Wednesday, March 16, 2011

जीवन्मृत्यु




मजलिसों में दोस्तों की प्यार के गाने सुनाते रह गए
प्यार करने की जगह वे प्यार का इज़हार करते रह गए
था समन्दर प्यार का आगे मगर डूबने का ख़ौफ़ करते रह गए
बूँद तक पीने न पाए खारेपन के ख़ौफ़ से,
बदनसीबी अपनी को वे दोष देते रह गए

ज़िन्दगी में सभी ख़तरों से सदा डरते रहे
ज़िन्दगी मुर्दों की माफ़िक़ वे सदा जीते रहे
सभी ख़तरों से बचे पर हाय वे,
ज़िन्दगी के हर मज़े से हाथ धोते रह गए

हाथ फैलाया नहीं उनने किसीके सामने,
हाथ लेकिन किसीका भी पकड़ने से रह गए
मरने को मरते सभी संसार में,
लेकिन वे तो जीते जीते मर गए

---लक्ष्मीनारायण गुप्त
---१६ मार्च २०११

14 comments:

Udan Tashtari said...

हाथ फैलाया नहीं उनने किसीके सामने,
हाथ लेकिन किसीका भी पकड़ने से रह गए
मरने को मरते सभी संसार में,
लेकिन वे तो जीते जीते मर गए

वाह!! बहुत बेहतरीन..

Anonymous said...

Dear Laxmi,

I do not know what inspired you to write this poem - but it is a very nice poem.

Ishwar Mathur

आशुतोष said...

मरने को मरते सभी संसार में,
लेकिन वे तो जीते जीते मर गए
......................
उत्तम रचना सुन्दर अभिव्यक्ति .

Anonymous said...

Guptaji:

It is a beautiful poem.
हाथ फैलाया नहीं उनने किसीके सामने,
हाथ लेकिन किसीका भी पकड़ने से रह गए
What a thought- in pride love becoming a casualty!

S. Anand Mishra

Anonymous said...

nice poem.

Best Regards,

Kunal Chandra Agrawal

Anonymous said...

Life and death are two sides of the same coin and it feels like the coin stood up on its side in this toss.
-Krishan Mago.

Anonymous said...

Sir, beautiful poems and extremely good collection of books from Kaka in Avadhi

Alok Misra

Laxmi N. Gupta said...
This comment has been removed by the author.
Anonymous said...

Sacchayee hai dost, lekin mujhe aapki hasaya-kritiyaN pasand haiN.Jio.

---Roophans "habib"

Chand said...

This is good one. Krishan I do not see coin standing on the end. Coin and poem were rolling smoothly.
Chand

Anonymous said...

Very nice!

Ravindra Pandey

Anurag said...

Uncle,

A very nice and inspiring poem for all of us who are otherwise overcautious in everything. I would rank it as one of your best poems.

Anurag

Anonymous said...

Phuphaji,

bahut badiya likha hai..maja aa gaya padke..three cheers for u..
rgds.

anjuna agrawal singh

मथुरा कलौनी said...

लक्ष्‍मी जी बहुत बहुत बधाई।
आनंद आ गया पढ़ कर।
आपने भावों को बढ़े कलात्‍मक ढंग से शब्‍दों में पिरोया है।