(अमेरिकन शुक्रगुजारी (Thanksgiving) के त्योहार पर)
ॐ जय टर्की देवी।
जो खावैं, फल पावैं,
भूख मिटे उनकी।
प्राण तेरे जावैं,
फिक्र नहीं उसकी।
ॐ जय टर्की देवी।
करुण कहानी तेरी,
हम कैसे गावैं?
तेरे बलिदानों का,
पार कहाँ पावैं।
ॐ जय टर्की देवी।
फ्रैंकलिन की इच्छा थी,
तू बने राष्ट्रीय पक्षी।
विधि की विडम्बना ऐसी,
कि राष्ट्र हुआ तेरा भक्षी।
ॐ जय टर्की देवी।
जान तुम्हारी लेकर,
करे दुनिया शुक्रगुजारी।
सहन करो हे देवी,
यह घोर कृतघ्नता भारी।
ॐ जय टर्की देवी।
तेरी यह महिमा,
जो कोई जन गावे।
कष्ट मिटें सारे,
वाँछित फल पावे।
ॐ जय टर्की देवी।
...लक्ष्मीनारायण गुप्त
3 comments:
बहुत रोचक रचना वाह भाई
मस्त!!!
I also did extempore aarti before the turkey dinner
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