Saturday, April 25, 2009

अा गया

अब रिटायर जॅाब से
होने का अवसर आ गया
ऐकेडेमिक से डोमेस्टिक,
बन जाने का अवसर आ गया
पेंसिलें घिसते रहे हम ज़िन्दगी भर
प्लेटें घिसने का सुअवसर आ गया
बॅास को खुश रक्खें ज़रूरी अब नहीं
पत्नी को खुश रखने का मौसम आ गया
छोड़के पढ़ना पढ़ाना दोस्तो
सब्ज़ियाँ तलने का मौसम आ गया
अब नहीं लेक्चर बनाने की ज़रूरत
बीवी के लेक्चर का मौसम आ गया
ज़िन्दगी सब आज पीछे रह गई
यादों में रहने का मौसम आ गया

---लक्ष्मीनारायण गुप्त
---२५ अप्रैल २००९

Wednesday, April 22, 2009

इक़बाल बानो (१९३५-२००९)

प्रसिद्ध पाकिस्तानी गायिका इक़बाल बानो का निधन २१ अप्रैल को हो गया। उनकी अवस्था ७४ साल थी। देखिए:

http://news.bbc.co.uk/2/hi/south_asia/8011930.stm

इक़बाल बानो की गायी सबसे मशहूर ग़ज़ल फैज़ अहमद फैज़ की "हम देखेंगे" है। बड़ी सशक्त ग़ज़ल है:

हम देखेंगे

लाज़िम है कि हम भी देखेंगे
वो दिन भी के जिसका वादा है
जो लोह-ए-अज़ल पे लिखा है
हम देखेंगे

जब ज़ुल्म-ओ-सितम के कोह-ए-गिराँ
रुई की तरह उड़ जायेंगे
हम महकूमों के पावों तले
यह धरती धड़ धड़ धड़केगी
और अहल-ए-हकम के सर ऊपर
जब बिजली कड़ कड़ कड़केगी
हम देखेंगे

जब अर्ज़-ए-ख़ुदा के काबे से
सब बुत उठवाये जायेंगे
हम अहल-ए-सफ़ा मरदूद-ए-हरम
मसनद पे बिठाए जायेंगे
सब ताज उछाले जायेंगे
सब तख़्त गिराये जायेंगे
हम देखेंगे

बस नाम रहेगा अल्ला का
जो ग़ायब भी है हाज़िर भी
जो मंज़र भी है नाज़िर भी
उट्ठेगा अनलहक़ का नारा
जो मैं भी हूं और तुम भी हो
और राज करेगी ख़ल्क़-ए-ख़ुदा
जो मैं भी हूं और तुम भी हो
हम देखैंगे

सुनिये इक़बाल बानो की आवाज़ में:

http://www.youtube.com/watch?v=RQBr7m0n0Zo