राम तुम कहलाते हो मर्यादा पुरुषोत्तम
स्थापित की तुमने मर्यादायें
आदर्श पुत्र की
आदर्श मित्र की
आदर्श पति की
आदर्श शत्रु की
इत्यादि, इत्यादि
आदर्श पति के रूप में
तुमने अपनी अपहरण की हुई पत्नी को
स्वीकार करने से इन्कार किया
यदि रावण ने उसके साथ जबरन बलात्कार किया होता
तो भी उसमें सीता का दोष कैसे होता
तुमने अग्नि परीक्षा से उसकी हत्या करने की कोशिश की
नाकामयाब रहे
पत्नी को घर लाए
फिर अपनी कीर्ति बरकरार रखने के लिए
एक मूर्ख धोबी की बात सुन कर
गर्भवती पत्नी को वन में निर्वासित कर दिया
यह कैसा आदर्श, कैसी मर्यादा रखी
तुमने मर्यादा पुरुषोत्तम
अब तुम्हारे अनुयाई, धर्म के ठेकेदार
अपनी ही पत्नियों को जिनके साथ
बलात्कार किया गया है, या केवल शक भर है
घर से निकाल देते हैं
या परिवार की 'इज्ज़त' के लिए उन्हें
जान से मार देते हैं
या ज़िन्दा जला देते हैं
जैसे तुमने सीता के साथ किया था
यह कैसा न्याय है जिसमें
दोषी के स्थान पर
पीड़ित को दंड दिया जाता है
राम तुम साक्षात भगवान थे
ऐसा तुम्हारे भक्त मानते हैं
तो इन निरपराध, निरीह बालाओँ की
मृत्यु का दोष किस पर है
मैं तो एक अदना इन्सान हूँ
मैं क्या कर सकता हूँ
तुम भगवान हो
जो चाहो कर सकते हो
यह सारा शो तुम्हारा है
चाहो तो एक और अवतार लेकर
पिछले अवतार की ग़लतियाँ
ठीक कर सकते हो
---लक्ष्मीनारायण गुप्त
---२९ नवम्बर २००९
4 comments:
बहुत उम्दा रचना!!
मैं तो यही कहूँगा आपको कि लिखने से पहले जतना ज्यादा उस मुद्दे पर अध्ययन करेंगे उतना ही बढीया लिखा पायेंगे । आप के ऐसे बकवास करने से कोई भगवान राम को भगवान मानना नहीं छो़ड़ देगा । आप कह रहे हैं कि तुम भगवान थे , इसका क्या मतलब है । हो सकता है कि आप उन्हे भगवान ना मानते हो लेकिन हम तो मानते है , तो कम से कम इसलिए उन्हे तुम कह के सम्बोधित करना कितना सही लगता है जरा सोचियेगा । न पता लोग कैसे भगवान राम पर आरोप लगाते है , कम से कम कुछ सोच लेना चाहिए और ऐसा लिखने से पहले से सौ बार सोचना चाहिए । और समीर लाल जी आपसे निवेदन है कि रचनाएं पूरा पढने का बाद ही मूल्यांकन किया करिए ।
समीर जी,
टिप्पणी के लिए धन्यवाद।
मिथिलेश जी,
आपकी टिप्पणी के लिए धन्यवाद। आपने अपने मन की भंड़ास निकाल ली लेकिन मेरी बात काटने के लिए आपके पास कोई तर्क नहीं है। यह कविता मैंने बहुत सालों की सोच के बाद लिखी है। आप भी ज़रा अन्धभक्ति छोड़ कर अपना दिमाग लगाइए तो आपका और समाज दोनों का भला होगा।
आपने यह कैसे सोच लिया कि समीर लाल जी ने बिना पढ़े टिप्पणी की है?
My response was almost same when I read Ramayana first time. The last page was really anticlimax, If Ram was an ordinary person than one can say that it usually happen, but it is a bad thing. But for in case Ram it is really a disappointment.
It is also written on the same page that Ram says to seta “किया तुम समझती हो के में तुमहारी पाकदामनी को नहीं जानता? ये इमतहान लोगों को मुतमईन करने के किये था, वरना वोह कॆहत के राम ने मोहब्बत के जनून में मोहज़्ज़ब इनसानों का दसतूर तोड़ा"
But we also consider that Ram’s father has given sacred syrup to all three wives by which they become pregnant, 50% is taken by Ram’s mother, and 25-25% is taken by other two women. Consequently the qualities of Vishnu are distributed among four brothers.
The comment made by Mithilesh may be his personnel view, but he uses a very bad language to criticize you, as it is highly sensitive issue, it is not unusual.
Ram is regarded as highly honorable personality among non-Hindus also. Allama Iqbal says
हॆ राम के वजूद पर हिनदोसतान को नाज़
ऎहले नज़र समझते हॆं इस को इमामे हिन्द
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