Tuesday, October 26, 2010

कीर्ति, अपकीर्ति, स्वर्ग और नरक

महाभारत के वन पर्व में यह विचित्र कहानी आती है। मैं सोचता था कि जब तक मनुष्य का पुण्य रहता है वह स्वर्ग का सुख भोगता है और पुण्य क्षीण होने पर स्वर्ग से पतित होकर पृथ्वी पर जन्म लेता है। किन्तु इस कहानी के अनुसार मनुष्य तब तक स्वर्ग में रहता है जब तक उसके किए हुए भले कामों का यश विश्व में फैला रहता है। जब उसके शुभ कर्म विस्मृत हो जाते हैं तब उसका स्वर्ग से पतन हो जाता है।

प्राचीन काल में इन्द्रद्युम्न नामक एक राजा था जो मरने के बाद बहुत समय तक स्वर्ग में रहा किन्तु एक समय ऐसा आया कि उसके सुकर्मों की चर्चा विश्व में समाप्त हो गई। ऐसा होने पर राजा इन्द्रद्युम्न स्वर्ग से गिर कर भूलोक में आ गया।

राजा ने अब खोज शुरू की कि क्या कोई अभी भी उसे पहचानता है। वह वयोवृद्ध ऋषि मार्कंडेय के पास गया और पूछा कि क्या वे उसे पहचानते हैं। ऋषि ने उसे नहीं पहचाना किन्तु बताया कि हिमालय पर्वत पर एक उल्लू रहता है जो उनसे उम्र में बड़ा है। हो सकता है वह राजा को पहचान ले। हिमालय वहाँ से बहुत दुर था इस लिए राजा ने घोड़े का रूप धारण कर ऋषि को अपने ऊपर बैठाया और उल्लू के पास गया। उल्लू ने भी राजा को नहीं पहचाना किन्तु उसने कहा कि इन्द्रद्युम्न नाम का एक सरोवर है जिसमें एक बगुला रहता है जो उससे अवस्था में बड़ा है। सम्भव है वह राजा को पहचान सके। तब ऋषि, राजा और उल्लू उस बगुले के पास गए किन्तु बगुले ने भी राजा को नहीं पहिचाना।

बगुले ने कहा कि इसी सरोवर में एक कछुआ रहता है जो उससे भी अधिक आयु का है। उस कछुए का नाम अकूपार है। राजा ने कछुए को नाम लेकर बुलाया। जब कछुआ ऊपर आया तो ऋषि ने उससे पूछा,  "महाशय क्या आप राजा इन्द्रद्युम्न को पहचानते हैं?" कछुए ने थोड़ी देर तक सोचा। फिर उसकी आँखों में अश्रु आ गए और काँपती हुई आवाज़ में उसने कहा, "मैं राजा इन्द्रद्युम्न को कैसे नहीं पहचानूंगा जिन्होंने सहस्रों यज्ञ किए थे और जिनके दान की हुई गायों के खुरों से खुद कर यह सरोवर बना था।"

अकूपार के इतना कहते ही एक दिव्य रथ प्रकट हुआ और ये शब्द सुने गए, "राजा, तुम्हारा स्वर्ग में फिर से स्वागत है। मनुष्य के शुभ कामों की चर्चा की प्रतिध्वनि स्वर्ग तक जाती है और जब तक यह ध्वनि होती रहती है तब तक वह स्वर्ग में निवास करता है। सेसे ही जब तक मनुष्य के कुकर्मों की चर्चा की ध्वनि रहती है वह नरक में वास करता है।"

राजा ने मार्कंडेय और उल्लू को उनके घरों तक पहुँचाया और फिर वह दिव्य रथ पर आरूढ़ होकर फिरसे स्वर्ग गया।

---लक्ष्मीनारायण गुप्त
---२६ अक्टूबर २०१०

Wednesday, October 13, 2010

सृष्टि का झंझट

(एक कल्पित पौराणिक कथा)


बहुत समय की बात बन्धुओ तुम्हें सुनाता हूँ
भूल चूक के लिए प्रथम ही क्षमा माँगता हूँ

ऋषियों की समझ में आ गई थी यह बात
करना है कैसे ब्रह्म का साक्षात्

बड़ी आसान है यह बात 
अहं को छोड़ दो बस
हो जाएगा ब्रह्म से साक्षात्

यदि एक बार हो जाए साक्षात्
मुक्ति को छोड़ कर 
व्यर्थ हैं सारे पुरुषार्थ

धर्म अर्थ काम का लोग करने लगे त्याग
जीवन्मुक्त होकर ले बैठे वैराग्य

देवताओं की हालत खस्ता होगई
यज्ञ, पूजा आदि समाप्तप्राय हो गईं
भगवान विष्णु क्षीरसागर पर बोर हो रहे थे
किसके लिए अवतार लें फोकट में ही लोग मुक्त हो रहे थे

विश्व में भी सारे व्यापार बन्द हो रहे थे
कन्द मूल फल खा लोग मस्त हो रहे थे
सेक्स की भी कोई ज़रूरत नहीं थी
मृत्यु की भी की कोई दहशत नहीं थी

ब्रह्मा जी ने सोचा
अब सृष्टि का क्या होगा
सारे बैरागी बन रहे हैं
एवोल्यूशन का क्या होगा

देवलोक नागलोक सब जगह मच गया हाहाकार
मानवों के पूजा अर्चन बिना नहीं चल सकता संसार

सृष्टि यों ही समाप्त हो जाएगी
कुसमय में ही प्रलय हो जाएगी

ब्रह्मा विष्णु सभी देवी देव असुर
नाग गन्धर्व जो गाते सुर मधुर
देवाधिदेव महादेव के पहुँचे पास
वास है जिनका निरंतर कैलाश

प्रभु हो तुम बड़े अन्तर्यामी
रक्षा करो हे जगत के स्वामी 
महादेव ने सारा हाल सुन लिया
हँस कर के सभी को आश्वस्त किया

महादेव ने कहा मैं हूँ तामस का इन्चार्ज
करता हूँ मैं इससे मानवों पर चार्ज़
तामस से बढ़ जाएगा इनका अहंकार
भूलना अहं का नहीं कर सकेंगे स्वीकार

अहं से बढ़ेगा काम क्रोध मद लोभ
जीवन से टूटेगा जनता का क्षोभ
सेक्स में होगी फिर लोगों की दिलचस्पी
यज्ञ पूजा अर्चन में होगी बढ़ोतरी

शुरू हो जाएगा फिर सृष्टि का झंझट
ब्रह्मा जी, टल जाएगा विश्व का संकट

विष्णु जी आप बेधड़क जाइए
अगले अवतार की तैयारी में लगिए

प्रसन्न होकर लौटे सभी गन्धर्व देव किन्नर
महिमा बढ़ी उनकी जो हैं शिव शंकर

---लक्ष्मीनारायण गुप्त
---१३ अक्टूबर २०१०







Wednesday, October 06, 2010

गुणकेशी के लिए वर



गुणकेशी इन्द्र के सारथी मातलि की पुत्री थी जो बहुत ही रूपसी और सर्वगुणसम्पन्न थी। मातलि उसके लायक वर की तलाश कर रहे थे। उन्हें देव, गन्धर्व या नर लोकों में कोई ऐसा नहीं मिला जो उन्हें गुणकेशी के लायक लगा। फिर वे नारद मुनि के साथ नागलोक जाते हैं सुयोग्य वर की खोज में। वहाँ पर उन्हें सुमुख नामक नाग युवक अपनी कन्या के योग्य वर लगता है। वे उसके पितामह से बात करते हैं। पितामह को कोई आपत्ति नहीं है किन्तु वे बताते हैं कि नागों के सहज शत्रु गरुड़ ने सुमुख के पिता को खा लिया था और एक महीने बाद वे सुमुख को खाने वाले हैं। इन्द्र की आज्ञा के अनुसार गरुड़ को नागों को खाने का अधिकार है। मातलि कहते हैं कि उन्हें पूरा विश्वास है कि वे इन्द्र की कृपा से सुमुख का जीवन बचा सकते हैं।

नारद और मातलि लौट कर स्वर्ग जाते हैं इन्द्र के पास। विष्णु भगवान भी इन्द्र से मिलने आए हुए हैं। दोनों के समक्ष मातलि सुमुख की जान बचाने का निवेदन करते हैं। इन्द्र सुमुख को अभयदान देते हैं और विष्णु उनका समर्थन करते हैं।

गरुड़ यह जान कर बहुत रुष्ट होते हैं और इन्द्र को अपने पराक्रम के बारे में बताते हैं और उन्हें याद दिलाते हैं कि वे उन्हीं की अनुमति से नागों को खाते हैं। फिर वे विष्णु की ओर उन्मुख होकर उन्हें बताते हैं कि वे (विष्णु) अदिति के पुत्रों में सबसे अधिक शक्तिवान हैं और गरुड़ अपने बल से उनका भार वहन करते हैं। विष्णु भगवान कहते हैं, "हे गरुड़, तुम तो बहुत निर्बल हो। मैं अपना भार स्वयं ही वहन करता हूँ। यदि तुम सोचते हो कि तुम मेरा भार वहन करते हो तो मेरी बाँह का भार वहन करो।" यह कह कर भगवान ने अपनी एक बाँह गरुड़ पर रखी। गरुड़ उस बाँह का भार वहन नहीं कर सके और भूमि पर गिर गए। इस प्रकार भगवान ने गरुड़ के गर्व को भंग किया।

यह कथा महाभारत के उद्योग पर्व में कण्व ऋषि दुर्योधन को सुनाते हैं और कहते हैं कि उसे भी अपनी शक्ति के बारे में गरुड़ की तरह भ्रम है और उसे गर्व छोड़ कर पांडवों के साथ समझौता कर लेना चाहिए। विद्वान पाठक जानते ही हैं कि दुर्योधन ने किसी की बात नहीं मानी और अपने अभिमान के कारण अपने और अपने स्वजनों के नाश का कारण बना।

---लक्ष्मीनारायण गुप्त
---६ अक्टूबर २०१०