Sunday, November 15, 2009

मैं गीत प्यार के लिखता हूँ



मैं गीत प्यार के लिखता हूँ

मैं गीत दर्द के लिखता हूँ

जो दर्द प्यार में मिला

कभी उसके बारे में लिखता हूँ


मैं गीत व्यंग्य के लिखता हूँ

जो चुभें आहत करें किन्तु

मैं ऐसा व्यंग्य बोलता हूँ

जो केवल हमें हँसाता है

वह व्यंग्य नही कहलाता है

मैं ऐसे गीत नहीं लिखता

मैं गीत व्यंग्य के लिखता हूँ


मैं गीत व्यथा के लिखता हूँ

जो कुचले सहमे डरे हुए

जो निर्ममता से मिटे हुए

उन हारे थके मानवों की

मैं गीत व्यथा के लिखता हूँ


---लक्ष्मीनारायण गुप्त

---१५ नवम्बर २००९

6 comments:

Mrs. Asha Joglekar said...

सुंदर कविता, सुंदर भाव ।

वाणी गीत said...

प्यार ..दर्द ...व्यंग्य ..व्यथा ...सब कुछ तो समेत लिया कविताओं ने ...लिखते रहे शुभकामनायें ..!!

Udan Tashtari said...

बेहतरीन रचना!!

श्यामल सुमन said...

व्यथा हो चाहे व्यंग्य हो लिखें प्यार के गीत।
पढ़ेंगे सारे लोग वो जिससे जिसको प्रीत।।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com

mehek said...

मैं गीत व्यंग्य के लिखता हूँ

जो चुभें न आहत करें किन्तु

मैं ऐसा व्यंग्य बोलता हूँ

जो केवल हमें हँसाता है

bahut hi sunder baat,sunder kavita

Laxmi N. Gupta said...

आप सभी को टिप्पणी डालने के लिए और प्रोत्साहन बढ़ाने के लिए धन्यवाद।