Wednesday, September 23, 2009

भक्त की भगवान पर जीत

कल्पना करिए महाभारत युद्ध की। भीष्म पितामह पांडवों की सेना को गाजर मूली की तरह काट रहे हैं। दूसरी तरफ वही काम अर्जुन और भीम वही काम कौरव सेना पर कर रहे हैं। भगवान कृष्ण ने प्रण कर रखा है कि वे इस युद्ध में शस्त्र ग्रहण नहीं करेंगे; केवल अर्जुन के सारथी रहेंगे। उधर भीष्म पितामह ने प्रतिज्ञा की है कि वे अगले दिन के युद्ध में भगवान को शस्त्र धारण करने के लिए लाचार कर देंगे। भीष्म भगवान के परम भक्त हैं। इस भीषण रण के मध्य यह भक्त और भगवान का प्रेम-युद्ध हो रहा है। सूरदास जी के सुन्दर पद में भीष्म पितामह का यह प्रण पढ़िए:

आजु जो हरिहिं न सस्त्र गहाऔं
तौ लाजौं गंगा जननी को सांतनु सुत न कहाऔं
स्यंदन खंडि, महारथ खंडौं, कपिध्वज सहित हिलाऔ
इती न करौं सपथ मोहिं हरि की छत्रिय गतिहिं न पाऔं
पांडव दल संमुख ह्वै धावौं सरिता रुधिर बहाऔं
सूरदास रण विजय सखा कौं जियत न पीठि दिखाऔ

(स्यंदन = रथ, कपि ध्वज = अर्जुन के रथ की पताका, विजय सखा = विजय (अर्जुन) के सखा श्रीकृष्ण, रुधिर = खून)
आज यदि मैं ने भगवान को हथियार उठाने को मजबूर नहीं किया तो मैं माँ गंगा को लज्जित करूँगा और शान्तनु का पुत्र कहलाने के योग्य नहीं रहूँगा। में अर्जुन के महारथ के टुकड़े टुकड़े कर दूँगा और उस रथ के कपिध्वज को हिला दूँगा। मुझे भगवान कृष्ण की शपथ है कि यदि मैं ऐसा न कर सकूँ तो मुझे क्षत्रिय की गति न मिले। मैं पांडव सेना के सामने दौड़ूँगा और रक्त की नदी बहा दूँगा किन्तु मैं अर्जुन के सखा कृष्ण को जीतेजी पीठ नहीं दिखाऊँगा।

युद्ध में अर्जुन पितामह के बाणों से तिलमिला उठे हैं। पांडव सेना में हाहाकार मचा हुआ है। अब भगवान से नहीं रहा जाता; वे रथ से कूद कर सुदर्शन चक्र धारण कर पितामह के रथ की तरफ दौड़ते हैं। सूरदास जी कहते हैं:

मो परतिग्या रहै कि जाय
इत पारथ कोप्यौ है हम पै, उत भीषम भटराय
रथ ते उतरि चक्र धरि प्रभु, सुभटहिं संमुख आयौ
ज्यौं कंदर तें निकसि सिंह झुकि गजजूथनि पै धायो
आय निकट श्रीनाथ बिचारी परी तिलक पर दीठि
सीतल भई चक्र की ज्वाला हरि हँसि दीन्हीं पीठि
जय जय जन वत्सल स्वामी सांतनु सुत यों भाखै
तुम बिन कौन दुसरो प्रभु जी जो मेरो पन राखै
साधु साधु सुरसरी सुवन मैं पन लागि डराँ
सूरदास भगत की दिसि पै का मैं चक्र चलाँ

( भटराय = श्रेष्ठ योद्धा, कंदर = कंदरा, गुफा , निकसि = निकल कर, गजजूथ = हाथियों का झुंड, दीठि = दृष्टि, भाखैं= कहते हैं, सुरसरी सुवन = गंगापुत्र भीष्म, पन = प्रण, डराँ = डरा, दिसि = दिशा में, ओर)

भगवान जब भीष्म के रथ के पास पहुते है और भीष्म के वैष्णव तिलक की ओर देखते हैं, चक्र की ज्वाला शीतल हो जाती है और भगवान हँसते हुए पीठ दिखा देते हैं। वे कहते है कि मैं भक्त से डर गया। मैं भक्त पर शस्त्र कैसे चला सकता हूँ।

सूरदास इस मनोहर दृश्य का विस्मरण नहीं कर सकते। कहते हैं:

वा पटपीत की फहरानि
कर धरि चक्र चरन की धावनि, नहिं बिसरत वह बानि
रथ ते उतरि अवनि आतुर ह्वै पद रज की लपटानि
मानौं सिंह सैल तें निकस्यो महामत्त गज जानि
जिन गोपाल मेरो पन राख्यो मेटि बेद की कानि
सोई सूर सहाय हमारे निकट भये हैं आनि

(पट पीत = पीताम्बर, बानि = मुद्रा, धावनि =दौड़ना, सैल = शैल, पहाड़, अवनि = पृथ्वी, रज = धूल बेद = वेद, कानि = मर्यादा)

महाभारत युद्ध के भीषण नरसंहार के बीच यह भक्त और भगवान की लीला बड़ी ही अद्भुत और अविस्मरणीय है।

---लक्ष्मीनारायण गुप्त
---२३ सितम्बर २००९

Saturday, September 19, 2009

अहैतुकी कृपा

परमेश्वर ने अहैतुकी कृपा कर डाली
घूस की रकम जज साहब ने खा ली
मौत की घटा सर पर से टाली
मौत तो क्या सजा भी नहीं हुई साली
परमेश्वर ने----

पूरी बारदात आपको सुनाता हूँ
मेरा राज़ है, किसी को नहीं बताता हूँ
हुई थी जब मेरी शादी
ससुर जी ने दहेज की रकम दी सिर्फ आधी
बीवी ने कहा मेरे बाप पर रहम करो
मेरी सारी तनख्वाह आप खुद ही रख लो
वह तो हम वैसे ही थे रखने वाले
पत्नी की पगार पति का अधिकार है, बाले
बाप से कह कर बाकी दहेज दिलाओ
नहीं तो अपनी जान से हाथ गँवाओ
पत्नी ने सोचा मैंने यह बात केवल गुस्से में कह डाली
मेरे मन की बात नहीं समझी कम अक्ल वाली
परमेश्वर ने---

एक दिन बड़ा झगड़ा झंझट हुआ
मेरे बाप और मैंने उसका गला दबोच दिया
फिर उसको सीलिंग फैन से लटका दिया
खुदकुशी का मामला है पुलिस को बता दिया
सरकार ने लेकिन कत्ल का मुकदमा चलाया
उसके माँ-बाप ने बड़ा जतन कराया
हमने भी पानी सा पैसा बहाया
कृपा करके जज ने हमारा पैसा खाया
फैसला हमारे हक में सुनाया
उसके घर वालों की फजीहत कर डाली
झूठी गवाही की तोहमत लगा डाली
परमेश्वर ने---

ऊपर वाले की महिमा किसने है जानी
अब हम फिर से करेंगे शादी
नए प्रस्ताओं की भरमार है आली
रिश्वत से दूना पैसा भरेगी नई घरवाली
परमेश्वर ने---

(यह दु:खद घटना कई साल पहले मेरे एक प्रिय मित्र की पुत्री के साथ घटी। लोअर कोर्ट ने बाप-बेटे को दोषी ठहराया लेकिन अपील कोर्ट ने हत्यारों को ससम्मान बरी कर दिया।)

---लक्ष्मीनारायण गुप्त
---१९ सितम्बर २००९

Friday, September 18, 2009

सुलेमान की अँगूठी



सुलेमान, अंग्रेज़ी में सालोमन, हिब्रू में श्लोमो (९७१-९३१ ईसा पूर्व) यहूदियों का बहुत प्रतापी सम्राट था। इसका पिता सम्राट डेविड भी बहुत प्रख्यात था। सुलेमान ने यहूदियों के मन्दिर का निर्माण कराया। कहते हैं इसके बनाने में डेढ़ लाख विदेशी मज़दूर, तीन हजार यहूदी फोरमेन और २०,००० दासों ने काम किया।


सुलेमान की बुद्धिमानी के कृत्य मशहूर हैं। बाइबल में आई सुलेमान-गीता (Song of Solomon) भी जानी-मानी है।


इसी सुलेमान का राज्य दैत्यों के राजा आश्मेडाइ ने छल के द्वारा छीन लिया। उसने सुलेमान की तरह बोलना, उठना, बैठना, हाव-भाव और उसका वेष धारण कर लिया था। जब दैत्य उसकी जगह राज्य कर रहा था तब सुलेमान दर-दर भटक रहा था और लोगों से कह रहा था कि वह असली सुलेमान है। तीन साल भटकने के बाद किसी प्रकार उसने अपना राज्य फिर हासिल किया।


इस घटना के बाद सुलेमान ने एक जादुई अँगूठी बनवाई जिसमें कुछ अद्भुत शक्तियाँ निहित थीं। जब वह बहुत दु:खी होता था तब अँगूठी पहनने से फिर आनन्दित हो जाता था। यदि बहुत सुखी होता था तो अँगूठी पहनने से उसका दु:ख लौट आता था। इसका रहस्य क्या था? अँगूठी पर तीन हिब्रू शब्द अंकित थे:" गम ज़े यावोर" यानी यह भी बीत जाएगा।


एक संस्कृत कहावत है जिसका भी लगभग यही अर्थ है: "चक्रवत् परिवर्तन्ते सुखानि च दु:खानि च" अर्थात् सुख और दु:ख घूमते हुए पहिए की तरह बदलते रहते हैं।


---लक्ष्मीनारायण गुप्त

---१८ सितम्बर २००९


Thursday, September 17, 2009

सुमेध और सोमवन् - एक पौराणिक कथा



यह अद्भुत कथा लिंग-परिवर्तन और भक्त की महिमा के बारे में है। सच्चे भक्त की भावना को भगवान भी असफल नहीं कर सकते हैं। यह कथा स्कन्द पुराण (सन् ७००-११५० ईसवी) में आती है।


एक समय वेदमित्र और सारस्वत नामके दो ब्राह्मण मित्र थे। वेदमित्र के पुत्र सुमेध और सारस्वत के मित्र सोमवन् में प्रगाढ़ मित्रता थी। दोनों साथ साथ पढ़ते, खाते पीते और उठते बैठते थे। दोनों को वेद, पुराण, ललित कलाओं और युद्ध विद्या की शिक्षा दी गई। दोनों की उम्र जब १६ वर्ष की हो गई, उनके पिताओं ने उन्हें विदर्भ-नरेश के पास अपनी कलाओं का प्रदर्शन और धन-प्राप्ति के लिए भेजा जिससे वे विवाह करके ग्रहस्थ जीवन का प्रारम्भ कर सकें। विदर्भ-नरेश उनकी कला से प्रसन्न हुए किन्तु धन मांगने पर कहा, " तुम दोनों एक ब्राह्मण-दम्पति की तरह निषाद रानी सीमन्तिनी के पास जाओ। वह हर सोमवार को शिव-पार्वती की पूजा करती है और ब्राह्मण-दम्पतियों को अपार धन देती है।" बालकों ने विरोध किया कि भक्त को धोखा देना उचित नहीं है किन्तु राजा ने आग्रह करके उन्हेँ भेज ही दिया। सोमवन् ने स्त्री का वेष बनाया और सोमवती नाम रखा। सीमन्तिनी ने उनका आदर किया और यह देख लिया कि सोमवन्ती स्त्री नहीं पुरुष है। यह जानते हुए भी उसने सुमेध की पूजा महेश्वर की तरह और सोमवती की पूजा गौरी की तरह की और दक्षिणा में विपुल धन दिया।


जब दोनों लौटते हुए एक रमणीक स्थान से गुजर रहे थे, सोमवती बने हुए सोमवन् ने सुमेध से कहा, "हे सौम्य मेरी तरफ देखो। मैं कामाग्नि में जल रही हूँ। इस रमणीक स्थान में मेरे साथ सम्भोग करो।" बिचारे सुमेध ने विरोध किया कि वह भूल गया है कि वह स्त्री नहीं पुरुष है। सोमवती ने कहा, "मेरी तरफ देखो, मेरे उरोजों को देखो। मैं स्त्री हूँ और काम से व्याकुल हूँ।" सुमेध ने कहा कि यह शास्त्रोचित नहीं है और ब्राह्मणों के योग्य व्यवहार नहीं है। कामातुर सोमवती ने बलपूर्वक सुमेध के अधरों का चुम्बन लिया। घर पहुँचने पर सोमवन् के पिता सारस्वत उसे लेकर विदर्भ-नरेश के पास गए। राजा ने अपने गुरु भारद्वाज के साथ अम्बिका की पूजा की। देवी प्रसन्न होकर प्रकट हुईं और राजा से पूछा कि वह क्या चाहता है। राजा ने प्रार्थना की सोमवती को फिर से पुरुष बना दिया जाए क्योंकि सोमवन् सारस्वत का इकलौता पुत्र है। देवी ने कहा कि भक्त की भावना को मिथ्या करना सम्भव नहीं है किन्तु सारस्वत को एक और पुत्र होगा जो सोमवन् से भी अधिक पवित्र हृदय का और गुणवान होगा। इसके बाद सुमेध और सोमवती विवाह बन्धन में बँधे।


इस कथा में समलैंगिकता का पुट है या नहीं, इसका निर्णय विद्वान पाठक स्वयं करें।


सन्दर्भ: Same Sex Love in India: Readings from Literature and History by Ruth Vaneeta & Saleem kidwai


---लक्ष्मीनारायण गुप्त

---१७ सितम्बर २००९

Wednesday, September 16, 2009

पदन पोखरिया



यह कहानी एक कहानी का अंश मात्र है, जो मेरी माँ मेरे बचपन में सुनाया करती थीं। पूरी कहानी मुझे याद नहीं है।


एक बार एक बारात पैदल ही वधू के गाँव जा रही थी। बाराती रास्ता भूल गए थे। एक गाँव से गजरते हुए देखा कि कुछ लड़कियाँ एक तालाब (पोखरा) पर नहा रही थीं। दूल्हे मियाँ साहस करके एक लड़की के पास रास्ता पूछने पहुँचे। तब तक उस लड़की ने पाद दिया तो दूल्हे जी को हँसी आ गई। उस लड़की ने फट से कहा:


पदन पोखरिया पद्दै गाँव

पद्दी बैठे गंग नहाँय

कौन गाँव ना पद्दा जहँ कन्थ बिहाअन जाँय


बाद में पता चलता है कि इसी लड़की से दूल्हे जी की शादी होने वाली थी। ऐसा गूढ़ दार्शनिक सवाल शायद ही किसी की होने वाली बीवी ने कभी अपने होने वाले पति से पूछा हो। आपका क्या ख़्याल है?


---लक्ष्मीनारायण गुप्त

---१६ सितम्बर २००९

Tuesday, September 15, 2009

वो ससुरा कछु समझत नाहीं



एक समय एक गाँव में एक ज़मीनदार (शायद अंग्रेज़ी पढ़ा लिखा) रहता था जिसे गाना सुनने का बड़ा शौक था। जो भी उसके दरवाजे से निकलता था उनसे वह गाना सुनने का अनुरोध करता था। यदि किसी ने मना किया तो ज़ोर-जबर्दस्ती भी करता था। एक बार एक किसान दम्पति उसके घर के सामने से गुज़र रहे थे, अपने खेत की तरफ जाते हुए। ज़मीनदार ने उन्हें बुलाया और गाना सुनाने के लिए कहा। किसान ने कहा कि उसे गाना नहीं आता है। बार-बार मना करने पर ज़मीनदार ने अपने गुर्गों से उसकी पिटाई करवानी शुरू कर दी। बिचारा किसान क्या करता, उसने गाना शुरू किया:


ससुरा मारि मारि गौवावति है


किसान की पत्नी ने कहा,"यह क्या कर रहे हो, समझेगा तो और मारेगा।" इस सम्वाद से किसान को गाने की दूसरी पंक्ति मिल गई:


वो ससुरा कछु समझत नाहीं, या ससुरी समझावति है


बहरहाल थोड़ा और गाने पर किसान को छुटकारा मिला और पुरस्कार भी। इसके अतिरिक्त मिला ज़मीनदार को गाली देने से मिलने वाला अभूतपूर्व सन्तोष।


---लक्ष्मीनारायण गुप्त

---१५ सितम्बर २००९

Monday, September 14, 2009

एक लघु बोध-कथा



यह एक यहूदी परम्परा से जुड़ी जन-कथा है।


कहते हैं कि जब नोआ की नाव में सभी जानवरों के जोड़े सवार हो रहे थे तब एक अजीब आकृति का जानवर आया जो नाव पर सवार होना चाहता था। उसको बताया गया कि अकेले को चढ़ने की आज्ञा नहीं है। इस जानवर का नाम असत्य था। मना किये जाने पर इसने एक उतना ही अजीब साथी ढूँढ़ा। इस साथी का नाम था अनर्थ। इसी लिए जब असत्य का आचरण किया जाता है तो अनर्थ घटित होना अवश्यम्भावी है।


---लक्ष्मीनारायण गुप्त

---१४ सितम्बर २००९

Friday, September 11, 2009

एक बोध-कथा



यह कहानी यहूदियों की बाइबल से है। नोआ और बाढ़ की कहानी सभी को पता है। नोआ जब अपने आर्क यानी नाव में सभी जीवों के जोड़ों को कठिन यात्रा के साथ सही सलामत सूखी भूमि पर ले आया, सबसे पहले उसने अंगूर की बेलें शराब (वाइन) बनाने के लिये लगाईं। जैसे ही वे शराब बनाने के लायक हुईं, उसने शराब बनाई और खूब पी। पीने के बाद वह नंगा ही नशे में धुत सो गया जहाँ उसे उसके बेटे हैम ने देखा और शर्मिंदा किया।


कहते हैं कि शैतान ने जहाँ नोआ बेलें लगा रहा था, ज़मीन में एक भेड़ के बच्चे (लैम्ब), एक शेर, एक बन्दर और एक सुअर को दफना दिया था और उनका खून नोआ की बनाई शराब में था। इसी लिए एक ड्रिंक के बाद लैम्ब की तरह मृदुल स्वभाव का हो जाता है। दो ड्रिंक के बाद शेर की तरह ताकतवर महसूस करता है। तीन ड्रिंक के बाद बन्दर की तरह हास्यास्पद व्यवहार करता है और चार ड्रिंक के बाद सुअर की तरह घिनौना बरताव करता है।


---लक्ष्मीनारायण गुप्त

---११ सितम्बर २००९

Friday, September 04, 2009

सतयुग की शुरुआत



पहले यह पढ़िए:


http://www.reuters.com/article/oddlyEnoughNews/idUSTRE57I45C20090819


ज़्यादातर ख़बरें जो अख़बारों में छपती हैं

कलियुगी ज़माने की कुटिलता को व्यक्त करती हैं

किन्तु कभी कभी कोई ऐसी ख़बर आती है

जिससे लगता है सतयुग की शुरुआत होने वाली है

ऐसी ही एक ख़बर फिलहाल आई है

टाइम मैगज़ीन में इसने छोटी सी जगह पाई है (टाइम : ७सितम्बर, २००९)

आप सभी भाइयों और बहनों को यह अनुभव होगा

किसी भी बड़े शहर में पिकपाकेट्स का ख़तरा होगा

लेकिन अब एक अद्भुत घटना घटित हुई है

लंदन शहर से यह अनोखी ख़बर आई है

बीस भूतपूर्व पिकपाकेट्स ने यह संस्था बनाई है

वे अपने को पुटपाकेट्स कहते हैं

और आगे सुनिए वे क्या करते हैं

जैसाकि आप जानते हैं

आजकल सभी जगह बेरोज़गारी बढ़ रही है

आर्थिक व्यवस्था सिकुड़ती जा रही है

तो ये भूतपूर्व ज़ेबकतरे आपकी ज़ेब नहीं काटते हैं

बल्कि चुपके से उसमें दो-चार नोट डाल देते हैं

क्या वाकई में सतयुग की शुरुआत होने वाली है

या आपका ख़्याल है कि यह ख़बर जाली है


---लक्ष्मीनारायण गुप्त

---४ सितम्बर २००९