा था जिसमें चीन और भारत में भ्रष्टाचार की तुलना की गई थी। फर्ज़ करिए कि आप एक फैक्टरी खोलना चाहते हैं। घुस आप को दोनों ही जगह देनी पड़ेगी। चीन में एक बार घूस दे कर काम हो जाएगा; दो महीनों में आपकी फैक्टरी एप्रूव हो जाएगी। भारत में एक बार घूस देने के दो महीनों बाद वह बन्दा आएगा और कहेगा कि साहब और पैसा लगेगा। जो काम चीन में दो महीने में हो जाता है उसके लिए भारत में एक साल लगेगा।
इस लिए मैं कहता हूँ कि भ्रष्टाचार उन्मूलन के पहले भ्रष्टाचार को एफीशिएन्ट बनाने की ज़रूरत है। अब यह कैसे किया जाए यह समझाने के लिए आपको एक उदाहरण देता हूँ। सन्१९२० के आस पास अमेरिका में शराब गैर कानूनी करार कर दी गई थी लेक लोग शराब तो पिएंगे ही तो सारे मुल्क में गैर कानूनी शराब धड़ल्ले से बिक रही थी। लोग कुछ दिन जेल काट आते थे और फिर धन्धा शुरू कर देते थे। आखिरकार सरकार को शराब बेचना और खरीदना फिर से कानूनी करना पड़ा।
अमेरिका में शराब की लत की तरह भारतवासियों को भ्रष्टाचार की लत लग गई है। इस लिए इसको हटाना मुश्किल है किन्तु इसकी कुशलता बढ़ाई जा सकती है। हम कई कदम इस रास्ते पर ले सकते हैं। पहले तो भ्रष्टाचार पर लगे स्टिग्मा को ख़त्म किया जाय। घूस न कह कर उसे सुविधा शुल्क कहा जाय और उसकी दरें नियत कर दी जाएं। जैसे कि पुलिस में एफ़ आई आर दर्ज कराने के १००० रुपए लगेंगे आदि आदि। इससे हमारे जैसे लोग भी भ्रष्टाचार का फायदा उठा सकेंगे। हमें तो पता ही नहीं है कि घूस कैसे दी जाती है। डरते रहते हैं कि अगर अधिकारी किसी तरह ईमान दार है तो वह हमें घूस देने के ज़ुर्म में अन्दर करा देगा। मैंने ज़िन्दगी में केवल एक बार घूस दी है। मैं क़रीब ३० साल पहले की बात कर हूँ। भारत गया था; सामान मेरे साथ नहीं पहुँचा। कई दिन बाद जब सामान आया और मैं लेने गया तो कस्टम वाले ने कहा, "अरे, गुप्ता जी आप तो कुछ भी नहीं लाए। गेट पर खड़े आदमी को ४०० रुपए दे दीजिएगा।" मैंने सोचा कि यदि मैंने इन्कार किया तो यह सारा सामान सूटकेस से निकाल कर काउन्टर पर पटक देगा और मुझे घंटों तक तंग करेगा। तो मैं ४०० रुपए सुविधा शूल्क देकर चुपचाप निकल आया।
कुछ दिन पहले विक्रमचन्द्र का उपन्यास सैक्रेड गेम्स पढ़ा था। उसमैं मुम्बई पुलिस के बारे में बताया था। जब कोई अॅाफीसर घूस लेता है तो उसका कुछ हिस्सा सीनियर अधिकारियों को मिलता है, कुछ हिस्सा अॅाफिस के खर्चों के फन्ड में जाता है और बाकी घसख़ोर पुलिसवाले को मिलता है। अब यदि भ्रष्टाचार को कानूनी बना दिया जाय तो ५% सरकारी ख़ज़ाने में जा सकता है। लोग खुले आम घूस देकर काम करा सकते हैं। अधिकारी काम न करे तो आ उससे आप खुले आम कह सकते है कि आप घूस लेकर भी काम नहीं कर रहे हैं।
निवेदन है कि आप इस विचार का परिमार्जन और संशोधन करें। यह देशभक्ति का काम होगा।
---लक्ष्मीनारायण गुप्त
---१४ अक्टूबर २०११
4 comments:
How funny...
ashutosh maadhav
CORRUPTION IS A SERIOUS PROBLEM, AN EPIDEMIC,WE ALL NEED TO FIGHT AGAINST IT AND TO NOT GIVE SUCH UNDESIRED COMMENTS.
Jai Prakash Bhatia
Corruption एक ऎसी बुराई हॆ जो मोआशरे को घुन की तराह खा जाती हॆ, इसकी बड़ी वजाह क़ानून पर अमल दरामद न होना हॆ.जब कोई पकड़ा ही नही जाए गा तो डर कॆसा, (रिशवत लेने में पक्ड़ा जा ऒर रिशवत दे कर छुट जा). मुझे बोहॊत पेहले का ज़माना याद हॆ जब लोग रिशवत लेकर डरे डरे रेहते थे, रिशवत की कमाई से अपना घर या फ़रनीचर नहीं ख़रीद सकते थे के पुलिस पकड़ लेगी. फिर ये ज़माना आया रिशवत को अपना हक़ समझने लगे ऒर दुआ में भी इस हराम की कमाई में बरकत मांगने लगे
वाए नाकामी मताए कारवां जाता रहा
कारवां के दिल से ऎहसासे ज़ियां जाता रहा
लोग ये कॆहते हें के सख़्त क़ानून होने चाहियें मगर हक़ीक़त ये हॆ के सज़ा आधी भि होजाए मगर मुजरिम पकड़ा ज़रूर जए तो बोहॊत फ़र्क़ पड़े गा. ये बोहॊत बड़ी बुराई हॆ ओर इस को Seriously लेना चाहिये
Drinking, adultery, illegitimate babies cannot be compared with bribery, theft, burglary.
जो दुनिया का मालिक हॆ वोह तो इनसान की शेह रग से भी क़रीब हॆ उस को चढ़ावे की किया ज़रूरत वोह तो सिर्फ़ दुआ मांगने से ही बनदे की ज़रूरत पूरी करदेता हॆ ये बात तो Religious scholar ही लोगों को समझा सकते हॆं.
The idea of Facilitation Fee does appear practical. Problem is that for those used to taking Bribe, it will finally turn out to be their right (like a raise to monthly pay) and they will continue to expect more than the right which is perhaps the definition of Bribe.
I sort of disagree with you for the analogy between Introduction and Withdrawal of Prohibition in US with the solution of Corruption. Corruption relates to moral/social values while Drinking more to physical than social or moral vslues.
Uncle Gaur
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