Friday, May 29, 2009

भगवान बुद्ध एवं भिक्षु चक्षुपाल

एक बार जब भगवान जेतवन विहार में रह रहे थे, भिक्षु चक्षुपाल भगवान से मिलने के लिए आए हुए थे । भिक्षु चक्षुपाल अन्धे थे। एक दिन विहार के कुछ भिक्षुओं ने कुछ मरे हुए कीड़ों को चक्षुपाल की कुटी के बाहर पाया और उन्होंने चक्षुपाल की निंदा करनी शुरू की कि उन्होंने इन जीवित प्राणियों की हत्या की। भगवान ने पूछा कि क्या तुमने भिक्षु को कीड़े मारते हुए देखा है। उन्होने बताया नहीं। भगवान ने बताया कि जैसे तुमने उन्हें कीड़ों को मारते हुए नहीं देखा वैसे ही चक्षुपाल ने उन्हें मरते हुए नहीं देखा और उन्होंने कीड़ों को जान बूझ कर नहीं मारा है इसलिए उनकी भर्त्सना उचित नहीं है। इस सन्दर्भ में भगवान ने यह श्लोक कहा:

मनो पुब्बङ्गमा धम्मा मनो सेट्ठा मनोमया।
मनसा चे पदुट्ठेन भासति वा करोति वा।
ततो नं दुक्खमन्वेति चकमिव बहत: पदम्।।

हम वही हैं जो हमने सोचा है अब तक।
सोचते हैं जो वही बन जाते हैम बेशक।।
बैल के पीछे चलता है जैसे गाड़ी का पहिया।
कुविचार के पीछे बहता दु:ख का दरिया।।

यह धम्मपद के पहिले अद्ध्याय यमकवग्गो ( यमक वर्ग) का पहिला पद है।

भिक्षुओं ने पूछा कि चक्षुपाल अंधे क्यों हैं। भगवान ने बताया कि वे पूर्व जन्म में एक चिकित्सक थे। एक अंधी स्त्री ने उनसे वादा किया था कि यदि वे उसकी आँखें ठीक कर देंगे तो वह और उसका परिवार उनके दास बन जायेंगे। स्त्री की आँखें ठीक हो जाने पर उसने दासी बनने के भय से यह मानने से इंकार कर दिया। चिकित्सक को पता था कि उसकी आँखें ठीक हो गई हैं। बदले के लिए उसने स्त्री को दूसरी दवा दी जिससे वह फिर अंधी हो गई। इस पाप के फलस्वरूप अगले जन्म में चिकित्सक को अंधा बनना पड़ा।

---लक्ष्मीनारायण गुप्त
---२९ मई २००९

Thursday, May 28, 2009

भगवान बुद्ध और वैद्य जीवक

एक बार भगवान बुद्ध के चचेरे भाई और विरोधी राजकुमार देवदत्त ने द्वेष वश गृद्धकूट पर्वत के ऊपर से बुद्ध भगवान के ऊपर एक शिला फेंकी जो दो पत्थरों से टकरा कर टूट गई किन्तु एक शिलाखंड भगवान के पैर पर लगा जिससे उन्हें कुछ चोट लगी और रक्त बहा। जीवक, जो भगवान का चिकित्सक था, ने मरहम पट्टी की। फिर वह किसी अन्य की चिकित्सा के लिए नगर चला गया। लौटते लौटते उसे रात होगई और तब तक विहार का द्वार बन्द हो चुका था अतएव वह अन्दर नहीं आ पाया। उसने बुद्ध भगवान के घाव पर कुछ तीखी बूटियाँ लगाई थीं कि पट्टी खुलनी आवश्यक थी नहीं तो बड़ा तेज दर्द हो सकता था। भगवान को इसका पता था और उन्होंने पट्टी खुलवा दी। जब जीवक आया तो वह बहुत दु:खी था कि भगवान को बहुत कष्ट हुआ होगा तब भगवान ने उससे यह श्लोक कहा:

गतद्धिनो विसोकस्स विप्पमुत्तस्स सब्बधि।
सब्बगन्थप्पहीनस्स परिलाहो न विज्जति।।

पूर्ण हो चुकी है जिसकी यात्रा
शोकरहित वह है सर्वथा विमुक्त।
काट दिए हैं जिसने सारे बन्धन
नहीं होता है उसे कोई कष्ट।।

यह बौद्ध धर्म ग्रन्थ धम्मपद के सातवें अद्ध्याय अरहन्तवग्गो का प्रथम श्लोक है। इस ग्रन्थ के हर श्लोक के साथ किसी व्यक्ति का नाम जुड़ा है जिसको सम्बोधित करके भगवान ने यह श्लोक कहा है और साथ ही साथ एक सन्दर्भ कथा जिसने इस वाणी को प्रेरित किया।

जीवक के बारे में भी एक कहानी है। वह एक गणिका का पुत्र था जिसे उसने पैदा होते ही एक मिटटी के ढेर पर फेंक दिया था। महाराज बिम्बिसार के पुत्र अभय ने उसे देखा और कहा यह तो जीवित है। इसलिए उसका नाम जीवक पड़ा। बडा होकर वह एक प्रसिद्ध चिकित्सक बना और बुद्ध भगवान का व्यक्तिगत वैद्य।

---लक्ष्मीनारायण गुप्त
---२८ मई २००९