Thursday, November 26, 2009

टर्की आरती


(अमेरिकन शुक्रगुजारी (Thanksgiving) के त्योहार पर)

ॐ जय टर्की देवी।

जो खावैं, फल पावैं,

भूख मिटे उनकी।

प्राण तेरे जावैं,

फिक्र नहीं उसकी।

ॐ जय टर्की देवी।

करुण कहानी तेरी,

हम कैसे गावैं?

तेरे बलिदानों का,

पार कहाँ पावैं।

ॐ जय टर्की देवी।

फ्रैंकलिन की इच्छा थी,

तू बने राष्ट्रीय पक्षी।

विधि की विडम्बना ऐसी,

कि राष्ट्र हुआ तेरा भक्षी।

ॐ जय टर्की देवी।

जान तुम्हारी लेकर,

करे दुनिया शुक्रगुजारी।

सहन करो हे देवी,

यह घोर कृतघ्नता भारी।

ॐ जय टर्की देवी।

तेरी यह महिमा,

जो कोई जन गावे।

कष्ट मिटें सारे,

वाँछित फल पावे।

ॐ जय टर्की देवी।

...लक्ष्मीनारायण गुप्त

...१७ नवम्बर २००५

3 comments:

महेन्द्र मिश्र said...

बहुत रोचक रचना वाह भाई

Udan Tashtari said...

मस्त!!!

Deepesh said...

I also did extempore aarti before the turkey dinner