Wednesday, August 19, 2009

गधे की कीमत




क्या कभी आपने सोचा है कि गधा दुनिया का सबसे अधिक अपमानित जानवर है और इसमें इसकी अपनी कोई ग़लती नहीं है। यह बहुत ही मेहनती जानवर है जिसके बगैर कुम्हार और धोबी की जीविका नहीं चल सकती, कम से कम दक्षिण एसिया में। दिन रात बिना उफ़ किये काम करता है बस थोड़े से चारे के लिये। उसके पिछले पैरों में बेड़ी डाल दी जाती है जिससे वह दुलत्ती मार कर आत्मरक्षा भी नहीं कर सकता। जो आधा गधा है यानी खच्चर, वह भी भारी बोझा ढोकर इन्सान की महान सेवा करता है।


इन सेवाओं के बदले में समाज उसे क्या देता है: डंडे और गालियाँ। जो महा मूर्ख होता है उसकी तुलना गधे से की जाती है। अमरीका जैसे विकसित देश में भी जब कोई मूर्खता का काम करता है तो कहते हैं,"What an ass!"हालांकि आज तक किसी ने भी किसी गधे को ऐसी मूर्खता करते नहीं देखा। जब किसी को लज्जित और अपमानित करना होता है तो हमारे मुल्क में उसका मुंह काला कर गधे पर उलटा मुंह बिठा कर शहर में घुमाते हैं


मनुष्य तो मनुष्य, भगवान भी गधों के ख़िलाफ है। भगवान ने मछली का, वाराह का, कछुए का और सिंह का अवतार लिया किन्तु गधे के रूप में अवतार लेने का कभी सोचा भी नहीं।


यह सब विचार ऊपर दिये हुए चित्र से जागृत हुए। हैदराबाद में एक गधे और गधी का विवाह कराया गया। यह मुझे पता नहीं है कि कयों इन्द्रदेव गधे और गधी के विवाह से प्रसन्न होते हैं और बादलों को बरसने की आज्ञा देते हैं। बिचारे गधे की कद्र कोई तो करता है। मेरे बचपन में जब परिवार में किसी को शीतला (चेचक) निकलती थीं तो गधे को चने खिलाते थे। कहते थे इससे शीतला देवी प्रसन्न होकर चेचक का दु:ख निवारण करती हैं। ऐसा क्यों है, मुझे पता नहीं। ईसाइयों के धर्मग्रन्थ बाइबल में भी आया है कि ईसा मसीह जब आखिरी बार यरूसलम जाते हैं तो गधे पर चढ़ कर जाते हैं। लोग कहते हैं कि गरज पड़ने पर गधे को भी दादा कहना पड़ता है।


ओम् श्री रासभाय नम:


---लक्ष्मीनारायण गुप्त

---१९ अगस्त २००९



















Thursday, August 13, 2009

पंढरपुर के विठोबा



महाराष्ट्र के पंढरपुर नामक नगर में विठोबा (विट्ठल) और रुक्मिणी का मन्दिर है। इस मन्दिर से जुड़ी हुई कहानी बड़ी अद्भुत है।


कहते हैं कि पंढरपुर में पुन्डलीक नाम का एक युवक रहता था। उसकी भगवान विष्णु पर बहुत श्रद्धा थी और वह भगवान के दर्शन की इच्छा करता रहता था। उसकी परम भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान रात्रि में उसके दरवाजे पर आए किन्तु वह उस समय अपने माता-पिता की सेवा में इतना तल्लीन था कि वह पूरी सेवा-सुश्रुषा किये बिना भगवान का स्वागत तक नहीं कर सका। उसने भगवान के लिये एक ईंट रख दी और भगवान से इन्तज़ार करने के लिये कहा। माता-पिता की सेवा में सारी रात बीत गई और सवेरा हो गया। लोगों के मार्ग से निकलने का समय आ गया। ईंट पर हुए विष्णु ने अपने आपको मूर्ति में परिवर्तित कर दिया। पुन्डलीक की माता-पिता पर इतनी श्रद्धा से भगवान इतने प्रसन्न हुए कि सदा के लिये मूर्ति बन कर उसके पास आ गए। कोई भी कार्य जो पूर्ण श्रद्धा से किया जाता है वह प्रभु की पूजा की तरह है। पूर्ण श्रद्धा से अहंकार मिट जाता है और ऐसा होते ही सब प्रभुमय हो जाता है।


मान्यता है कि पंढरपुर के मंदिर में यही मूर्ति विराजमान है। मुझे नहीं पता कि राधा की जगह रुक्मिणी यहाँ पर क्यों हैं। जहाँ तक मुझे पता है कृष्ण और रुक्मिणी का यह केवल एक ही मंदिर है और सब जगह अधिकांश राधा और कृष्ण की पूजा होती है। जगन्नाथपुरी में कृष्ण, बलराम और सुभद्रा की पूजा होती है। पुरी के बारे में भी अवश्य कोई कहानी होगी। हो सकता है मेरे किसी पाठक को पुरी के बारे में ज्ञान हो। यदि ऐसा है तो अवश्य लिखें।


---लक्ष्मीनारायण गुप्त

---१३ अगस्त २००९

Tuesday, August 11, 2009

पापी की उम्र


यह कथा महाभारत के आदि पर्व में आती है। इसमेँ निर्धारित किया गया है कि पाप लगने के लिये पापी की न्यूनतम अवस्था क्या होनी चाहिए।


प्राचीन काल में मान्डव्य नामके एक ऋषि थे। एक बार वे अपने आश्रम में एक पेड़ के नीचे तपस्या कर रहे थे। उसी समय कुछ चोर चोरी का माल लेकर दौड़ते हुए उनके आश्रम के पास आए। पीछे राजा के दूत चोरों का पीछा करते हुए आ रहे थे। चोरों ने माल ऋषि के आश्रम के पास पटका और भाग खडधे हुए। राजा के दूत ने माल वहाँ पाकर ऋषि को ही चोर समझ कर गिरफ्तार कर लिया। चोरी के दंड में ऋषि को शूली पर चढ़ा दिया गया।


मरके ऋषि यमलोक पहुँचे। उन्होंने यमराज से पूछा कि किस पाप के फलस्वरूप उन्हें शूली पर चढ़ना पड़ा। यमराज ने बताया कि बचपन में उन्होंने कुछ मक्खियों को नुकीली घास से छेदा था जिसके कारण उन्हें शूली पर चढ़ना पड़ा। मुनि ने कहा कि अपराध की तुलना में दंड बहुत बड़ा है इसलिए वे यमराज को शाप देते हैं कि उन्हें मृत्युलोक में शूद्र माताकी योनि से जन्म लेना पड़ेगा और आज के बाद किसी को भी १४ वर्ष से कम उम्र के पहिले किये हुए कर्म का पाप नहीं लगेगा।


शाप के अनुसार धर्मराज को मनुष्य जन्म लेना पड़ा। इस अवतार में धर्मराज का नाम विदुर था। जैसा कि पाठक जानते होंगे कि विदुर धृतराष्ट्र के सौतेले भाई थे और वे सदा धृतराष्ट्र को धर्म का मार्ग बताते रहे किन्तु धृतराष्ट्र ने उनकी बात नहीं मानी।


---लक्ष्मीनारायण गुप्त

---११ अगस्त २००९

Thursday, August 06, 2009

भगवान महावीर और शिष्य गोशालक


यह लघु कथा ओशो रजनीस की पुस्तक India My Love से ली गई है।


एक बार भगवान महावीर और उनका एक शिष्य गोशालक एक गांव से गुजर रहे थे। भगवान गोशालक को समझा रहे थे कि जितना ही तुम इस अस्तित्व, इस सृष्टि के प्रति उत्तरदायी होगे उतना ही तुम अपनी आत्मा के निकट आओगे। उसी समय मार्ग में एक छोटा सा पौधा दिखाई दिया। गोशालक ने उस पौधे को उखाड़ कर फेंक दिया। भगवान ने कहा तुम्हारा यह काम गैरजिम्मेवारी का है किन्तु तुम अस्तित्व का नाश नहीं कर सकते। गोशालक ने कहा कि मैंने इस पौधे को नष्ट कर दिया है। अस्तित्व मेरा क्या कर लेगा। फिर दोनों भिक्षा मांगने गाँव के अन्दर चले गए। जब वे भिक्षा माँग कर उसी मार्ग पर लौटे तो देखा वह पौधा फिर से रोपित हो गया है। जब वे भिक्षा माँगने गए थे उसी बीच तीब्र हवा चली और वर्षा हुई। हवा और वर्षा के सम्मिलित प्रभाव से वह पौधा फिर जमीन पर लग गया। भगवान ने कहा जितना ही तुम अस्तित्व के खिलाफ जाते हो उतना ही तुम उससे अलग होते जाते हो। अन्तत: अस्तित्व का कुछ नहीं बिगड़ेगा। यह पौधा छोटा है किन्तु यह एक विशाल अस्तित्व, एक परम विशाल शक्ति का एक अंग है। अब से हमारा और तुम्हारा रास्ता एक नहीं हो सकता कयोंकि तुम अस्तित्व के प्रति अपने आप को उत्तरदायी नहीं समझते हो और अकारण हिंसा का मार्ग अपनाते हो।


आज कल जब हम पर्यावरण की सुरक्षा की बात करने हैं तब यह सोचने की बात है कि यह सोच भगवान महावीर की शिक्षाओं में इतने प्राचीन काल से निहित है। भगवान महावीर का काल ईसा पूर्व छठी शताब्दी में माना जाता है। वे भगवान बुद्ध के समकालीन किन्तु अवस्था में काफी बड़े थे।


---लक्ष्मीनारायण गुप्त

---६ अगस्त २००९

Wednesday, August 05, 2009

वेश्या बनाम राजनेता

चीन में हुए एक सर्वेक्षण के अनुसार जनता ने वेश्याओं को राजनेताओं की तुलना में अधिक विश्वसनीय माना है:

वेश्या बनाम राज-नेता


मेरे विचार में अमेरिका में यदि ऐसा सर्वेक्षण किया जाए तो शायद ऐसा ही परिणाम निकलेगा। मैं भारत से ४० से अधिक वर्षों से बाहर रह रहा हूँ इसलिए मैं भारत की आधुनिक मान्यताओं से इतना परिचित नहीं हूँ। यदि भारत में ऐसा सर्वरक्षण किया जाए तो इसका परिणाम क्या होगा? आपका कया विचार है? अवश्य लिखिए।

---लक्ष्मीनारायण गुप्त
---५ अगस्त २००९