विद्वान पाठकों को पता होगा कि चीनी बुद्ध भिक्षु ह्वेनसांग सातवीं शताब्दी में हर्षवर्धन के राज्यकाल में भारत की तीर्थ यात्रा और बौद्ध धर्म के ग्रन्थ जुटाने आया था। इस ह्वेनसांग के बारे में यह कहानी प्रोफेसर माल्कम डेविड एकेल द्वारा दिए एक बौद्ध धर्म के कोर्स में सुनी।
कहते हैं जब ह्वेनसांग भारत में यात्रा कर रहा था और गंगा नदी के निचले मैदान में कहीं पर था तब उसके कबीले पर कुछ डाकुओं ने हमला किया। ये डाकू दुर्गा के भक्त थे और दुर्गा पर बलि चढ़ाने के लिए किसी व्यक्ति की तलास में थे। उन्हें लगा कि गोल मटोल चीनी भिक्षु बलि चढ़ाने के लिए बहुत उत्तम रहेगा। ह्वेनसांग ने दुर्गा भक्त डाकुओं से प्रार्थना की वे उसे कुछ समय दें जिससे वह अपनी आखिरी पूजा कर सके और अपने आप को बलिदान के लिए प्रस्तुत कर सके। डाकुओं ने उसकी बात मान ली।
आपको शायद मालूम होगा कि आगामी बुद्ध का नाम मैत्रेय है जो इस समय स्वर्ग में हैं और उपयुक्त समय की प्रतीक्षा कर रहे हैं। ह्वेनसांग ने बोधिसत्व मैत्रेय का ध्यान किया। कहते हैं उसी समय एक भयंकर तूफान आया। हवा; पानी और बिजली का प्रकोप होने लगा। डाकुओं के होश हवास उड़ने लगे और उन्होंने अन्य यात्रियों से पूछा कि यह भिक्षु कौन है। उन्होंने बताया कि यह कोई साधारण भिक्षु नहीं है अपितु परम विद्वान ह्वेनसांग हैं जो भारत की तीर्थयात्रा पर आये हैं। भिक्षु ह्वेनसांग के चरणों पर गिरे और हिंसा का मार्ग छोड़ कर बौद्ध धर्म के अनुयायी बन गए।
---लक्ष्मीनारायण गुप्त
---२४ अप्रैल २०१०
1 comment:
A slight correction to the story, Durga Bhaktas never indulge in human sacrifice. Kali bhaktas do.Kali emanated from the body of katyayini to destroy Chanda & Munda (ref. Markandeya Purana).Most of the dacoits and thugs were kali bhaktas ( Ref. Col. Vincent Sleeman)
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