Sunday, August 22, 2010

अँगरेज़ी माता



पहले यह समाचार पढ़िए, Goddess English के मन्दिर के बारे मे:

http://blogs.wsj.com/indiarealtime/2010/04/30/a-dalit-temple-to-goddess-english/
अब कविता पढ़िए:

धन्य धन्य अंगरेज़ी माता
अम्मा से जो मिला नहीं 
मौसी से मिल जाता
तुम्हरी किरपा होवे
तो भाग्य बदल जाता
सुख सम्पति घर आवे
काम भी लग जाता
तुम्हरी कीरति गावैं को
मन्दिर बनवाता
पूजा अरचन तुम्हरो मैया
टीचर करवाता
दलितों का उद्धार करन में
सफल तू ही माता
लॅार्ड मैकाले की किरपा से
तुम भारत आता
कृपा करो अब मैया 
यही यह जन गाता
तुमही हो इँगलैंड बसन्ती
अमरीकौ में माता
तुमही हो विद्या शिरोमणि
ज्ञानिन सुख दाता
जय जय जय अँगरेज़ी
जय अँगरेज़ी माता
दास तुम्हारे हैं लक्ष्मीगुप्त
करदो कुशलाता
धन्य धन्य अँगरेज़ी माता
(अम्मा = हिन्दी , तमिल इत्यादि भारतीय भाषायें, मौसी = अंग्रेज़ी, टीचर = अंग्रेज़ी अध्यापक)
---लक्ष्मीनारायण गुप्त
---२२ अगस्त २०१०

Sunday, August 08, 2010

सबर्बन जीवन की कुछ झलकें


अमेरिका के सबर्बों में रहते रहते एक युग बीत गया। प्रस्तुत हैं कुछ हास्यकर अनुभव।

हम अपने लान में स्वचालित सिंचाई का उपकरण लगवा रहे थे। उसकी टोंटियाँ कहाँ लगें यह निश्चित करने के लिए हमें अपने और पड़ोसी के लान के बीच की सीमा निर्धारित करनी थी। तो मैं पड़ोसी से बात करने गया। बात करते हुए मालुम हुआ कि पड़ोसी ने यह छोटा मकान रिटायर होने के बाद बनवाया है। पड़ोसी ने कहा कि उसने समाज के प्रति अपना कर्तव्य पूरा कर दिया है। मैंने पूछा कि किस उमर में रिटायरमेंट लिया है। उसने कहा कि उसकी उमर मुझसे दूनी है तो मैंने पूछा कि क्या वह ११६ साल का है क्योंकि उस समय मेरी उमर ५८ साल की थी। पड़ोसी ने कहा, " हाँ, यह लगभग सही है; उसकी उमर ८७ साल है।"

मैं जब शाम को टहलने जाता था एक मकान पर "कुत्ते से सावधान" का साइन देखता था लेकिन कुत्ता कहीं नहीं दिखाई देता था। एक दिन एक महिला से जो उस मकान के सामने से गुजर रही थी, मैंने पूछा कि क्या उसने इस कुत्ते को कभी देखा है। उसने कहा, " हाँ, बड़ा ही भयानक कुत्ता है। यहाँ से ध्यान से निकला करो।" एक दिन मैं फिर उस मकान के सामने से निकल रहा था। बाहर एक व्यक्ति खड़ा था, उसके पीछे एक छोटा सा कुत्ता दुबका सा खड़ा था और सामने एक बिल्ली थी। मैंने उस व्यक्ति से पूछा कि क्या यही उसका खौफनाक कुत्ता है। उसने बताया, " हाँ यही है, बिल्ली के डर से दुबका खड़ा है।"

और यह घटना अभी आज की है। हम एक कालीन की दूकान पर गए थे। सेल्समैन से बातचीत हुई। जाते हुए उसने अपना कार्ड दिया जिसमें उसका नाम लिखा था, " ब्रायन डे फ्रान्स।" मैंने मज़ाक में कहा, " अच्छा तो आप फ्रान्स के ब्रायन हैं।" उसने भी हँस कर जवाब दिया कि वह अभी अभी पेरिस से आ रहा है। मैंने कहा लौटने पर सारकोज़ी से मेरा हेलो कह देना। तब उसने बताया कि वह फ्रेन्च मूल का बिलकुल नहीं है। वह इटैलियन मूल का है। उसका असली नाम डे फ्रान्सिस्को है। उसके पितामह जब अमेरिका आये थे उस समय इटैलियन लोगों के प्रति बड़ा भेद भाव था इस लिए उसके बाबा ने अपना नाम डे फ्रान्सिस्को से बदल कर डे फ्रान्स रख लिय़ा था।

---लक्ष्मीनारायण गुप्त
---८ अगस्त २०१०