अच्छा नहीं दोस्तो मेरे
मरने के पहले मर जाना
जब तक स्वास चल रही प्यारे
जीने का तुम लुत्फ़ उठाना
जब तक मदिरा है प्याली में
पीते जाना, पीते जाना
अमृत मिल रहा है जीवन में
उसको प्यारे क्यों ठुकराना
गरल मिल रहा है तो भी क्या
शिव की तरह पान कर जाना
भला बुरा जो भी आ जाए
सामना तुम करते ही जाना
मौत आज आ जाए
या फिर वर्षों जीते जाना
जब तक जीवन बाकी प्यारे
जीते जाना, जीते जाना
मौत आ गई तो क्या ग़म है
नहीं पड़ेगा है पछताना
अच्छा नहीं दोस्तो मेरे
मरने के पहले मर जाना
---लक्ष्मीनारायण गुप्त
---३ मई २०१०
10 comments:
bahut bahut badhai
shekhar kumawat
बहुत सही!!
शेखर जी एवं समीर जी,
टिप्पणी डालके उत्साह बढ़ाने के लिए धन्यवाद।
आपकी कविता बहुत ही सुन्दर लगी, आशा से भरी हुई..
धन्यवाद...
इस कविता को मैं चर्चा मंच में शामिल कर रही हूँ..
http://charchamanch.blogspot.com/
'अदा' जी,
बहुत बहुत धन्यवाद। चर्चामंच में सम्मिलित करने के लिए आभार।
वाह क्या बात है !
उम्मीद और हौसला से भरी हुई रचना !
achha srajan
बहुत सही कहा आपने
"सैल" जी, "नटखट" जी एवं मथुरा जी,
आपकी टिप्पणियों ने मेरा हौसला बढ़ाया है। धन्यवाद।
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