Tuesday, December 21, 2010

अगले जनम

अगले जनम प्रभु मोहें मनई न बनैओ
मनई बनैओ जो प्रभु भारत न भेजिओ
भारत जो भेजौ प्रभु रिक्शा न खिंचवैयो
रिक्शा जो खिंचवैयो प्रभु,
रिक्शा माँ मोटी मोटी सवारी न बिठैओ
मोटी सवारी जो भेजो प्रभु,
पहाड़ी न चढ़वैयो
पहाड़ी जो चढ़वैयो प्रभु,
हमैं अलीगढ़ भेजवैयो
नायक जी की किरपा से,
मुटल्ली सवारी उतरइयो
सवारी उतरैयो प्रभु,
वा को पैदल चढ़वइयो
अगले जनम प्रभु मोहें मनई न बनैओ

अगले जनम प्रभु मोहें अमरीका भेजियो
अमरीका में प्रभु मोहें कुत्ता बनैयो
मेमन की गोदी माँ प्रभु बिस्कुट खिलवैयो
मेम के बिस्तर माँ प्रभु मोहिंका सोवैयो
अगले जनम प्रभु मोहें मनई न बनैयो
(मनई = मनुष्य)
---लक्ष्मीनारायण गुप्त
---२१ दिसम्बर २०१०

पुनश्च: 'अगले जनम मोहें बिटिया न कीजौ ' तथा 'नदी नारे न जाव' लिखने वाले कवियों को मेरा आभार।
           -इस कविता के लेखन के पीछे यह ई-पत्र वयवहार है:

On Tue, Dec 21, 2010 at 10:47 AM, Krishan Mago <krishanmago@yahoo.com> wrote:



Finally, a sane rule ! I thought Laxmi might be inspired by it to write a poem .
-Krishan. 

Monday, December 20, 2010

ग़ज़ल और गाजर

जी हाँ हुजूर मैं कविता करता हूँ         (भवानी प्रसाद मिश्र के सौजन्य से)
कभी कभार शेर-ओ-शायरी भी लिखता हूँ

अभी अभी पढ़ा बी बी सी पर एक समाचार
संगीत और सब्ज़ी का समन्वय मनुहार
(http://www.bbc.co.uk/news/world-12037155)

सुन्दर बालाएँ मंच पर गाने गाती हैं
गायन के बाद प्याज़ के गुच्छे बाँटती हैं
प्याज़ पैदा करने वाले और कन्सर्ट जाने वाले
दोनों ही से पैसे लेती हैं

मै भी सोच रहा हूँ
कि अपनी कविताओं को सब्ज़ियों की तरफ मोड़ दूँ
ग़ज़ल को गाजर से जोड़ दूँ
भारत का बेटा हूँ
और कुछ नहीं तो समन्वय समझता हूँ

मैं भी किसानों से सम्पर्क बढ़ाऊँगा
सब्ज़ियों के प्रमोशन के लिए कान्ट्रैक्ट साइन करूँगा
हर कविता पाठ के बाद सब्ज़ियाँ बाँटूँगा
कभी प्याज़ कभी मिर्च बाटूँगा
कभी लौकी कभी तुरई बाँटूँगा
कद्दू की करामात हो सकती है
मेरी कविता भी ज़ायक़ेदार हो सकती है

आपका क्या ख़्याल है बताइए
थोड़ा हरा धनिया साथ लेते जाइए

---लक्ष्मीनारायण गुप्त
---२० दिसम्बर २०१०