मैं गीत प्यार के लिखता हूँ
मैं गीत दर्द के लिखता हूँ
जो दर्द प्यार में मिला
कभी उसके बारे में लिखता हूँ
मैं गीत व्यंग्य के लिखता हूँ
जो चुभें न आहत करें किन्तु
मैं ऐसा व्यंग्य बोलता हूँ
जो केवल हमें हँसाता है
वह व्यंग्य नही कहलाता है
मैं ऐसे गीत नहीं लिखता
मैं गीत व्यंग्य के लिखता हूँ
मैं गीत व्यथा के लिखता हूँ
जो कुचले सहमे डरे हुए
जो निर्ममता से मिटे हुए
उन हारे थके मानवों की
मैं गीत व्यथा के लिखता हूँ
---लक्ष्मीनारायण गुप्त
---१५ नवम्बर २००९
6 comments:
सुंदर कविता, सुंदर भाव ।
प्यार ..दर्द ...व्यंग्य ..व्यथा ...सब कुछ तो समेत लिया कविताओं ने ...लिखते रहे शुभकामनायें ..!!
बेहतरीन रचना!!
व्यथा हो चाहे व्यंग्य हो लिखें प्यार के गीत।
पढ़ेंगे सारे लोग वो जिससे जिसको प्रीत।।
सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com
मैं गीत व्यंग्य के लिखता हूँ
जो चुभें न आहत करें किन्तु
मैं ऐसा व्यंग्य बोलता हूँ
जो केवल हमें हँसाता है
bahut hi sunder baat,sunder kavita
आप सभी को टिप्पणी डालने के लिए और प्रोत्साहन बढ़ाने के लिए धन्यवाद।
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