एक बार भगवान बुद्ध के चचेरे भाई और विरोधी राजकुमार देवदत्त ने द्वेष वश गृद्धकूट पर्वत के ऊपर से बुद्ध भगवान के ऊपर एक शिला फेंकी जो दो पत्थरों से टकरा कर टूट गई किन्तु एक शिलाखंड भगवान के पैर पर लगा जिससे उन्हें कुछ चोट लगी और रक्त बहा। जीवक, जो भगवान का चिकित्सक था, ने मरहम पट्टी की। फिर वह किसी अन्य की चिकित्सा के लिए नगर चला गया। लौटते लौटते उसे रात होगई और तब तक विहार का द्वार बन्द हो चुका था अतएव वह अन्दर नहीं आ पाया। उसने बुद्ध भगवान के घाव पर कुछ तीखी बूटियाँ लगाई थीं कि पट्टी खुलनी आवश्यक थी नहीं तो बड़ा तेज दर्द हो सकता था। भगवान को इसका पता था और उन्होंने पट्टी खुलवा दी। जब जीवक आया तो वह बहुत दु:खी था कि भगवान को बहुत कष्ट हुआ होगा तब भगवान ने उससे यह श्लोक कहा:
गतद्धिनो विसोकस्स विप्पमुत्तस्स सब्बधि।
सब्बगन्थप्पहीनस्स परिलाहो न विज्जति।।
पूर्ण हो चुकी है जिसकी यात्रा
शोकरहित वह है सर्वथा विमुक्त।
काट दिए हैं जिसने सारे बन्धन
नहीं होता है उसे कोई कष्ट।।
यह बौद्ध धर्म ग्रन्थ धम्मपद के सातवें अद्ध्याय अरहन्तवग्गो का प्रथम श्लोक है। इस ग्रन्थ के हर श्लोक के साथ किसी व्यक्ति का नाम जुड़ा है जिसको सम्बोधित करके भगवान ने यह श्लोक कहा है और साथ ही साथ एक सन्दर्भ कथा जिसने इस वाणी को प्रेरित किया।
जीवक के बारे में भी एक कहानी है। वह एक गणिका का पुत्र था जिसे उसने पैदा होते ही एक मिटटी के ढेर पर फेंक दिया था। महाराज बिम्बिसार के पुत्र अभय ने उसे देखा और कहा यह तो जीवित है। इसलिए उसका नाम जीवक पड़ा। बडा होकर वह एक प्रसिद्ध चिकित्सक बना और बुद्ध भगवान का व्यक्तिगत वैद्य।
---लक्ष्मीनारायण गुप्त
---२८ मई २००९
8 comments:
सुन्दर/प्रेरक कथा।
जानकारीपूर्ण कथा वरना तो इस तरह की कथायें लगभग भूलते जा रहे हैं.
जैन कथाओं में राजकुमार अभय का उल्लेख आता है. ये वाला वही है या दुसरा? क्या पता.
अच्छी जानकारी.
बहुत सुंदर पोस्ट।
संजय जी,
मुझे जैन कथाओं के राजकुमार अभय का ज्ञान नहीं है। सम्भवत: वही हैं कयोंकि बुद्ध और महावीर समकालीन थे। महावीर अवस्था में बुद्ध से शायद १५-२० साल बड़े थे।
टिप्पणी के लिए धन्यवाद।
समीर जी,
टिप्पणी के लिए धन्यवाद।
संगीता जी,
टिप्पणी के लिए धन्यवाद।
अनूप जी,
टिप्पणी के लिए धन्यवाद।
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