Thursday, February 25, 2010

परदेशियों की होली



परदेशियों की होली है

न हँसी है, न ठिठोली है

जैसे बंजर में घास नहीं उगती है

यहाँ रंग की फुहार नहीं चलती है

रंग बिना होली बेरंग होती है

बिना चीनी की चाय फीकी होती है

बिना हुड़दंग के यह कैसी होली है

जैसे बिन भंग की ठंडाई घोली है

जो सभ्यता से खेली वह कैसी होली है

जो दिल खोल के खेली यारो वही होली है

न उपले हैं,न आग है, यह कैसी होली है

न धुलहठी, न फाग है, यह कैसी होली है

होली के नाम पर यह कैसी ठिठोली है

परदेशियों की होली है

न हँसी है, न ठिठोली है


---लक्ष्मीनारायण गुप्त

---२५ फरवरी २०१०


7 comments:

Udan Tashtari said...

परदेशियों की होली है
न हँसी है, न ठिठोली है...


-फिर भी होली मुबारक!! :)

अनूप शुक्ल said...

जायज बात कहते हैं आप! होली मुबारक!

Laxmi N. Gupta said...

समीर जी, अनूप जी,

बहुत धन्यवाद। आपको भी होली मुबारक।

Anonymous said...

ek prawassi kii peeda ke theek-theek sampreshan ke liye badhaiyan.
Rang Parv kii shubhkaamnaayen.

ashutosh madhav

मथुरा कलौनी said...

लक्ष्‍मी जी
होली मुबारक

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

Holi Mubarak ho ji ...
Sach likha hai, itnee Barf giree hai tub kya HOLI ....

शुद्ध मराठी said...

आप परदेस में किस प्रकार से होली खेलते हैं?