बहुत दिनों से मेरे मन में यह प्रश्न है कि रामचरितमानस की कुछ कथायें तुलसी की स्वनिर्मित हैं या उनका स्रोत अन्य रामायणों या पुराणों में है।
जैसा कि विद्वान पाठकों को ज्ञात होगा कि मानस में रामकथा चार सम्वादों में सुनाई जा रही है:
१। शिव-पार्वती
२। कागभुसुन्डि-गरुड़
३। याज्ञवल्क्य-भारद्वाज
४। तुलसी-मानस पाठक
अब शिव-पार्वती सम्वाद का कारण क्या है? पार्वती जब सती रूप में हैं राम को सीता-हरण के बाद वन में देखती हैं। सती राम की परीक्षा के लिए सीता का वेष लेकर उनके पास जाती हैं। राम उनसे प्रश्न करते हैं कि शिव कहाँ है और वे वन में अकेली क्यों फिर रही हैं। सती निरुत्तर होकर शिव के पास लौट जाती हैं। शिव के पूछने पर कहती हें कि उन्होंने कोई परीक्षा नहीं ली। बस उन्हींकी तरह केवल राम को प्रणाम किया है। शिव को योगवल से पता चल जाता है कि सती ने सीता का वेष ग्रहण किया था और वे मानसिक संकल्प करते हैं कि अब सती के इस शरीर से उनका प्रेम-सम्बन्ध नहीं हो सकेगा क्यों कि शिव सीता को माता-स्वरूप मानते हैं। कुछ समय बाद सती पिता दक्ष के यज्ञ में शिव के भाग को न देख कर स्वयं को यज्ञ की अग्नि में जला देती हैं। फिर सती का जन्म हिमाचल की पुत्री पार्वती के रूप में होता है और वे तप के द्वारा शिव को पति के रूप में प्राप्त करती हैं। इस विवाह के बाद वे शिव से राम-कथा सुनने की प्रार्थना करती है और इस प्रकार राम-कथा शिव-पार्वती सम्वाद के रूप में प्रकाश में आती है।।
सती के दक्ष के यज्ञ में शरीर-त्याग की कथा कई पुराणों में आती है किन्तु सती का सीता का वेष रखने का जिक्र मैंने कही नहीं देखा है। तो प्रश्न उठता है कि यह तुलसी की अपनी कल्पना है या इसका कोई पौराणिक स्रोत है।
अब कागभुसुन्डि-गरुड़ सम्वाद को लीजिए। जब मेघनाद राम को नाग-पाश से बाँध देता है गरुड़ आकर उन्हें मुक्त करते है। गरुड़ को भ्रम होता है कि यदि राम वस्तुत: अवतार हैं तो वे नाग-पाश में कैसे बँधे। इस भ्रम के निवारण के लिए वे शिव के पास जाते हैं किन्तु शिव उन्हें कागभुसुन्डि के पास भेजते हैं क्यों कि "खग जानै खग ही कै भाषा।" क्या कागभुसुन्डि का किरदार तुलसी की अपनी कल्पना है क्योंकि मैंने यह नाम किसी भी अन्य स्थान पर नहीं देखा है?
बालकाण्ड में राजा प्रतापभानु की कथा आती है। राजा प्रतापभानु एक यज्ञ करते हैं जिसमें मित्र बने हुए एक शत्रु के षड़यंत्र से नरमांस ब्राह्मणों को परोसा जाता है। इस पाप के कारण राजा प्रतापभानु को अगले जन्म में रावण बनना पड़ता है। जहाँ तक मुझे ज्ञान है प्रतापभानु की कहानी किसी पुराण में नहीं है।
लोकप्रिय लक्ष्मण-परसुराम सम्वाद भी न मैं ने किसी अन्य रामायण में देखा है न किसी पुराण में।
अयोध्याकाण्ड में केवट राम के पैर पखारने का हठ करता है क्योंकि उसे डर है कि उसकी नाव कहीं स्त्री न बन जाए अहिल्या की तरह। यह आख्यान भी मैंने अन्य कहीं नहीं देखा है।
यदि मेरे पाठकों ने इन कथाओं को किसी अन्य स्थान पर पढ़ा है तो अवश्य लिखें और मेरी जिज्ञासा शान्त करें।
---लक्ष्मीनारायण गुप्त
---१९ फरवरी २०१०