At present, this blog is set up to publish my Hindi poems and accept comments from the readers. Some contributions from others are also published from time to time. Laxmi N. Gupta
Wednesday, February 25, 2009
घनानंद की कविता
नेही महा, ब्रजभाषा प्रवीन औ सुंदरताहि के भेद को जानै
जोग वियोग की रीति में कोविद, भावना-भेद स्वरूप को जानै
चाह के रंग मैं भीज्यौ हियो, बिछुरे मिलैं प्रीतम शान्ति न मानैं
भाषा-प्रवीन सुछन्द सदा रहै, सो घन जी के कवित्त बखानै
जो महान प्रेमी है, ब्रजभाषा में प्रवीण है और सुन्दरता के भेद(रहस्य) को जानता है, योग और वियोग की रीति को जानता है, भावना के भेद और स्वरूप को समझता है, प्रेम से जिसका हृदय सराबोर है, प्रीतम के मिलने से भी जिसे शान्ति नहीं मिलती है (क्योंकि वह फिर जा सकता है), भाषा में चतुर किन्तु स्वच्छंद है, वही घनानंद की कविता का विवेचन कर सकता है।
अगले स्तम्भों में घनानंद की कुछ और कवितायें पेश करूँगा और इस उत्तम श्रंगार रस के कवि के जीवन के बारे में लिखूँगा। यदि आपको घनानंद का यह कवित्त पसंद आया हो तो टिप्पणी डालने का कष्ट करें।
---लक्ष्मीनारायण गुप्त
---२५ फरवरी २००९
Saturday, February 07, 2009
कृष्णभक्त कवि आलम
आलम जैसे कवियों को ध्यान में रख कर ही भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने कहा हैः
“इन मुसलमान हरिजनन पर कोटिन हिन्दू बारिए।“
आलम औरंगज़ेब के समकालीन थे। कहते हैं कि जन्म से ब्राह्मण थे और कवि थे। एक बार इन्होंने एक चादर रंगरेज़ के यहाँ रँगाने को भेजी। रँगरेज़ की जवान लड़की ने रँगते समय चादर में एक कागज़ लिपटा हुआ पाया जिसमें यह आधा दोहा लिखा हुआ थाः
“कनक छड़ी सी कामिनी काहे को कटि छीन।“
रँगरेज़न ने इसकी पूर्ति कीः
“कटि को कंचन काटि विधि, कुचन मध्य धरि दीन।।“
(दोहे का अर्थः कामिनी सोने की छड़ी की तरह है किन्तु उसकी कमर इतनी पतली क्यों है? वह यों है कि विधाता ने उसकी कमर के सोने को काट कर स्तनों में भर दिया है।)
उसने कागज़ को रँगी हुई चादर के साथ पंडित जी को लौटा दिया। पूरे दोहे को पढ़ कर पंडित जी बेतहासा रँगरेज़ कन्या के इश्क में पड़ गए। उसके बाप से कन्या का हाथ माँगा। बाप ने कहा, “पंडित जी, क़लमा पढ़ लीजिए, फिर कोई दिक्कत नहीं होगी।“ इस तरह पंडित जी को आलम नाम मिला। कहते है कि उनकी पत्नी का नाम शेख था।
आलम मुसलमान बनने के बाद भी कृष्णभक्त बने रहे। गोपी भाव से लिखा हुआ यह सुन्दर कवित्त हैः
जा थल कीन्हे बिहार अनेकन, ता थल काँकरी बैठि चुन्यो करैं।
जा रसना सों करी बहु बातन, ता रसना सों कवित्त गुन्यो करैं।
‘आलम’ जौन से कुंजन में करी केलि तहाँ अब सीस धुन्यो करैं।
नैनन में जो सदा रहते, तिनकी अब कान कहानी सुन्यो करैं।
(जिस स्थान में अनेक विहार किए, वहाँ बैठ कर अब कंकड़ चुनते रहते हैं। जिस जबान से कभी बैठ कर (कृष्ण) से बहुत बातें किया करते थे, अब उसी जबान से उनके चरित्र का गान करते रहते हैं। आलम कहते है कि जिन कुंजों में कभी (श्याम के साथ) खेलते रहते थे, वहाँ बैठ कर अब सर धुनते रहते हैं। जो आँखों मे सदा रहते थे, अब उनकी कहानी कानों से सुना करते हैं।)
एक और कवित्त हैः
चाँद को चकोर देखैं, निसि दिन को न लेखैं,
चंद बिन दिन छबि लागत अँधियारी है।
‘आलम’ कहत आली, अलि फूल हेतु चलैं,
काँटे सी कटीली बेलि, ऐसी प्रीति प्यारी है।
(चकोर रात दिन चन्द्रमा को देखते है; चन्द्रमा के बिना उन्हें दिन की छवि फीकी लगती है। आलम कहते हैं कि हे सखी, भौंरे की फूल से ऐसी अनोखी प्रीति है कि वे काँटे की कटीली बेल पर भी चले जाते हैं।)
आलम के बेटे का नाम जहान था। कहते हैं कि आलम की पत्नी से एक बार औरंगज़ेब के बेटे ने कहा, “सुना है कि तुम आलम की बीवी हो।“ उसने जवाब दिया, “ हुज़ूर मैं जहान की माँ हूँ।“
अन्त आलम के एक दोहे से करता हूँ जिसमें आलम का अटूट आत्मविश्वास झलकता हैः
नव रसमय मूरति सदा, जिन बरने नंदलाल।
‘आलम’ आलम बस कियो, दै निज कविता जाल।।
---लक्ष्मीनारायण गुप्त
---7 फरवरी 09