Sunday, September 12, 2010

कौन सा यज्ञ श्रेष्ठ है?



महाभारत के अश्वमेध पर्व में एक कहानी आती है जिसका ऐतिहासिक महत्व हो सकता है।

युधिष्ठिर के अश्वमेध यज्ञ की समाप्ति पर एक नेवला आता है और यज्ञभूमि पर लोटने के बाद कहता है कि इस यज्ञ का महत्व आधा सेर जौ (barley) के दान के तुल्य भी नहीं है। एकत्रित ब्राह्मणों को बड़ा आश्चर्य होता है और वे सोचते हैं कि किस विधान में कमी रह गई। प्रश्न करने पर नेवला यह कहानी सुनाता है। 

कुरुक्षेत्र में एक गरीब ब्राह्मण अपनी पत्नी, पुत्र एवं पुत्रवधू के साथ रहता था जो अपने परिवार की जीविका खेत खलिहान में गिरे हुए अनाज को एकत्र करके चलाता था। एक दिन इस परिवार को केवल आधा सेर जौ के दाने मिल पाए। इस जौ को पीस कर इसकी रोटी बना कर चार भागों में बाँट कर परिवार भोजन करने जा रहा था जब एक अतिथि का आगमन हुआ। ब्राह्मण के अपने भाग की रोटी उसे दे दी। अतिथि अभी भी भूखा था तब पत्नी ने उसे अपना भाग दे दिया। इसी तरह से पुत्र और फिर पुत्रवधू ने भी अपने अपने भाग का भोजन अतिथि को दे दिया। अतिथि ने संतुष्ट होकर बताया कि वह सााक्षात् धर्मराज है। धर्मराज ने कहा कि ब्राह्मण परिवार के इस महान त्याग से उनकी कीर्ति युग युग तक चलेगी और उनके पूर्वज तर कर स्वर्ग में निवास करेंगे। इसके बाद सारा परिवार इन्द्र के स्वर्ग को पधार गया।

जौ की सुगन्ध से प्रेरित नेवला अपने बिल से निकला और गिरे हुए आटे और पानी के स्पर्श से उसका आधा शरीर सोने का होगया। नेवले ने कहा कि वह यह सोच कर आया था कि युधिष्ठिर की यज्ञभुमि में लोटने से उसका बचा हुआ आधा शरीर भी सोने का हो जाएगा किन्तु ऐसा नहीं हुआ।

इस कथा को सुनाने के बाद वैसम्पायन (कथा वाचक) राजा जनमेजय से कहते हैं कि उन्हें यज्ञ को अधिक महत्व नहीं देना चाहिए क्योंकि तपस्या, दान और सदाचार से भी यज्ञ जैसा ही फल मिलता है।
जनमेजय के प्रश्न करने पर वैसम्पायन जी बताते हैं कि एक बार इन्द्र के दरबार में यज्ञ में होनी वाली हिंसा से दु:खित ब्राह्मणों ने यह प्रश्न उठाया कि क्या यज्ञ में पशु बलि आवश्यक है। इन्द्र का मत था कि यह आवश्यक है। वसु उपरिचर ने कहा कि यज्ञ जो कुछ सामग्री उपलब्ध हो उससे किया जा सकता है; पशु बलि आवश्यक नहीं है। इन्द्र के क्रोध के कारण वसु उपरिचर को नरक जाना पड़ा।

फिर वैसम्पायन ने ऋषि अगस्त्य के यज्ञ की कथा सुनाई। अगस्त्य मुनि ने १२ वर्ष के यज्ञ का विधान किया था जिसमें तरीके तरीके के अन्नों का दान किया जाएगा किन्तु पशु बलि नहीं चढाई जाएगी। इन्द्र ने क्रुद्ध होकर वर्षा बन्द कर दी। अगस्त्य मुनि ने अपने तपोबल से सभी सामग्री उपलब्ध की। ऋषियों ने निर्णय लिया कि यज्ञ में पशु बलि आवश्यक नहीं है। इन्द्र को हार मान कर वर्षा करनी पड़ी।

सम्भवत: यह कथा हिन्दू धर्म में शाकाहार के प्रारम्भ की द्योतक है।

---लक्ष्मीनारायण गुप्त
---१२ सितम्बर २०१०