Thursday, February 25, 2010

परदेशियों की होली



परदेशियों की होली है

न हँसी है, न ठिठोली है

जैसे बंजर में घास नहीं उगती है

यहाँ रंग की फुहार नहीं चलती है

रंग बिना होली बेरंग होती है

बिना चीनी की चाय फीकी होती है

बिना हुड़दंग के यह कैसी होली है

जैसे बिन भंग की ठंडाई घोली है

जो सभ्यता से खेली वह कैसी होली है

जो दिल खोल के खेली यारो वही होली है

न उपले हैं,न आग है, यह कैसी होली है

न धुलहठी, न फाग है, यह कैसी होली है

होली के नाम पर यह कैसी ठिठोली है

परदेशियों की होली है

न हँसी है, न ठिठोली है


---लक्ष्मीनारायण गुप्त

---२५ फरवरी २०१०


Friday, February 19, 2010

तुलसी की मौलिकता



बहुत दिनों से मेरे मन में यह प्रश्न है कि रामचरितमानस की कुछ कथायें तुलसी की स्वनिर्मित हैं या उनका स्रोत अन्य रामायणों या पुराणों में है।


जैसा कि विद्वान पाठकों को ज्ञात होगा कि मानस में रामकथा चार सम्वादों में सुनाई जा रही है:

१। शिव-पार्वती

२। कागभुसुन्डि-गरुड़

३। याज्ञवल्क्य-भारद्वाज

४। तुलसी-मानस पाठक


अब शिव-पार्वती सम्वाद का कारण क्या है? पार्वती जब सती रूप में हैं राम को सीता-हरण के बाद वन में देखती हैं। सती राम की परीक्षा के लिए सीता का वेष लेकर उनके पास जाती हैं। राम उनसे प्रश्न करते हैं कि शिव कहाँ है और वे वन में अकेली क्यों फिर रही हैं। सती निरुत्तर होकर शिव के पास लौट जाती हैं। शिव के पूछने पर कहती हें कि उन्होंने कोई परीक्षा नहीं ली। बस उन्हींकी तरह केवल राम को प्रणाम किया है। शिव को योगवल से पता चल जाता है कि सती ने सीता का वेष ग्रहण किया था और वे मानसिक संकल्प करते हैं कि अब सती के इस शरीर से उनका प्रेम-सम्बन्ध नहीं हो सकेगा क्यों कि शिव सीता को माता-स्वरूप मानते हैं। कुछ समय बाद सती पिता दक्ष के यज्ञ में शिव के भाग को न देख कर स्वयं को यज्ञ की अग्नि में जला देती हैं। फिर सती का जन्म हिमाचल की पुत्री पार्वती के रूप में होता है और वे तप के द्वारा शिव को पति के रूप में प्राप्त करती हैं। इस विवाह के बाद वे शिव से राम-कथा सुनने की प्रार्थना करती है और इस प्रकार राम-कथा शिव-पार्वती सम्वाद के रूप में प्रकाश में आती है।।


सती के दक्ष के यज्ञ में शरीर-त्याग की कथा कई पुराणों में आती है किन्तु सती का सीता का वेष रखने का जिक्र मैंने कही नहीं देखा है। तो प्रश्न उठता है कि यह तुलसी की अपनी कल्पना है या इसका कोई पौराणिक स्रोत है।


अब कागभुसुन्डि-गरुड़ सम्वाद को लीजिए। जब मेघनाद राम को नाग-पाश से बाँध देता है गरुड़ आकर उन्हें मुक्त करते है। गरुड़ को भ्रम होता है कि यदि राम वस्तुत: अवतार हैं तो वे नाग-पाश में कैसे बँधे। इस भ्रम के निवारण के लिए वे शिव के पास जाते हैं किन्तु शिव उन्हें कागभुसुन्डि के पास भेजते हैं क्यों कि "खग जानै खग ही कै भाषा।" क्या कागभुसुन्डि का किरदार तुलसी की अपनी कल्पना है क्योंकि मैंने यह नाम किसी भी अन्य स्थान पर नहीं देखा है?


बालकाण्ड में राजा प्रतापभानु की कथा आती है। राजा प्रतापभानु एक यज्ञ करते हैं जिसमें मित्र बने हुए एक शत्रु के षड़यंत्र से नरमांस ब्राह्मणों को परोसा जाता है। इस पाप के कारण राजा प्रतापभानु को अगले जन्म में रावण बनना पड़ता है। जहाँ तक मुझे ज्ञान है प्रतापभानु की कहानी किसी पुराण में नहीं है।


लोकप्रिय लक्ष्मण-परसुराम सम्वाद भी न मैं ने किसी अन्य रामायण में देखा है न किसी पुराण में।


अयोध्याकाण्ड में केवट राम के पैर पखारने का हठ करता है क्योंकि उसे डर है कि उसकी नाव कहीं स्त्री न बन जाए अहिल्या की तरह। यह आख्यान भी मैंने अन्य कहीं नहीं देखा है।


यदि मेरे पाठकों ने इन कथाओं को किसी अन्य स्थान पर पढ़ा है तो अवश्य लिखें और मेरी जिज्ञासा शान्त करें।


---लक्ष्मीनारायण गुप्त

---१९ फरवरी २०१०


Wednesday, February 03, 2010

वायाग्रा का मूल



कुछ भारतीयों का विश्वास है कि भारत हर वस्तु या आविष्कार का मूल स्थान है। ऐसा विश्वास करने वालों के लिए कुछ 'तथ्य' प्रस्तुत कर रहा हूँ:


१। वायाग्रा का मूल भारत है क्योंकि यह शब्द संस्कृत शब्द व्याघ्र से बना है:


व्याघ्र --> व्याघ्रा -->वायाग्रा (अपभंश)


२। कनाडा कुछ कन्नड़ भाषा भाषियों ने बसाया होगा तभी तो कनाड़ा नाम पड़ा है।


३। अमेरिका के आदिवासियों को इन्डियन कहा जाता है। आपको शायद पता नहीं होगा कि ये लोग वास्तव में भारतीय ही हैं। जब त्रेता युग में सुग्रीव ने वानरों को पाताल देश भेजा तब उनसे कहा गया था कि यदि सीता का पता नहीं लगा पाओगे तो लौटने पर मृत्यु के भागी बनोगे। आप यह तो जानते ही होंगे कि ये वानर मनुष्य ही थे।


वानर = वन में रहने वाला नर


जब ये बिचारे वानर सीता का पता नहीं लगा पाए तो यहीं अमेरिका में ही रह गए। इस बात के कुछ प्रमाण अभी भी पाए जाते है। राचेस्टर नगर में- जहाँ मैं रहता हूँ- जेनेसी नदी बहती है। अवश्य ही इस नदी का नाम गणेशी रहा होगा जो कालांतर से जेनेसी बन गया।


४। दक्षिण भारत में प्राचीन काल में पल्लव राजा राज्य करते थे। ये जब उत्तर में ईरान पहुँचे तो पहलवी बन गए। ईरान के आखिरी सम्राट का नाम शाह रज़ा पहलवी था। वास्तव में कुछ पाश्चात्य विद्वानों ने इसका उल्टा कहा है। मेरे विचार में उनका यह विचार कोरा पागलपन है।


---लक्ष्मीनारायण गुप्त

---३ फरवरी २०१०