Saturday, April 24, 2010

ह्वेनसांग की बलि



विद्वान पाठकों को पता होगा कि चीनी बुद्ध भिक्षु ह्वेनसांग सातवीं शताब्दी में हर्षवर्धन के राज्यकाल में भारत की तीर्थ यात्रा और बौद्ध धर्म के ग्रन्थ जुटाने आया था। इस ह्वेनसांग के बारे में यह कहानी प्रोफेसर माल्कम डेविड एकेल द्वारा दिए एक बौद्ध धर्म के कोर्स में सुनी।


कहते हैं जब ह्वेनसांग भारत में यात्रा कर रहा था और गंगा नदी के निचले मैदान में कहीं पर था तब उसके कबीले पर कुछ डाकुओं ने हमला किया। ये डाकू दुर्गा के भक्त थे और दुर्गा पर बलि चढ़ाने के लिए किसी व्यक्ति की तलास में थे। उन्हें लगा कि गोल मटोल चीनी भिक्षु बलि चढ़ाने के लिए बहुत उत्तम रहेगा। ह्वेनसांग ने दुर्गा भक्त डाकुओं से प्रार्थना की वे उसे कुछ समय दें जिससे वह अपनी आखिरी पूजा कर सके और अपने आप को बलिदान के लिए प्रस्तुत कर सके। डाकुओं ने उसकी बात मान ली।


आपको शायद मालूम होगा कि आगामी बुद्ध का नाम मैत्रेय है जो इस समय स्वर्ग में हैं और उपयुक्त समय की प्रतीक्षा कर रहे हैं। ह्वेनसांग ने बोधिसत्व मैत्रेय का ध्यान किया। कहते हैं उसी समय एक भयंकर तूफान आया। हवा; पानी और बिजली का प्रकोप होने लगा। डाकुओं के होश हवास उड़ने लगे और उन्होंने अन्य यात्रियों से पूछा कि यह भिक्षु कौन है। उन्होंने बताया कि यह कोई साधारण भिक्षु नहीं है अपितु परम विद्वान ह्वेनसांग हैं जो भारत की तीर्थयात्रा पर आये हैं। भिक्षु ह्वेनसांग के चरणों पर गिरे और हिंसा का मार्ग छोड़ कर बौद्ध धर्म के अनुयायी बन गए।


---लक्ष्मीनारायण गुप्त

---२४ अप्रैल २०१०

Thursday, April 15, 2010

मालुंक्यपुत्त और गौतम बुद्ध

एक बार मालुंक्यपुत्त नामक एक व्यक्ति भगवान बुद्ध के पास आया और बोला कि उसे भगवान की शिक्षा अच्छी लगती है किन्तु इसके पूर्व कि वह उनका शिष्य बने उसे कुछ प्रश्नों के उत्तर चाहिए। उसने बुद्ध के समक्ष १० प्रश्न रखे। वे इस प्रकार के थे। यह विश्व अनंत है या सीमित। यह सदैव बना रहेगा या कभी इसका अन्त होजाएगा। मरने के बाद बुद्ध कहाँ जाएगा। उसका अस्तित्व रहेगा या नहीं इत्यादि।

बुद्ध ने कहा कि मालुंक्यपुत्त का व्यवहार एक ऐसे व्यक्ति की तरह है जिसको एक विषाक्त बाण लगा है। वैद्य उसको निकालना चाहता है किन्तु वह व्यक्ति पहले इन प्रश्नों के उत्तर चाहता है। यह तीर किसने मारा, उसकी जाति क्या है, उसका रंग क्या है, वह किस देश का रहने वाला है इत्यादि। जब तक इन सवालों का जवाब मालुम होगा, विष फैल जाएगा और व्यक्ति मर जाएगा।

बुद्ध ने कहा कि मालुंक्यपुत्त को पूछना चाहिए कि यह मानवीय दु:खों का बाण कैसे निकाला जाए और इस दु:ख को दूर करने के लिए इन आद्ध्यात्मिक प्रश्नों के उत्तर आवश्यक नहीं है।

बुद्ध ने कहा कि उन्हों ने बताया है कि दु:खों का कारण क्या है और दु:खों का निवारण किया जा सकता है अष्टमार्गीय मद्ध्यम मार्ग के पालन से। यह मद्ध्यम मार्ग अर्थात् बीच का रास्ता है जिसमें किसी भी प्रकार की अति वर्जित है। जैसे वीणा के तार जब ठीक से कसे होते हैं तो बजाने से सुन्दर संगीत उत्पन्न होता है। यदि तार ढीले हैं या अधिक कसे तो मधुर संगीत नहीं निकलता।

---लक्ष्मीनारायण गुप्त
---१५ अप्रैल २०१०