Tuesday, June 30, 2009

आक्रोश और क्षोभ से भर जाता है मन



जब मैं सुनता हूँ इन्सान का इन्सान पर अत्याचार

आक्रोश और क्षोभ से भर जाता है मन


शान्ति पूर्ण प्रदर्शनकारियों पर गोलियों की बौछार

तेहरान में सरे बाज़ार

निर्दोष युवती नेदा की निर्जीव होती आँखैं

मन में होती है अजीब घुटन

आक्रोश और क्षोभ से भर जाता है मन


जब मै पढ़ता हूँ कि भारत के एक गाँव में

दो प्रेमियों को आत्म हत्या करनी पड़ती है

क्योंकि एक हिन्दू है और एक मुस्लिम

परिवार और समाज प्रसन्न है उनकी मौत पर

क्योंकि यह था उनकी इज्जत का प्रश्न

आक्रोश और क्षोभ से भर जाता है मन


जब मैं पढ़ता हूँ कि अफगानिस्तान में

एक किशोर और किशोरी की

हत्या कर दी जाती है

क्योंकि वे शादी करना चाहते थे

माँ बाप और मुल्लाओं की इच्छा के विपरीत

आक्रोश और क्षोभ से भर जाता है मन


समाचारपत्रों और पत्रिकाओं में

नित्य ही ऐसी खबरें छपती हैं

निर्दोषों पर भयानक जुल्म होते ही रहते है

जब मैं पढ़ता हूँ ऐसे अमानुषिक कृत्य

आक्रोश और क्षोभ से भर जाता है मन


---लक्ष्मीनारायण गुप्त

---३० जून २००९


Sunday, June 28, 2009

एक नावहो (Navajo) कहानी



सन् १९६६ के लगभग अमेरिका के दक्षिण-पश्चिम भाग में नावहो रिज़र्वेशन में नासा के कुछ अधिकारी चन्द्र-यात्रा की तैयारी कर रहे थे। यह स्थान चन्द्रमा की सतह से मिलता जुलता है। उसी तरह की चट्टानें और जमीन है। दो ऐस्ट्रोनाट स्पेस सूट पहने हुए थे। पास में दो नावहो आदमी बाप और बेटे भेड़ें चरा रहे थे। नासा के लोग उनके पास आए और कुछ प्रश्न करने लगे। बाप को अंग्रेज़ी नहीं आती थी। बेटे ने पूछा कि दो लोगों ने यह अजीब पोशाक क्यों पहन रखी है। नासा के लोगों ने बताया कि ये लोग चन्द्रमा  पर जा रहे हैं और इस यात्रा के लिए ऐसे कपड़े आवश्यक है। यह सुन कर बाप बहुत उत्सुक होगया और बोला कि वह चन्द्रलोक के लोगों के लिए एक संदेश भेजना चाहता है। बेटे ने वह संदेश नावहो भाषा में लिख कर नासा वालों को दिया। उन्हों ने संदेश का अनुवाद पूछा। बेटे ने बताया कि यह संदेश कहता है कि इन लोगों से बच कर रहना। ये तुम्हारी जमीन हड़प कर लेंगे।


---लक्ष्मीनारायण गुप्त

---२८ जून २००९

Friday, June 19, 2009

दर्दे-अर्थराइटिस

दर्दे-दिल, कहते हैं बहुत बुरा होता है
दर्दे-अर्थराइटिस उससे भी बड़ा होता है
दर्दे-दिल पर लोग शायरी करते हैं
आहें भरते हैं और लम्बी साँसें भरते हैं
दर्दे-अर्थराइटिस में एस्पिरिन लेते हैं
आहें भरते है और खुदा को याद करते हैं
दर्दे-दिल प्रिय के दीदार से दुरुस्त हो जाता है
दर्दे-अर्थराइटिस प्रिय से मालिश करवाना चाहता है
प्रिय को मालिश करने की नहीं प्यार की दरकार है
वो कहते हैं आपका प्यार बेकार है
दर्दे-अर्थराइटिस वाले को दोहरा लाभ होता हैं
प्रिय के जाने के बाद दर्दे-दिल भी होता है

---लक्ष्मीनारायण गुप्त
---१९ जून २००९

Thursday, June 18, 2009

मन्नन द्विवेदी गजपुरी

कुछ समय पूर्व मैंने "खटमल स्तोत्र" नामकी एक प्रविष्टि लिखी थी। देखिए:

http://kavyakala.blogspot.com/2008/11/blog-post.html

इसमें मैंने मन्नन द्विवेदी गजपुरी की दो पंक्तियाँ पेश की थीं:

सुनिये महाराज खटकीरा।
आप न जानी पर की पीरा।।

मन्नन जी के प्रपौत्र आकाश पान्डे ने इन पंक्तियों को पढ़ कर एक टिप्पणी डाली। आज की प्रविष्टि पांडे जी की टिप्पणी से प्रेरित है। मेरे पास सरस्वती पत्रिका- जो एक समय हिन्दी की प्रमुख साहित्यिक पत्रिका हुआ करती थी- का हीरक जयंती विशेषांक है। इस विशेषांक में मन्नन जी की एक कविता है जो मैं आप सब के लिए- खास कर आकाश जी के लिए- प्रस्तुत कर रहा हूँ:

भगवान श्रीकृष्ण

पाप से सद्धर्म छिप जाता जगत में जब कभी
ईश सब सन्ताप हरने को प्रकट होता तभी

धर्म-रक्षा हेतु करके दुर्जनों का सर्वनाश
दूर कर संसार का तम सत्य का करता विकाश

इस तरह अवतार लेता विश्व में विश्वेश है
शेष रहता फिर कहाँ आपत्ति का लवलेश है

कंस ने उत्पात भारी जब मचाया था यहाँ
द्यूतकारी मद्यपी धन लूटता पाता जहाँ

डर उसे था हर घड़ी श्रीकृष्ण के अवतार का
देवती को दुख मिला पतियुक्त कारागार का

भाद्र की कृष्णाष्टमी सब ओर छाया अंधकार
चञ्चला घनघोरमाला में चमकती बार बार

ज्योति निर्मल देवकी के गर्भ में हो भासमान
विश्वपति शिशुरूप में लाया गया गोकुल निदान

नन्द ने अपना समझ कर प्रेम से पाला उसे
इसलिए संसार कहता नन्द का लाला उसे

कृष्ण वंशी को बजा गायें चराता था कभी
दूध माखन चोर कर मन को चुराताच था कभी

पूतना केशी तथा कंसादि का संहार कर
द्वारिका जाके बसाया देवद्विज का कष्ट हर

बात ही उलटी हुई हा! अब मुरारी हैं नहीं
अब हमारे बीच में व्रज का विहारी है नहीं

किन्तु उसका रूप सुन्दर है नहीं दिल से हटा
याद आती हाय! अब भी साँवली सुन्दर छटा

है मुझे विश्वास, फिर भी श्याम आवेगा कभी
मोहनेवाली मधुर बंशी बजावेगा कभी

पाप-तापों से हमें वह फिर छुड़ावेगा कभी
सर्व दु:खों को दयामय फिर मिटावेगा कभी
---पं० मन्नन द्विवेदी "गजपुरी"
---सन् १९१०

यदि किसी पाठक को मन्नन जी के जीवन या काव्य के बारे में कुछ और पता हो तो अवश्य लिखें।

---लक्ष्मीनारायण गुप्त
---१८ जून २००९

Sunday, June 14, 2009

जीवन के द्वन्द्व

कभी विरह की व्यथा सही न जिनने
मधुर मिलन की कद्र करेंगे कैसे
कभी कलह की कटुता जिनके पास न आई
प्रेम भाव का मोल करेंगे कैसे
कभी गरीबी जिनके पास न फटकी
वे नर धन का मान करेंगे कैसे
जिनसे पीड़ा का कोई सम्बन्ध नहीं है
औरों की पीड़ा जानेंगे कैसे
कभी अँधेरा जिनके पास न आया
रोशनी की परवाह करेंगे कैसे
कभी घोर तृष्णा से जो न जूझे
पानी का वे मोल करेंगे कैसे
कभी भूख का दु:ख सहा न जिनने
भोजन का वे सुख पायेंगे कैसे
कभी धुप से त्वचा न जिनकी है कुम्हलाई
छाया का सुख समझेंगे कैसे
द्वन्द नहीं है यदि जीवन में मित्रो
जीवन का आनन्द मिलेगा कैसे

---लक्ष्मीनारायण गुप्त
---१४ जून २००९

Saturday, June 06, 2009

भरा हो जलाशय



भरा हो जलाशय तो प्यास भी नहीं लगती है
मरुस्थल में लेकिन जबान खुश्क होती है
जो पास नहीं हो खोज उसी की होती है
पास वाले की कोई कद्र नहीं होती है
दूर के ढोल सुहावने होते हैं
औरों के बच्चे अपनों से होशियार लगते हैं
अपनी चीजें बड़ी बेकार लगती हैं
दूसरों की चीजें बड़ी बेहतरीन लगती हैं
घर की मुर्गी दाल बराबर लगती है
दूसरे की दाल भी मुर्गी जैसी लगती है
दोस्तो किन्तु पास अपनी बीवी के ही जाओ
दूसरे की अच्छी लगे तो भी कतराओ
नहीं तो मित्रो चाँद गंजी हो सकती है
भरा हो जलाशय तो प्यास भी नहीं लगती है

---लक्ष्मीनारायण गुप्त
---६जून २००९

Monday, June 01, 2009

अजूबा प्यार

(पहले यह देखिए: http://www.witn.com/watercooler/headlines/46584907.html)
अजब है यह प्यार की कहानी
विश्व के इतिहास में कभी सुनी न जानी
ऐसा दुस्साहस न मजनू में पाया
न राँझा, न फरहाद के मन में यह आया
नल में या रोमियो ने करी ऐसी हिम्मत
मिस्र के इस युवक ने करी जैसी हरकत
हो गई उसको एक नवयौवना से मुहब्बत
नहीं जानता था कितनी होगी मुसीबत
थी वह बिचारी छोटे तबके की बाला
बाप ने कहा तुमने देखा न भाला
यह शादी हम होने नहीं देंगे
अपनी बेइज्जती नहीं होने देंगे
युवक ने दो साल तक इजाजत माँगी
बाप ने लेकिन एक नहीं मानी
गुस्से में युवक ने बड़ा गज़ब कर डाला
गरम चाकू से अपना अंग भंग कर डाला
डाक्टरों ने किया बहुतेरा प्रयास
जोड़ नहीं पाए फिर से हुये सब हताश
आवेश में किया यह भयानक दुष्कर्म
जाना नहीं वह प्रेम का मर्म

---लक्ष्मीनारायण गुप्त
---१ जून २००९