Monday, March 29, 2010

तांत्रिक-नास्तिक कथा

पहले पढ़िए:

http://www.rationalistinternational.net/article/2008/20080310/en_1.html

तांत्रिक और नास्तिक में बहस हो गई
बड़े कमाल की यह बात हो गई
राष्ट्रीय टीवी पर एक झड़प हो गई
जो सीखना चाहें उनके लिए शिक्षा की बात हो गई
तांत्रिक ने कहा मै मंत्रों का प्रयोग जानता हूं
चाहू तो मंत्रों से आपको जान ले सकता हूँ
नास्तिक ने कहा अब देर न लगाइए
मैं तैयार हूँ मुझे मंत्रों से मार डालिए
टीवी वालों ने सारे प्रोग्राम बर्खास्त कर डाले
जनता जिससे तांत्रिक की विद्या आजमा ले
तांत्रिक ने बड़ा सारा मंत्र प्रहार किया
नास्तिक को सिर दर्द तक नहीं हुआ
स्वामी ने नास्तिक के सर पर चाकू घुमाई
मंत्राभिषिक्त जल की फिर की छिड़काई
उसके सिर को फिर अपने हाथों से छुआ
नास्तिक का बाल बाँका तक नहीं हुआ
तांत्रिक ने कहा जरूर इसने अवश्य भगवान से विनती की होगी
नास्तिक ने कहा अवश्य ही आपकी बुद्धि भ्रष्ट हुई होगी
यह बाजी तो नास्तिक के हाथ लग गई
प्रभु ही सिखायेंगे तांत्रिक को कोई ट्रिक नई

---लक्ष्मीनारायण गुप्त
---२९ मार्च २०१०

Tuesday, March 23, 2010

अंगुलिमाल


समय लगभग ईसा के ५०० वर्ष पूर्व। कोशल देश की राजधानी श्रावस्ती में एक ब्राह्मण पुत्र के बारे में एक ज्योतिषी ने भविष्य वाणी की कि यह बालक हिंसक प्रवृत्तियों के वशीभूत होकर हत्यारा डाकू बन सकता है। माता-पिता ने उसका नाम अहिंसक रखा और उसे प्रसिद्ध तक्षशिला विश्वविद्यालय में शिक्षा प्राप्ति के लिए भेजा। अहिंसक बड़ा मेधावी छात्र था और आचार्य का परम प्रिय। सफलता औरों में ईर्ष्या का जन्म देती है। कुछ ईर्ष्यालु सहपाठियों ने आचार्य को अहिंसक के बारे में झूठी खबरें देकर उन्हें अहिंसक के बिरुद्ध कर दिया। आचार्य ने अहिंसक को आदेश दिया कि वह सौ व्यक्तियों की उँगलियाँ काट के लाए तब वे उसे आखिरी शिक्षा देंगे। अहिंसक गुरु की आज्ञा मान कर हत्यारा बन गया और लोगों की हत्या कर के उनकी उँगलियों को काट के उनकी माला पहनने लगा। इस प्रकार उसका नाम अंगुलिमाल पड़ा।


अंगुलिमाल का आतंक पूरे देश में फैल गया। एक बार जब भगवान बुद्ध यात्रा कर रहे थे, अंगुलिमाल उनके पीछे पड़ गया। लेकिन अंगुलिमाल कितना भी तेज दौड़े, भगवान उससे दो कदम आगे ही रहते थे। अंगुलिमाल ने कहा, "हे गंजे, बुड़्ढे रुक जा, मुझे तेरी उँगलियाँ काटनी हैं।" भगवान ने कहा, " हे अंगुलिमाल, मैं तो रुका हुआ ही हूँ, मैंने तो यह आवागमन का संसार भी रोक दिया है, तुम भी क्यों नहीं रुक जाते। " इतना सुनते ही अंगुलिमाल के ऊपर ऐसा प्रभाव हुआ कि वह बुद्ध के चरणों पर गिर पड़ा और शिक्षा की भीख माँगने लगा। भगवान ने से उपदेश दिया और अंगुलिमाल एक महान धर्मप्रचारक भिक्षु बन गया।


कुछ वर्षों के बाद जब अंगुलिमाल भिक्षा माँगने गया हुआ था उसे कुछ व्यक्तियों ने देखा जिनके परिवार की हत्या उसने की थी। उन्होंने अंगुलिमाल को इतना मारा कि वह मर गया। अंगुलिमाल ने हाथ भी नहीं उठाया। भगवान बुद्ध ने कहा कि अंगुलिमाल एक महा पुरुष था क्योंकि वह हिंसा के मार्ग को छोड़ कर अहिंसा के मार्ग पर आया और सत्य मार्ग पर चलते हुए उसने अपना प्राण तक गँवा दिया।


---लक्ष्मीनारायण गुप्त

---२३ मार्च २०१०

Wednesday, March 17, 2010

एक जातक कथा


जातक कथाएं बुद्ध भगवान के पूर्व जन्म की कहानियाँ हैं। बुद्ध भगवान के ५४७ पूर्व जन्मों के आख्यान हैं। कुछ जन्मों में वे पशु या पक्षी हैं और कुछ जन्मों में मानव। इतने जन्मों की साधना के फलस्वरूप उन्हें बुद्धत्व की प्राप्ति हुई।


यह कथा तीन मित्रों की है। एक हाथी, एक बन्दर और एक तीतर में प्रगाढ़ मैत्री थी। वे एक विशाल बट वृक्ष की छाया में मिला करते थे। एक बार उनमें बात चली कि कौन उनमें से अवस्था में सबसे बड़ा है जिससे वे उसका यथोचित आदर करें।


हाथी ने कहा जब वह छोटा था इस बरगद की सबसे ऊपर की शाखा से अपना पेट खुजा सकता था। बन्दर ने कहा कि बचपन में हाथ बढ़ा कर बरगद की फुनगी (सब से ऊपर की शाखा) की पत्तियाँ खा सकता था। तीतर ने कहा कि उसके बचपन में एक और विशाल बरगद था जिसके फल को खाकर जहाँ पर यह बरगद खड़ा है उसने बीट की थी। उस बीट में बरगद के बीज से इस बरगद का जन्म हुआ।


इस बार्तालाप से यह सिद्ध हुआ कि तीतर सब से बड़ा है और हाथी और बन्दर ने उसका सम्मान किया।


यह तीतर ही अनेक जन्मों के पश्चात कपिलवस्तु में महाराज शुद्धोदन और महारानी माया के पुत्र सिद्धार्थ के रूप में जन्मा जिसे अब हम शाक्य मुनि गौतम बुद्ध के रूप में जानते हैं।


---लक्ष्मीनारायण गुप्त

---१७ मार्च २०१०

Wednesday, March 10, 2010

देवताओं का पसीना


महाभारत में नल-दमयन्ती आख्यान में यह प्रसंग आता है। दमयन्ती का स्वय्म्वर हो रहा है। दमयन्ती नल को वर के स्वरूप में चुनना चाहती है किन्तु सभा में पाँच व्यक्ति हैं जो नल जैसे लग रहे हैं। नल के अतिरिक्त इन्द्र, वरुण, अग्नि और यम भी नल के वेष में आए हैं। दमयन्ती देवताओं की शरण में जाती है और नल को पहचानने की शक्ति की प्रार्थना करती है। देवता प्रसन्न होकर उसे ज्ञान देते है जिसके अनुसार देवताओं को पसीना नहीं आता, उनकी पलकें नहीं ज्ञपकतीं और उनके गले की पुष्पमाला नहीं कुम्हलाती।


इस प्रकार हम जानते हैं कि देवताौं को पसीना नहीं आता। अब इसीसे सम्बन्धित दूसरा प्रश्न पूछिए: क्या देवता लोग खाते, पीते हैं या नहीं और यदि खाते हैं तो मल मूत्र भी विसर्जन करते हैं कि नहीं। इस प्रश्न का उत्तर मुझे किसी पुराण में नहीं मिला।


अब यही प्रश्न आप अवतारों के बारे में उठा सकते हैं: क्या भगवान राम या कृष्ण को मल-मूत्र विसर्जन की आवश्यकता पड़ती थी या नहीं। इस सवाल का जवाब भी कहीं नहीं मिला। मैंने यह प्रश्न बचपन में अपने घर में भी किया था तब पिता जी बहुत नाखुश हुए थे।


ईसाइयों ने इस सवाल पर गौर किया है कि ईसा मसीह मल-मूत्र विसर्जन करते थे कि नहीं। ईसाई विचारक वैलेन्टियस (दूसरी शताब्दी ईसवी) ने कहा कि ईसा खाते पीते तो थे किन्तु मल-मूत्र नहीं त्याग करते थे।


जैसे हम सब के सामने मल-मूत्र त्याग नहीं करना चाहते वैसे ही खुले आम सेक्स भी नहीं करना चाहते। ये सारी प्रक्रियायें शर्मनाक मानी जाती हैं। ईसाइयों ने प्रश्न उठाया कि आदम और हव्वा शैतान के बहकावे में आकर ज्ञान का सेव खाने के पहले सम्भोग करते थे कि नहीं। चौथी शताब्दी में सन्त जीरोम ने कहा कि वे कदापि सम्भोग नहीं करते थे। जोहानस स्काट एरीगेना के अनुसार वे सम्भोग तो करते थे किन्तु किसी उत्तेजना का अनुभव नहीं करते थे। आदम का लिंग उसकी इच्छा के अनुसार वैसे ही खड़ा हो जाता था जैसे हम अपने हाथ पैर उठाते हैं।


मुझे लगता है कि आदम और हव्वा को जब ज्ञान प्राप्त हुआ कि वे नंगे हैं तभी उन्हें मल-मूत्र के गंदे होने का ज्ञान हुआ होगा और खुले आम मल-मूत्र विसर्जन में शर्म का अनुभव हुआ होगा। मुझे लगता है कि बहुत सारे भारतीय अभी भी आदम और हव्वा की तरह स्वर्ग में हैं। उन्होंने ज्ञान का सेव अभी तक नहीं खाया है इसी लिए किसी को खुले आम रेल की पटरी के किनारे और सड़कों के किनारे मल-मूत्र त्याग करने में कोई हिचक नहीं होती।


---लक्ष्मीनारायण गुप्त

---१० मार्च २०१०