१। अति सूधो सनेह को मारग है, जहँ नेकु सयानप बाँक नहीं
तहँ सीधे चलौ तजि आपनपौ, झिझकैं कपटी जो निशाँक नहीं
घननंद के प्यारे सुजान सुनौ, यहँ एक ते दूसरो आँक नहीं
तुम कौन सी पाटी पढ़े हौ कहौ, मन लेहु पै देहु छटाँक नहीं
(प्रेम का मार्ग बिलकुल सीधा है जहाँ सयानेपन और चतुराई के लिए कोई जगह नहीं है। वहाँ अपना अहंकार छोड़ कर सीधे चलो; यहाँ जो कपटी और शंकालु हैं वही झिझकते हैं। घनानंद के प्रिय मित्र सुजान यहाँ एक के सिवा दूसरा अंक नहीं है (प्रेम में सारा द्वैत समाप्त हो जाता है)। तुमने यह कैसी परिपाटी पढ़ी है जहाँ मन लेते हो किन्तु छटाँक भी नहीं देते हो (मन के दो अर्थ हैं; दूसरा अर्थ है चालीस सेर, छटाँक = १/१६ सेर)।
२। घननंद के प्यारे सुजान सुनौ, जेहिं भाँतिन हौं दुख-शूल सहौं
नहिं आवन औधि, न रावरि आस, इते पर एक सा बात चहौं
यह देखि अकारन मेरि दसा, कोइ बूझइ ऊतर कौन कहौं
जिय नेकु बिचारि कै देहु बताय, हहा प्रिय दूरि ते पाँय गहौं
(घनानंद के प्रिय सुजान सुनो कि मैं किस तरीके से ये दुःख-शूल सह रहा हूँ। न तो तुम्हारे आने की अवधि है, न कोई आशा है किन्तु एक बात पूछना चाहता हूँ। अकारण ही जो मेरी यह दशा हो रही है, यदि कोई पूछे तो मैं क्या उत्तर दूँ? अपने मन में विचार कर बता दो, मैं दूर से ही तुम्हारे पैर छूकर विनती करता हूँ।)
---लक्ष्मीनारायण गुप्त
---३ मार्च २००९
At present, this blog is set up to publish my Hindi poems and accept comments from the readers. Some contributions from others are also published from time to time. Laxmi N. Gupta
Tuesday, March 03, 2009
घनानंद की कविता 2
यह लेख के. पी. बहादुर की पुस्तक Love Poems of Ghananand पर आधारित है।
जीवनी
घनानंद के जीवन के बारे में कुछ भी निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता। सम्भवत: उनका जन्म सन् 1673 के लगभग दिल्ली के आसपास कहीं हुआ था। कुछ विद्वानों के अनुसार वे दिल्ली के बादशाह मुहम्मदशाह के दरबार में मुंशी थे। उन्हें सुजान नाम की एक गणिका से इश्क था। किंतु यह इश्क एकतरफा था। सुजान बहुत कुशल गायिका और नर्तकी थी और बादशाह के दरबार में नाचती और गाती थी। घनानंद भी बहुत अच्छा गाते थे। एक बार बादशाह ने घनानंद से गाने का अनुरोध किया। घनानंद घमंडी आदमी थे, मना कर दिया। फिर सुजान ने अनुरोध किया तो गाया किंतु सुजान की तरफ मुख कर और बादशाह की तरफ पीठ। बादशाह ने नाखुश होकर उन्हें देश से निकाल दिया। घनानंद ने सुजान से साथ आने का अनुरोध किया किंतु सुजान को दरबार का जीवन पसंद था; उसने मना कर दिया। घनानंद को वैराग्य होगया। वे बृन्दावन चले गए और निम्बार्क सम्प्रदाय में दीक्षा लेली। सन् 1757 में अहमदशाह अब्दाली ने मथुरा और बृन्दावन पर भी हमला किया। घनानंद एक पेड़ के नीचे भजन कर रहे थे। अब्दाली के सैनिकों ले माँगाः ज़र, ज़र, ज़र। ज़र का मतलब है सम्पत्ति। घनानंद ने एक चुटकी मिट्टी उठा के उसे गिराते हुए कहाः रज, रज, रज। यानी कि उनके पास इस पवित्र भूमि की रज (मिट्टी) के सिवा कुछ भी नहीं है। सैनिकों ने पहले उनके हाथ काटे फिर उनका बध कर दिया।
---लक्ष्मीनारायण गुप्त
---3 मार्च 2009
जीवनी
घनानंद के जीवन के बारे में कुछ भी निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता। सम्भवत: उनका जन्म सन् 1673 के लगभग दिल्ली के आसपास कहीं हुआ था। कुछ विद्वानों के अनुसार वे दिल्ली के बादशाह मुहम्मदशाह के दरबार में मुंशी थे। उन्हें सुजान नाम की एक गणिका से इश्क था। किंतु यह इश्क एकतरफा था। सुजान बहुत कुशल गायिका और नर्तकी थी और बादशाह के दरबार में नाचती और गाती थी। घनानंद भी बहुत अच्छा गाते थे। एक बार बादशाह ने घनानंद से गाने का अनुरोध किया। घनानंद घमंडी आदमी थे, मना कर दिया। फिर सुजान ने अनुरोध किया तो गाया किंतु सुजान की तरफ मुख कर और बादशाह की तरफ पीठ। बादशाह ने नाखुश होकर उन्हें देश से निकाल दिया। घनानंद ने सुजान से साथ आने का अनुरोध किया किंतु सुजान को दरबार का जीवन पसंद था; उसने मना कर दिया। घनानंद को वैराग्य होगया। वे बृन्दावन चले गए और निम्बार्क सम्प्रदाय में दीक्षा लेली। सन् 1757 में अहमदशाह अब्दाली ने मथुरा और बृन्दावन पर भी हमला किया। घनानंद एक पेड़ के नीचे भजन कर रहे थे। अब्दाली के सैनिकों ले माँगाः ज़र, ज़र, ज़र। ज़र का मतलब है सम्पत्ति। घनानंद ने एक चुटकी मिट्टी उठा के उसे गिराते हुए कहाः रज, रज, रज। यानी कि उनके पास इस पवित्र भूमि की रज (मिट्टी) के सिवा कुछ भी नहीं है। सैनिकों ने पहले उनके हाथ काटे फिर उनका बध कर दिया।
---लक्ष्मीनारायण गुप्त
---3 मार्च 2009
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