Monday, May 03, 2010

अच्छा नहीं



अच्छा नहीं दोस्तो मेरे

मरने के पहले मर जाना

जब तक स्वास चल रही प्यारे

जीने का तुम लुत्फ़ उठाना

जब तक मदिरा है प्याली में

पीते जाना, पीते जाना

अमृत मिल रहा है जीवन में

उसको प्यारे क्यों ठुकराना

गरल मिल रहा है तो भी क्या

शिव की तरह पान कर जाना

भला बुरा जो भी आ जाए

सामना तुम करते ही जाना

मौत आज आ जाए

या फिर वर्षों जीते जाना

जब तक जीवन बाकी प्यारे

जीते जाना, जीते जाना

मौत आ गई तो क्या ग़म है

नहीं पड़ेगा है पछताना

अच्छा नहीं दोस्तो मेरे

मरने के पहले मर जाना


---लक्ष्मीनारायण गुप्त

---३ मई २०१०

10 comments:

Shekhar Kumawat said...

bahut bahut badhai

shekhar kumawat

Shekhar Kumawat said...
This comment has been removed by a blog administrator.
Udan Tashtari said...

बहुत सही!!

Laxmi N. Gupta said...

शेखर जी एवं समीर जी,

टिप्पणी डालके उत्साह बढ़ाने के लिए धन्यवाद।

'अदा' said...

आपकी कविता बहुत ही सुन्दर लगी, आशा से भरी हुई..
धन्यवाद...
इस कविता को मैं चर्चा मंच में शामिल कर रही हूँ..

http://charchamanch.blogspot.com/

Laxmi N. Gupta said...

'अदा' जी,

बहुत बहुत धन्यवाद। चर्चामंच में सम्मिलित करने के लिए आभार।

Indranil Bhattacharjee ........."सैल" said...

वाह क्या बात है !
उम्मीद और हौसला से भरी हुई रचना !

राजेन्द्र मीणा 'नटखट' said...

achha srajan

मथुरा कलौनी said...

बहुत सही कहा आपने

Laxmi N. Gupta said...

"सैल" जी, "नटखट" जी एवं मथुरा जी,

आपकी टिप्पणियों ने मेरा हौसला बढ़ाया है। धन्यवाद।