दोहा: जिन रघुबर की कृपा ते, मूक होंहिं वाचाल।
बन्दहुँ उन रघुनाथ कहुँ, साहिब दीन दयाल।।
श्री रघुबीर कथा मैं गाऔँ। अन्य विचार न मैं उर लाऔं।।
जन्म लियो दसरथ के धामा। सब जन के सुख दाई रामा।।
मुनि हित मानि ताड़का मारी। तुम रघुनाथ दीन हितकारी।।
फिरि पद परस अहिल्या तारी। गौतम मुनि के पास सिधारी।।
भंजि चाप जानकी बियाही। परसुराम कर दाप मिटाई।।
अनरथ कियो कैकई माई। राज छोड़ि बनबासु देवाई।।
बाप का राज त्यागि तुम दीन्हो। हर्ष विषाद न कछु हिय कीन्हो।।
पुनि निषाद गृह आश्रय लीन्हाँ। दलित जनन कहँ आदरु दीन्हाँ।।
केवट कथा बहुत मन हारी। भगत जनन कहँ है अति प्यारी।।
भरत बोलावन तुम कहँ आयो। अति सनेह तुम उनहिं बुझायो।।
तुम करि कृपा पादुका दीन्ह्यो। मान सबन को प्रभु रखि लीन्ह्यो।।
खर दूषन को बध तुम कीन्हा। दंडक बनहिं सुरच्छित कीन्हा।।
सीय हरन जब रावन कीन्हा। तिय वियोग प्रभु तुम अति दुख कीन्हा।।
धन्य जटायू पंछी भाई। रघुपति हाथन किरिया पाई।।
शबरी नाम भीलनी रहई। छोट जाति जेहिं मानैं सबहीं।
तेहि के हाथ बेर तुम खाई। रघुपति तुम सब जन सुखदाई।।
पुनि सुग्रीव मिताई कीन्हा। बालिहिं मारि राजपद दीन्हा।।
हनूमान तब लंका जाई। सीता कै सब खबरि लगाई।।
हनुमति मुँदरी सीतहिं दियो। तपत हियो कछु सीतल कियो।।
तुम्हरिहि कृपा दीन हितकारी। हनूमान जब लंका जारी।।
अंगद दूत बनाइ पठावा। अरिहू को तुम मान निभावा।।
रावन शठ मानइ नहिं बाता। अनुज बिभीषन मारी लाता।।
लंका छाँड़ि प्रभुहिं पहिं आयो। तुम शरणागत ताहिं बनायो।
बहु विरोध सुग्रीवा कीन्हा। तेहिं परतोष प्रभू तुम कीन्हा।।
तुरतहिं तिलक बिभीषन कीन्हो। लंका केर राजि दै दीन्हो।
रावन संकर सीस चढ़ायो। अति सम्पदा तबै तेहिं पायो।।
वहि सम्पदा बिभीषन दीन्हो। तुम रघुनाथ सकुच बहु कीन्हो।।
बहु बिनती सागर कै कीन्हा। मारग देहि न जड़ हठ कीन्हा।।
रघुपति तब सागर पहिं कोपा। सोखहुँ सब जल जो मोहिं रोका।।
तब समुद्र प्रकटो हे भाई। सेतु बन्ध की राह बताई।।
तुम्हरी कृपा सुनौ रघुराई। पाथर तब जल पर उतराई।।
तब नल नील बँधाएहु सेतू। सुर नर मुनिन आचरज हेतू।।
सागर माँह सेतु तुम कीन्हा। रावन बहुत आचरज कीन्हा।।
थापन रामेश्वर कहँ कीन्हो। बैस्नौ शैव एकता चीन्हो।।
उतरा बानर कटक अपारा। कौन दृश्य यह बरननि पारा।।
लछिमन हृदय लाग जब बाना। धीरज त्यागि प्रभू बिलपाना।।
तब संजीवनि हनुमत लाए। लछिमन के तेहिं प्रान बचाए।।
मारि रावनहिं सीता लाए। अवधपुरी पुष्पक महिं आए।।
किरपा तब कैकइ तन कीन्ही। पुनि पुनि मिले सांत्वना दीन्ही।।
बहु सन्तोष भरत को भयो। राम चरन निज सिर को दयो।।
प्रभु सिंगासन बैठे जाई। सुर नर मुनि सब कीरति गाई।।
लक्ष्मीगुप्त कथा तव गाई। मो कहँ रघुपति होहु सहाई।।
दोहा: संछेपहिं रघुपति कथा, बरनेउँ मैं कर जोरि।
कृपा करहु प्रभु दास पहिं, प्रभु मोरी मति थोरि।।
---लक्ष्मीनारायण गुप्त
---२४ जनवरी २०११
10 comments:
Lakshmi: It is really beautiful. Post a copy at the temple. I hope you keep on attending more Ramayan pujas to give us such wisdom.
Chand
आप धन्य हैं लक्ष्मीनारायण जी.
आप कहेहु चालीस चौपाई
मन में श्रद्धा बहुत बढ़ाई
धन्य धन्य तव लेखनि भाई
राम चरित मानस पढ़वाई.
***
कृपया निम्न को देख लें:
शबरी नाम भीलनी भाई। छोट जाति जेहिं मानैं सबहीं।
बहु बिनती सागर कै कीन्ह। मारग देहि न जड़ हठ कीन्हा।।
निम्न में तुम्ही >> तुम ही:
तुम्ही कृपा सुनौ रघुराई। पाथर तब जल पर उतराई।
--ख़लिश
ख़लिश जी,
बहुत धन्यवाद। आप सही कह रहे
हैं। वर्तनी में सुधार की
आवश्यकता है।
लक्ष्मी
लक्ष्मी नारायण जी,
अब रचना और भी सुंदर हो गई. आप बधाई के पात्र हैं.
--ख़लिश
चौपाइयां ४० रहें तो चालीसा जरूर होता है , पर ये संख्या तो ४२ है |
वैसे आपने अच्छी कविता लिखी है , कहीं कहीं तुक गड़बड़ है तो क्या हुआ ,
सार सब आ गया है रामायण का
राम तुम्हारा नाम स्वयं ही काव्य है
कोई कवि बन जाय सहज संभाव्य है |
Your's ,
Achal Verma
Your "Ram Katha Chalisa" is so good and of a literary standard that I'd recommend it to be sung at the end of each Ramayan Paath in our Temple and before Hanuman Chalisa. It very appropriately summarises complete Ramayan (at least that written by Swami Tulsi Das). Fortunately, it (in rhyme, style and poetic grammer rules) is conforming to Tulskirit Ramayan. May I take the liberty of recommending it to our Temple Executive Committee?
With kind regards:
B. K. Gaur
My comments: (can't write in Devanagari script. You have to help me.)
Tulsidas saat kand liyo
Ramchandra Manas rachyo
Guptaji ki aur badai
Akahu page mai sub katha sunai.
Gupataji: Well done.
You write well in this language.
-Anand
सुन्दर.बधाई.
महेश चन्द्र द्विवेदी
Laxmiji:
In my opinion, this is one of your best creations!
Congratulations!
Ravi
Dear Phuphaji
Its written beautifully. You have given the whole sequence in few
lines. Though i could not understand the meaning of all the words but
i can say its a great work of an Hindi scholar. Congratulations!
Love &Regards
Anju
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