Wednesday, March 10, 2010

देवताओं का पसीना


महाभारत में नल-दमयन्ती आख्यान में यह प्रसंग आता है। दमयन्ती का स्वय्म्वर हो रहा है। दमयन्ती नल को वर के स्वरूप में चुनना चाहती है किन्तु सभा में पाँच व्यक्ति हैं जो नल जैसे लग रहे हैं। नल के अतिरिक्त इन्द्र, वरुण, अग्नि और यम भी नल के वेष में आए हैं। दमयन्ती देवताओं की शरण में जाती है और नल को पहचानने की शक्ति की प्रार्थना करती है। देवता प्रसन्न होकर उसे ज्ञान देते है जिसके अनुसार देवताओं को पसीना नहीं आता, उनकी पलकें नहीं ज्ञपकतीं और उनके गले की पुष्पमाला नहीं कुम्हलाती।


इस प्रकार हम जानते हैं कि देवताौं को पसीना नहीं आता। अब इसीसे सम्बन्धित दूसरा प्रश्न पूछिए: क्या देवता लोग खाते, पीते हैं या नहीं और यदि खाते हैं तो मल मूत्र भी विसर्जन करते हैं कि नहीं। इस प्रश्न का उत्तर मुझे किसी पुराण में नहीं मिला।


अब यही प्रश्न आप अवतारों के बारे में उठा सकते हैं: क्या भगवान राम या कृष्ण को मल-मूत्र विसर्जन की आवश्यकता पड़ती थी या नहीं। इस सवाल का जवाब भी कहीं नहीं मिला। मैंने यह प्रश्न बचपन में अपने घर में भी किया था तब पिता जी बहुत नाखुश हुए थे।


ईसाइयों ने इस सवाल पर गौर किया है कि ईसा मसीह मल-मूत्र विसर्जन करते थे कि नहीं। ईसाई विचारक वैलेन्टियस (दूसरी शताब्दी ईसवी) ने कहा कि ईसा खाते पीते तो थे किन्तु मल-मूत्र नहीं त्याग करते थे।


जैसे हम सब के सामने मल-मूत्र त्याग नहीं करना चाहते वैसे ही खुले आम सेक्स भी नहीं करना चाहते। ये सारी प्रक्रियायें शर्मनाक मानी जाती हैं। ईसाइयों ने प्रश्न उठाया कि आदम और हव्वा शैतान के बहकावे में आकर ज्ञान का सेव खाने के पहले सम्भोग करते थे कि नहीं। चौथी शताब्दी में सन्त जीरोम ने कहा कि वे कदापि सम्भोग नहीं करते थे। जोहानस स्काट एरीगेना के अनुसार वे सम्भोग तो करते थे किन्तु किसी उत्तेजना का अनुभव नहीं करते थे। आदम का लिंग उसकी इच्छा के अनुसार वैसे ही खड़ा हो जाता था जैसे हम अपने हाथ पैर उठाते हैं।


मुझे लगता है कि आदम और हव्वा को जब ज्ञान प्राप्त हुआ कि वे नंगे हैं तभी उन्हें मल-मूत्र के गंदे होने का ज्ञान हुआ होगा और खुले आम मल-मूत्र विसर्जन में शर्म का अनुभव हुआ होगा। मुझे लगता है कि बहुत सारे भारतीय अभी भी आदम और हव्वा की तरह स्वर्ग में हैं। उन्होंने ज्ञान का सेव अभी तक नहीं खाया है इसी लिए किसी को खुले आम रेल की पटरी के किनारे और सड़कों के किनारे मल-मूत्र त्याग करने में कोई हिचक नहीं होती।


---लक्ष्मीनारायण गुप्त

---१० मार्च २०१०

6 comments:

Udan Tashtari said...

सेब तो खा लिया है सबने मगर कईयों को उसके दाम का अंदाजा नहीं है, बस!!

अभय तिवारी said...

बढ़िया पोस्ट!

वन्दना अवस्थी दुबे said...

बहुत बढिया पोस्ट. हां, ईश्वर के मामले में ऐसा कोई भी सवाल करने पर बडे आज भी नाखुश ही होते हैं.

निशांत मिश्र - Nishant Mishra said...

सेब तो मुझे अच्छा नहीं लगता लेकिन टॉयलेट में कुछ पल सुकून भरे मिलते हैं.

यदि देवी-देवता शौचादि करते हैं तो उसकी व्यवस्था कैसी होती होगी. संभव है कि उनहोंने स्वयं को एक स्टैंडिंग इंस्ट्रक्शन दे रखा हो कि कुछ भी खा-पी लें पर मल-मूत्रादी उत्पन्न न हो.

लेकिन यदि मल-मूत्रादी उत्पन्न ही न हों तो उत्सर्जन अंगों का क्या औचित्य रह जायेगा?

क्या देवताओं का मल-मूत्रादी पवित्र एवं दिव्य नहीं माना जाना चाहिए?

Laxmi N. Gupta said...

समीर जी, अभय जी, वन्दना जी एवं निशान्त जी,

प्रोत्साहन के लिए धन्यवाद। निशांत जी, आपकी बात सही है। संतोषजनक मल-मूत्र त्याग में जो सुकून मिलता है वह पृथ्वी पर स्वर्ग जैसा है। दूसरा स्वर्ग जैसा आनंद सेक्स में मिलता है जिसकी सभी साधु-संत निंदा करते हैं।

Swapnil said...

मजेदार, लेकिन शौच का जिक्र या चर्चा तो लिंकन या चर्चिल को लेकर भी नही है। क्या ये भी 'रोके' बैठे थे? इशारा काफी है ;-)