Tuesday, July 28, 2009

भगीरथ का जन्म



पद्मपुराण के स्वर्गखंड में एक कथा आती है जो कि आज कल समलैंगिकता के बारे में चल रहे विवाद के सन्दर्भ में महत्वपूर्ण है। यह एक परम विचित्र जन्म-कथा है।


भगीरथ जो गंगा को पृथ्वी पर लाए, यह कथा उनके जन्म के बारे में है। महाराज सगर के पौत्र महाराज दिलीप के कोई पुत्र नहीं था इसलिए वे हमेशा दु:खी रहते थे। उनकी दोनों रानियाँ गुरु वशिष्ट के पास गईं और उन्होंने गुरु से सगर के वंश की रक्षा का साधन पूछा। गुरु ने रानियों को मंत्राभिषिक्त हवि दी। एक रानी को उस हवि को खाने का आदेश दिया और दूसरी रानी से कहा कि वह पहली रानी पर आरूढ़ होकर पुरुष की तरह मैथुन करे।


पहली रानी को पुत्र पैदा हुआ जिसका नाम भगीरथ रखा गया। यह पुत्र एक मांस पिंड की तरह था। ऐसा माना जाता है कि बालक की हड्डियाँ, दाँत और अन्य कड़े भाग पिता से आते हैं और मुलायम भाग मातासे। इस बालक के लिए चलना फिरना बड़ा कठिन था। उसका शरीर कई स्थानों से टेढ़ा था और उसकी वाणी भी स्पष्ट नहीं थी। एक बार उसे मुनि अष्टावक्र मिले जिनका शरीर आठ जगह से टेढ़ा था। भगीरथ ने अस्पष्ट वाणी से सम्बोधित किया। मुनि ने कहा कि यदि तूने मुझे चिढ़ाने के लिए अपने शरीर को टेढ़ा कर रखा है और इस अजीब तरीके से बोल रहा है तो तू भस्म हो जा किंतु यदि यह तेरा स्वाभाविक रूप और वाणी है तो तू पूर्ण स्वस्थ हो जा। इस प्रकार भगीरथ का शरीर और वाणी सामान्य हो गए।


---लक्ष्मीनारायण गुप्त

---२८ जुलाई २००९

Sunday, July 26, 2009

बन्दर-प्रशिक्षण



(पहले यह पढ़िए:

http://news.bbc.co.uk/2/hi/south_asia/8168199.stm)


भारत देश महान है

शिक्षा देना हमारा काम है

जगद्गुरु का सदा से हमारा ख़िताब है

मानवों की शिक्षा में हम अग्रणी हैं

बन्दरों की शिक्षा में हम शिरोमणि हैं


त्रेता युग में भारत ने सिखाया था

बन्दरों को समुद्र पर पुल बनाना

लंका को जलाना

और राक्षसों को मार गिराना


आज वही बन्दर ज़रा शरारती हो गए हैं

लूट खसोट और नोंच खोंच में निपुण हो गए हैं

अब फिर से उनके प्रशिक्षण का समय आ गया है

जिससे वे अपनी डाकाजनी सभ्यता से कर सकें

राज-नेताओं की तरह चुराए हुए माल को छिपा सकें


एक युग था जब बन्दर नगरों में

मनोहर मानव रूप धर कर आते थे

खीसें बघार कर जनता को नहीं डराते थे

आज वही बन्दर नग्न आते हैं

बच्चों के हाथ से रोटी छीन ले जाते हैं

और पता नहीं क्या क्या हरकतें करते हैं


इसी लिए पटियाले के पास

बन्दर प्रशिक्षण केन्द्र खोला जा रहा है

जहाँ बन्दरों को बताया जायगा

कि ये घटिया हरकतें

हरगिज बन्दरोचित नहीं हैं

और हनुमान जी की दुहाई

बन्दर-सभ्यता के सरासर खिलाफ हैं


बन्दरों को सिखाया जायेगा

शहरों में शालीनता से जाओ

राज-नेता विरोधी तत्वों का पता लगाओ

इसके बाद प्यार से कितने ही मधुबन उजाड़ो

और मधुर फल खाओ


मधुबन के फल खाने से

नहीं हुई थी सुग्रीव को नाराजी

वादा करता हूँ मनमोहन भी

हो जायेंगे वैसे ही राजी


---लक्ष्मीनारायण गुप्त

---२६ जुलाई २००९


Thursday, July 23, 2009

शेष नाग का प्रकोप


(ताज़ा खबर है कि भुवनेश्वर में उड़ीसा की विधान सभा में एक साँप निकल आया। सदन की कार्यवाही रोक कर बिल्डिंग को खाली किया गया। कई घंटे तक काम रुका रहा।)


उड़ीसा की विधान सभा में प्रकट हुए नाग

कोलाहल कलरव में नेता गए भाग

किन्तु ध्यान दो भ्रष्ट राज-नेताओ

सन्देश भेज रहे हैं शेष नाग


अपना रवैया सुधारो

जनता पर ध्यान दो

जनता की सुनो

केवल अपनी थैलियाँ न भरो

जन सेवा की दुहाई देते हो

लेकिन केवल अपनी और अपने चमचों

की भलाई करते हो

दूर करो भ्रष्टाचार

शुद्ध करो अपने आचार विचार

विकास के कार्य करो

गरीबी दूर करो


चेतावनी है रखो यह याद

यदि नहीं करोगे तुम

देश की दशा में सुधार

हर विधान सभा में

अवतरित होंगे नाग

लोक सभा में पहुँचेंगे शेष नाग


ध्यान करो परसुराम-लक्ष्मण सम्वाद

परसुराम को अभी तक होगा याद

पहले लक्ष्मण उड़ायेंगे तुम्हारी खिल्ली

फिर तुम बन जाओगे राम के सामने भीगी बिल्ली

राम तब करेंगे पतित नेताओं को पदच्युत

परसुराम को भेजा था महेन्द्र पर्वत

कारागार का तुम पाओगे सुख


भृष्ट राज-नेताओ

अभी भी समय है मान जाओ

नहीं तो झेलोगे शेष नाग का प्रकोप

बता दिया तुमको मेरा नहीं दोष


---लक्ष्मीनारायण गुप्त

---२३ जुलाई २००९


Sunday, July 19, 2009

रुरु-प्रमद्वरा



महाभारत के आदि पर्व में एक बड़ी प्यारी प्रेम-कहानी आती है। एक बार गन्धर्वराज विश्वावसु और देवलोक की अप्सरा मेनका के प्रेम सम्बन्ध से एक सुन्दर कन्या का जन्म हुअा। अप्सरायें अपनी सन्तान का पालन नहीं करती हैं। इस परम्परा के अनुसार मेनका अपनी कन्या को एक नदी के किनारे छोड़ आई। प्रसिद्ध ऋषि स्थूलकेश को यह कन्या नदी किनारे लेटी हुई मिली जिसे वे अपने आश्रम ले आए। यह कन्या एक अप्रतिम सुन्दरी बनी। इसका नाम प्रमद्वरा रखा गया। भृगु वंशी ऋषि कुमार रुरु इस कन्या पर मोहित हो गया। रुरु के पिता प्रमति स्थूलकेश से मिले और रुरु और प्रमद्वरा का विवाह तय किया गया।


विवाह के कुछ दिन पहले प्रमद्वरा अपनी सहेलियों के साथ खेल रही थी जब अनजाने मैं उसका पैर एक जहरीले नाग के फन पर पड़ गया। नाग के डसने से उस सुन्दर कन्या की मृत्यु हो गई। उसकी अकाल मृत्यु से दोनों परिवार महान शोक से पीड़ित हो गए। रुरु एक सघन जंगल में जाकर शोक की पीड़ा से प्रलाप करने लगा। उसके शोक भरे वचनों को सुन कर एक देवदूत का आगमन हुआ। देवदूत ने रुरु को बताया कि प्रमद्वरा के जीवन की अवधि पूरी हो चुकी है किन्तु देवताओं ने एक तरीका बताया है। रुरु ने उत्सुकता से इस तरीके के बारे में पूछा। देवदूत ने बताया कि तुम इसको अपनी आधी उम्र दे सकते हो। रुरु ने बड़ी प्रसन्नता से यह स्वीकार किया और सुन्दरी प्रमद्वरा पुनर्जीवित हो गई। इस प्रकार भृगु कुमार रुरु ने अपनी आधी अवस्था का दान कर अपनी प्रेमिका को प्राप्त किया।


---लक्ष्मीनारायण गुप्त

---१९ जुलाई २००९

Friday, July 17, 2009

साँप के दो जीभें क्यों?



आप ने कभी सोचा है कि साँप की जीभ दो भागों में बँटी क्यों होती है। वैज्ञानिक कारण तो यह है कि साँप अपनी जीभ से सूँघता है। इसको आप विस्तार से किसी जीवविज्ञान की पुस्तक में पढ़ सकते हैं। मैं यहाँ पर आपको पौराणिक कारण देने जा रहा हूँ। यह कल की प्रविष्टि का परिशिष्ट जैसा है:


http://kavyakala.blogspot.com/2009/07/blog-post_16.html


जब सोम-रस को पीने के पहले साँप नहाने के लिए गए वे सोम-रस के पात्र को दर्भ नाम की घास पर रखा छोड़ गए थे। जब वै लौटे, तब तक सोम-रस का पात्र इन्द्र ले जा चुके थे किन्तु दर्भ पर कुछ बूँदें छलक गई थीं। साँपों ने उन बूँदों को चाटने का प्रयास किया। दर्भ घास नुकीली होती है। उसको चाटने से साँपों की जीभ फट गई। तब से सभी साँपों की जीभ दो भागों में फटी होती है।


---लक्ष्मीनारायण गुप्त

---१७ जुलाई २००९


Thursday, July 16, 2009

कद्रू-विनता

रामचरितमानस में एक चौपाई आती है:

कद्रू विनतहिं दीन दुख, तुमहिं कौशिला देब।
भरत बन्दिग्रह सेइहैं, लखन राम के नेब।।

मन्थरा कैकेई से कहती है: (यदि राम राजा बने तो) तुम्हें कौशल्या वैसे ही दु:ख देगी जैसे कद्रू ने विनता को दिया था। भरत वन्दीगृह का सेवन करेंगे और लक्ष्मण राम के नायब होंगे।

एक मित्र ने पूछा कि कद्रू और विनता की कहानी क्या है। आज की प्रविष्टि में इस कथा का संक्षिप्त वर्णन करूँगा।

यह कथा महाभारत के आदि पर्व में आती है। कद्रू और विनता दक्ष प्रजापति की पुत्रियाँ थीं और दोनों कश्यप ऋषि को ब्याही थीं। एक बार कश्यप मुनि ने प्रसन्न होकर अपनी दोनों पत्नियों से वरदान माँगने को कहा। कद्रू ने एक सहस्र पराक्रमी सर्पों की माँ बनने की प्रार्थना की और विनता ने केवल दो पुत्रों की किन्तु दोनों पुत्र कद्रू के पुत्रों से अधिक शक्तिशाली पराक्रमी और सुन्दर हों। कद्रू ने १००० अंडे दिए और विनता ने दो। समय आने पर कद्रू के अंडों से १००० सर्पों का जन्म हुआ किन्तु विनता के दो अंडों से अभी तक बच्चे नहीं निकले। विनता ने उतावली में एक अंडा तोड़ दिया जिससे एक तेजस्वी पक्षी निकला किन्तु उसके शरीर के निचले भाग का विकास अभी नहीं हो पाया था। बच्चे ने पैदा होते ही अपनी माँ को इस उतावलेपन के लिए शाप दिया कि वह इस पाप के कारण दासी बनेगी। इतना कह कर वह पक्षी उड़ गया और सुर्य के रथ का सारथी अरुण बना।

एक दिन दोनों बहनों ने उच्चै:श्रवा घोड़े को आकाश में देखा और दोनों में इस घोड़े के रंग को लेकर बहस होने लगी। विनता ने कहा यह घोड़ा पूरा सफेद है किन्तु कद्रू ने कहा कि उसकी पूँछ काली है। दोनों में शर्त लगी कि जिसकी बात गलत निकली वह दूसरी बहन की दासी बन कर रहेगी। यह तय किया गया कि दूसरे दिन दिन दोनों बहनें उड़ के जायेंगी और उच्चै:श्रवा के रंग की जाँच करेंगी। कद्रू ने अपने पुत्रों को आदेश दिया कि वे जाकर उच्चै:श्रवा की पूँछ पर बालों की तरह लिपट जायें जिससे उसकी पूँछ काली लगे। परिणामस्वरूप विनता को कद्रू की दासी बनना पड़ा।

समय आने पर विनता के दूसरे पुत्र का जन्म हुआ। यह पुत्र गरुड़ था। इसका शरीर विशाल था और यह महान पराक्रमी था। चूँकि विनता कद्रू की दासी थी, उसे और गरुड़ को सदा कद्रू और उसके पुत्र सर्पों की सेवा करनी पड़ती थी और उनकी सब आज्ञायें माननी पड़ती थीं। गरुड़ ने माँ से इसका कारण पूछा। पूरी कहानी जानने के बाद गरुड़ ने सर्पों से पूछा कि उसकी और उसकी माँ की इस दासता से मुक्ति कैसे हो सकती है। सर्पों ने कहा कि यदि वह इन्द्र के दरबार से सोम-रस चुरा कर उन्हें दे दे तो दोनों की दासता से मुक्ति हो जायेगी।

गरुड़ ने अपनी माँ से कहा कि वह सोम रस ले आयेगा किन्तु जाने के पहले उसे कुछ खाने की आवश्यकता है। विनता ने कहा कि तू निषादों का भोजन कर किन्तु ध्यान रखना कि कोई ब्राह्मण मुख में न आ जाये। विनता ने बताया कि ब्राह्मण के मुख में आते ही उसके कंठ में भयानक कष्ट होगा और तब उसे उस ब्राह्मण को तुरंत मुक्त कर देना होगा नहीं तो वह अपने शाप से उसे नष्ट कर देगा। गरुड़ जब निषादों को निगल रहा था, उसके कंठ में भयानक जलन और पीड़ा हुई। गरुड़ ने सोचा, अवश्य उसने किसी ब्राह्मण को निगला है। ऊसने ब्राह्मण से निकलने की प्रार्थना की। ब्राह्मण ने कहा उसकी निषाद पत्नी भी वहीं पर है,उसके बिना वह नहीं निकलेगा। गरुड़ ने दोनों को जाने दिया और उनसे क्षमा प्रार्थना की।

हजार निषादों के खाने के बाद भी गरुड़ की भूख नहीं मिटी। पिता कश्यप ने बताया कि एक विशालकाय हाथी और एक उतना ही विशालकाय कछुआ है जो एक दूसरे से हमेशा लड़ते रहते हैं और उनके युद्ध से विश्व को बड़ी क्षति हो रही है; तू इनको पकड़ के खाले। गरुड़ ने एक पंजे से हाथी और दूसरे से कछुए को पकड़ा। अब समस्या आई कि कहाँ बैठ कर उन्हें खाए क्योंकि साधारण वृक्ष तो उसके बोझ से टूट जायेगा। पिता कश्यप ने उसे एक विशाल वृक्ष का ठिकाना बताया किन्तु चेतावनी दी कि उस पेड़ की एक शाखा पर बालखिल्य मुनि उल्टा लटके हुए तपस्या कर रहे हैं। इन मुनियों का आकार मनुष्य के अँगूठे के बराबर है। ध्यान रखना कि इन्हें कोई कष्ट न पहुँचे। जहाँ गरुड़ उस पेड़ की एक शाखा पर बैठा गरुड़ , हाथी और कछुए के सम्मिलित भार से वह शाखा टूटने लगी। तब गरुड़ ने उस शाखा से लटकते बालखिल्य मुनियों को देखा जो उसे शाप देने की धमकी दे रहे थे। गरुड़ ने उनसे क्षमा माँगी और तुरंत शाखा, हाथी और कछुए को पंजों से किसी तरह पकड़े हुए उड़ कर पिता के पास आया। पिता ने बालखिल्य मुनियों को समझाया कि यह उनका पुत्र है जिसके जन्म के लिये बालखिल्य मुनियों ने उन्हें अपने आधे तप का दान किया था। एक बार इन्द्र ने बालखिल्य मुनियों की हँसी उड़ाई थी तब बालखिल्य मुनियों ने कश्यप मुनि को अपने तप का दान किया था कि वे ऐसा पुत्र पैदा करें जो इन्द्र का मानभंग करे। कश्यप ने गरुड़ को बताया कि वह गंधमादन पर्वत पर जाकर इस शाखा को ध्यान से रखे और बालखिल्य मुनियों को उतार कर भोजन करे।

खा पी कर गरुड़ स्वर्ग पहुँचा। उसके विशाल शरीर और तीब्र गति को देख कर देवता भयभीत हुए। अग्नि ने बताया कि यह कश्यप मुनि का पुत्र है और सोम-रस चुराने आया है। देवताओं के सारे अस्त्र-शस्त्र उसके आगे व्यर्थ हुए और गरुड़ सोम-रस के पात्र तक पहुँच गया। एक विशाल गोलाकार पात्र था जिसके ऊपर वैसा ही एक पात्र उल्टा रखा था। दोनों पात्रों के बीच एक तीखे दाँतों वाला आरा तीब्र गति से घूम रहा था। सोम-रस का पात्र नीचे वाले पात्र में था। गरुड़ ने सूक्ष्म वेष धारण कर बड़ी कुशलता से उस पात्र को निकाल लिया। जब इन्द्र ने यह देखा उन्होँने गरुड़ की प्रार्थना की। गरुड़ ने उन्हें पूरी कहानी बताई। इन्द्र ने गरुड़ से अनुरोध किया कि वह नागों से कहे कि वे सोम-रस पान करने के पूर्व स्नान करें। यह बात गरुड़ ने मान ली। गरुड़ ने सोम-रस नागों को दिया और उनसे कहा कि पान के पूर्व श्र्नान करें । जब नाग-गण स्नान करने गए, इन्द्र वह पात्र लेकर स्वर्ग चले गए। इस प्रकार विनता और गरुड़ को दासता से मुक्ति मिली किन्तु नागों को सोम-रस नहीं मिला।

---लक्ष्मीनारायण गुप्त
---१६ जुलाई २००९

Wednesday, July 08, 2009

समलैंगिकता(२)

एक मित्र ने मेरी पिछली प्रविष्टि:
http://kavyakala.blogspot.com/2009/07/blog-post.html
पर टिप्पणी की है कि खजुराहो में समलैंगिकता का चित्रण नहीं है। उनकी और औरों की जानकारी के लिए मैं इस विषय की विद्वान रूथ वनीता के एक साक्षात्कार का अंश पेश कर रहा हूँ:

"The fourth-century Kamasutra, a Sanskrit text, categorizes men who desire men as a “third nature” (tritiya prakriti) and further divides them into those who are masculine-appearing and those who are feminine-appearing. It suggests that the masculine-appearing ones can work as masseurs or hairdressers to make contacts with men. It then gives an extended, explicit sensuous description of oral sex between two men. It also notes that men who are not of the third nature may engage in sex with one another and unite if they trust and love one another and are friends. It mentions that women in the women’s quarters have sex with one another, using dildos of various kinds. 

The first century Sanskrit medical text Sushruta Samhita states that if two women make love and their sexual fluids unite, one of them may become pregnant and produce a boneless child. Several fourteenth-century sacred texts in Bengali and one in Sanskrit narrate the story of two widowed queens who make love with divine blessings and produce a child who grows up to be a heroic king and brings the river Ganga from heaven to earth. In some versions of this story, the child is born boneless but is healed by a sage as part of the Gods’ plan.
Ancient temple sculpture at Khajuraho, Konarak and elsewhere beautifully depicts same-sex eroticism. One such sculpture from the eleventh-century, shows Kama, God of Love, shooting an arrow at two women who are embracing each other. All three figures have blissful smiles on their faces."

पूरा साक्षात्कार यहाँ पर पढ़िए:
http://www.egothemag.com/archives/2005/03/lovefriendshipd.htm

---लक्ष्मीनारायण गुप्त
---८ जुलाई २००९

Tuesday, July 07, 2009

समलैंगिकता-एक मानव अधिकार

२ जुलाई २००९, भारत के इतिहास का एक महत्वपूर्ण दिन माना जाएगा क्योंकि इस दिन दिल्ली के उच्च न्यायालय ने समलैंगिकता के अनपराधीकरण का प्रारम्भ किया। इस निर्णय के खिलाफ अवश्य अपील की जाएगी और अंतिम निर्णय भारत का सुप्रीम कोर्ट करेगा। आशा है कि सुप्रीम कोर्ट इस समुदाय के मानव-अधिकारों को स्वीकार करेगा। चीन में यह कार्य १९९७ में किया गया और संयुक्तराज्य अमेरिका में २००३ में। किन्तु अभी तक किसी भी देश में इस वर्ग को समान अधिकार नहीं मिले हैं। अमेरिका के कुछ राज्यों में समलैंगिकों को विवाह करने का अधिकार मिला है किन्तु अभी पूर्ण अधिकारों को प्राप्त करने में बहुत सारा संघर्ष बाकी है।

कुछ धार्मिक नेता समलैंगिकता को प्राकृतिक नहीं मानते हैं किन्तु यह कोई नई चीज़ नहीं है। इसका हजारों सालों का इतिहास है। प्राचीन यूनान में तो कुछ लोग इसे असमलैंगिकता की तुलना में अधिक पवित्र मानते थे क्योंकि इसके द्वारा किसी संतान का जन्म नहीं होता था। भारत में खजुराहो के मंदिरों में समलैंगिक कृत्य के चित्र हैं, ऐसा मैंने सुना है। तुर्की और अन्य मुस्लिम मुल्कों में समलैंगिकता काफी प्रचलित रही है।

इस सन्दर्भ में प्लेटो की एक कहानी बताना चाहूँगा। प्लेटो के अनुसार सृष्टि के प्रारम्भ में तीन प्रकार के द्विमानव थे: पुरुष-पुरुष, पुरुष-स्त्री, और स्त्री-स्त्री। देवताओं को भय हुआ कि ये द्विमानव बहुत शक्तिशाली हो जाएँगे और देवताओं की गद्दी के लिए ख़तरा पेश करेंगे। इसलिए उन्होँने इनको अलग -अलग कर दिया। तबसे वे पुरुष जो दूसरे पुरुष से जुड़े थे उस पुरुष की खोज करते रहते हैं। इसी तरह जो स्त्री दूसरी स्त्री से जुड़ी थी, उस स्त्री की खोज करती रहती है। जो स्त्री किसी पुरुष से जुड़ी थी उस पुरुष की खोज करती है और पुरुष उस स्त्री की खोज करता है। इस मिथक के अनुसार इनमें से कोई भी कृत्य अनैसर्गिक या अनैतिक नहीं है। बस मानव के तीन तरीके के प्राकृतिक वासनात्मक रुझान हैं।

---लक्ष्मीनारायण गुप्त
---७ जुलाई २००९