मनई बनैओ जो प्रभु भारत न भेजिओ
भारत जो भेजौ प्रभु रिक्शा न खिंचवैयो
रिक्शा जो खिंचवैयो प्रभु,
रिक्शा माँ मोटी मोटी सवारी न बिठैओ
मोटी सवारी जो भेजो प्रभु,
पहाड़ी न चढ़वैयो
पहाड़ी जो चढ़वैयो प्रभु,
हमैं अलीगढ़ भेजवैयो
नायक जी की किरपा से,
मुटल्ली सवारी उतरइयो
सवारी उतरैयो प्रभु,
वा को पैदल चढ़वइयो
अगले जनम प्रभु मोहें मनई न बनैओ
अगले जनम प्रभु मोहें अमरीका भेजियो
अमरीका में प्रभु मोहें कुत्ता बनैयो
मेमन की गोदी माँ प्रभु बिस्कुट खिलवैयो
मेम के बिस्तर माँ प्रभु मोहिंका सोवैयो
अगले जनम प्रभु मोहें मनई न बनैयो
(मनई = मनुष्य)
---लक्ष्मीनारायण गुप्त
---२१ दिसम्बर २०१०
पुनश्च: 'अगले जनम मोहें बिटिया न कीजौ ' तथा 'नदी नारे न जाव' लिखने वाले कवियों को मेरा आभार।
-इस कविता के लेखन के पीछे यह ई-पत्र वयवहार है:
On Tue, Dec 21, 2010 at 10:47 AM, Krishan Mago <krishanmago@yahoo.com> wrote:
Finally, a sane rule ! I thought Laxmi might be inspired by it to write a poem .
-Krishan.