रामचरितमानस में एक चौपाई आती है:
कद्रू विनतहिं दीन दुख, तुमहिं कौशिला देब।
भरत बन्दिग्रह सेइहैं, लखन राम के नेब।।
मन्थरा कैकेई से कहती है: (यदि राम राजा बने तो) तुम्हें कौशल्या वैसे ही दु:ख देगी जैसे कद्रू ने विनता को दिया था। भरत वन्दीगृह का सेवन करेंगे और लक्ष्मण राम के नायब होंगे।
एक मित्र ने पूछा कि कद्रू और विनता की कहानी क्या है। आज की प्रविष्टि में इस कथा का संक्षिप्त वर्णन करूँगा।
यह कथा महाभारत के आदि पर्व में आती है। कद्रू और विनता दक्ष प्रजापति की पुत्रियाँ थीं और दोनों कश्यप ऋषि को ब्याही थीं। एक बार कश्यप मुनि ने प्रसन्न होकर अपनी दोनों पत्नियों से वरदान माँगने को कहा। कद्रू ने एक सहस्र पराक्रमी सर्पों की माँ बनने की प्रार्थना की और विनता ने केवल दो पुत्रों की किन्तु दोनों पुत्र कद्रू के पुत्रों से अधिक शक्तिशाली पराक्रमी और सुन्दर हों। कद्रू ने १००० अंडे दिए और विनता ने दो। समय आने पर कद्रू के अंडों से १००० सर्पों का जन्म हुआ किन्तु विनता के दो अंडों से अभी तक बच्चे नहीं निकले। विनता ने उतावली में एक अंडा तोड़ दिया जिससे एक तेजस्वी पक्षी निकला किन्तु उसके शरीर के निचले भाग का विकास अभी नहीं हो पाया था। बच्चे ने पैदा होते ही अपनी माँ को इस उतावलेपन के लिए शाप दिया कि वह इस पाप के कारण दासी बनेगी। इतना कह कर वह पक्षी उड़ गया और सुर्य के रथ का सारथी अरुण बना।
एक दिन दोनों बहनों ने उच्चै:श्रवा घोड़े को आकाश में देखा और दोनों में इस घोड़े के रंग को लेकर बहस होने लगी। विनता ने कहा यह घोड़ा पूरा सफेद है किन्तु कद्रू ने कहा कि उसकी पूँछ काली है। दोनों में शर्त लगी कि जिसकी बात गलत निकली वह दूसरी बहन की दासी बन कर रहेगी। यह तय किया गया कि दूसरे दिन दिन दोनों बहनें उड़ के जायेंगी और उच्चै:श्रवा के रंग की जाँच करेंगी। कद्रू ने अपने पुत्रों को आदेश दिया कि वे जाकर उच्चै:श्रवा की पूँछ पर बालों की तरह लिपट जायें जिससे उसकी पूँछ काली लगे। परिणामस्वरूप विनता को कद्रू की दासी बनना पड़ा।
समय आने पर विनता के दूसरे पुत्र का जन्म हुआ। यह पुत्र गरुड़ था। इसका शरीर विशाल था और यह महान पराक्रमी था। चूँकि विनता कद्रू की दासी थी, उसे और गरुड़ को सदा कद्रू और उसके पुत्र सर्पों की सेवा करनी पड़ती थी और उनकी सब आज्ञायें माननी पड़ती थीं। गरुड़ ने माँ से इसका कारण पूछा। पूरी कहानी जानने के बाद गरुड़ ने सर्पों से पूछा कि उसकी और उसकी माँ की इस दासता से मुक्ति कैसे हो सकती है। सर्पों ने कहा कि यदि वह इन्द्र के दरबार से सोम-रस चुरा कर उन्हें दे दे तो दोनों की दासता से मुक्ति हो जायेगी।
गरुड़ ने अपनी माँ से कहा कि वह सोम रस ले आयेगा किन्तु जाने के पहले उसे कुछ खाने की आवश्यकता है। विनता ने कहा कि तू निषादों का भोजन कर किन्तु ध्यान रखना कि कोई ब्राह्मण मुख में न आ जाये। विनता ने बताया कि ब्राह्मण के मुख में आते ही उसके कंठ में भयानक कष्ट होगा और तब उसे उस ब्राह्मण को तुरंत मुक्त कर देना होगा नहीं तो वह अपने शाप से उसे नष्ट कर देगा। गरुड़ जब निषादों को निगल रहा था, उसके कंठ में भयानक जलन और पीड़ा हुई। गरुड़ ने सोचा, अवश्य उसने किसी ब्राह्मण को निगला है। ऊसने ब्राह्मण से निकलने की प्रार्थना की। ब्राह्मण ने कहा उसकी निषाद पत्नी भी वहीं पर है,उसके बिना वह नहीं निकलेगा। गरुड़ ने दोनों को जाने दिया और उनसे क्षमा प्रार्थना की।
हजार निषादों के खाने के बाद भी गरुड़ की भूख नहीं मिटी। पिता कश्यप ने बताया कि एक विशालकाय हाथी और एक उतना ही विशालकाय कछुआ है जो एक दूसरे से हमेशा लड़ते रहते हैं और उनके युद्ध से विश्व को बड़ी क्षति हो रही है; तू इनको पकड़ के खाले। गरुड़ ने एक पंजे से हाथी और दूसरे से कछुए को पकड़ा। अब समस्या आई कि कहाँ बैठ कर उन्हें खाए क्योंकि साधारण वृक्ष तो उसके बोझ से टूट जायेगा। पिता कश्यप ने उसे एक विशाल वृक्ष का ठिकाना बताया किन्तु चेतावनी दी कि उस पेड़ की एक शाखा पर बालखिल्य मुनि उल्टा लटके हुए तपस्या कर रहे हैं। इन मुनियों का आकार मनुष्य के अँगूठे के बराबर है। ध्यान रखना कि इन्हें कोई कष्ट न पहुँचे। जहाँ गरुड़ उस पेड़ की एक शाखा पर बैठा गरुड़ , हाथी और कछुए के सम्मिलित भार से वह शाखा टूटने लगी। तब गरुड़ ने उस शाखा से लटकते बालखिल्य मुनियों को देखा जो उसे शाप देने की धमकी दे रहे थे। गरुड़ ने उनसे क्षमा माँगी और तुरंत शाखा, हाथी और कछुए को पंजों से किसी तरह पकड़े हुए उड़ कर पिता के पास आया। पिता ने बालखिल्य मुनियों को समझाया कि यह उनका पुत्र है जिसके जन्म के लिये बालखिल्य मुनियों ने उन्हें अपने आधे तप का दान किया था। एक बार इन्द्र ने बालखिल्य मुनियों की हँसी उड़ाई थी तब बालखिल्य मुनियों ने कश्यप मुनि को अपने तप का दान किया था कि वे ऐसा पुत्र पैदा करें जो इन्द्र का मानभंग करे। कश्यप ने गरुड़ को बताया कि वह गंधमादन पर्वत पर जाकर इस शाखा को ध्यान से रखे और बालखिल्य मुनियों को उतार कर भोजन करे।
खा पी कर गरुड़ स्वर्ग पहुँचा। उसके विशाल शरीर और तीब्र गति को देख कर देवता भयभीत हुए। अग्नि ने बताया कि यह कश्यप मुनि का पुत्र है और सोम-रस चुराने आया है। देवताओं के सारे अस्त्र-शस्त्र उसके आगे व्यर्थ हुए और गरुड़ सोम-रस के पात्र तक पहुँच गया। एक विशाल गोलाकार पात्र था जिसके ऊपर वैसा ही एक पात्र उल्टा रखा था। दोनों पात्रों के बीच एक तीखे दाँतों वाला आरा तीब्र गति से घूम रहा था। सोम-रस का पात्र नीचे वाले पात्र में था। गरुड़ ने सूक्ष्म वेष धारण कर बड़ी कुशलता से उस पात्र को निकाल लिया। जब इन्द्र ने यह देखा उन्होँने गरुड़ की प्रार्थना की। गरुड़ ने उन्हें पूरी कहानी बताई। इन्द्र ने गरुड़ से अनुरोध किया कि वह नागों से कहे कि वे सोम-रस पान करने के पूर्व स्नान करें। यह बात गरुड़ ने मान ली। गरुड़ ने सोम-रस नागों को दिया और उनसे कहा कि पान के पूर्व श्र्नान करें । जब नाग-गण स्नान करने गए, इन्द्र वह पात्र लेकर स्वर्ग चले गए। इस प्रकार विनता और गरुड़ को दासता से मुक्ति मिली किन्तु नागों को सोम-रस नहीं मिला।
---लक्ष्मीनारायण गुप्त
---१६ जुलाई २००९