(बिन लादन की पत्नियाँ अभी भी रो रही हैं किन्तु उनका दृष्टिकोण कुछ बदल रहा है।)
तेरे बिन लादन लागे न जीया हमार।
बार बार तोहें का समझाऊँ, गोलिन की भरमार।
तुमका मिलिहैं बहत्तर हूरैं, हमरी का दरकार।
तेरे बिन लादन---
तुम्हरे परी ओसामा, ओबामा की मार।
पाँच बीवियाँ, चालिस बच्चा, अब का करिहैं यार।
सबकै माटी पलीद कराई, करि जिहाद को वार।
तेरे बिन लादन---
अब हम कहाँ जायँ का करिहैं, हमैं बताऔ यार।
नफरत कै दुनिया फैलाई, तुम जिहाद करि यार।
सरग गए की नरक गए तुम, अब हम करैं विचार।
सरग गए तो डियर ओसामा, हूरन की भरमार।
नरक गए तो करम फूटिगे, अब तुम्हरे भरतार।
तात तेल माँ जाव खौलाए, मरे न मरिहौ यार।
तेरे बिन लादन---
---लक्ष्मीनारायण गुप्त
---१३ मई २०११
7 comments:
रोचक कविता। पढ़कर मज़ा आ गया।
Marvelous ! keep on brother ; you are cooking good.'Habeeb'/usa/jio
Guptaji: Very good.
The language (Awadhi?) you chose to write this makes it much more enjoyable. Keep it up with the good work.
-Anand
सुंदर!
अब खड़ी बोली में भी--
हमको छोड़ गए बिन लादेन दिन अब कैसे गुज़रेंगे
उनको मिलीं बहत्तर उन बिन दिन अब कैसे गुज़रेंगे.
--ख़लिश
मजे आय गया लक्ष्मी भैया! बहुत दिन के बाद आये इहां!
रोचक प्रस्तुति
अच्छा लगा।
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