Sunday, November 30, 2008

पति की सेहत

(एक सत्य घटना पर आधारित)
पति जी मेरी बात मानने लगे
अपनी सेहत का ध्यान रखने लगे
रोज़ सवेरे घुमने जाने लगे
हेल्थ प्राडक्ट्स खरीद के लाने लगे
सीसे के सामने अपने को सँवारने लगे
मैं भी खूभ खुश हुई
वे जब घूमने जाते थे, घर के काम करने लगी
एक पड़ोसन को भी अपनी सेहत की चिन्ता हुई
मेरे पति के साथ वह भी सवेरे घूमने जाने लगी
मैंने सोचा यह भी अच्छा ही होगा
साथ में आसानी से समय कट जाता होगा
पहले तो पति जी वीक डेज़ में ही जाते थे
वीक एन्ड्स पर घर पर ही रहते थे
अब वीक एन्ड्स पर भी जाने लगे
यही नहीं देर से भी लौटने लगे
कहने लगे ज़रा दूर तक जाते हैं
भूख लग आती है इसलिए मकडानल्ड से ब्रेकफास्ट करके आते हैं
मेरा माथा कुछ ठनका तो सही
किन्तु मैंने सोचा मेरी पड़ोसन ऐसी नहीं
एक दिन ने पति ने बड़ी संगीनी से बुलाया
उन्हें किसी और से इश्क होगया है, ऐसा फरमाया
कोई और मेरी पड़ोसन ही थी
मेरी खुशी पर गाज डालने वाली मेरी सहेली ही थी
मैं आज अपनी मूर्खता को कोसती हूँ
बच्चों की अकेले ही देख रेख करती हूँ
समय मिलता है तो नये पति की तलाश करती हूँ
पत्नियो अब मेरी बात पर ध्यान दो
यदि पति घुमने निकले तो सारे काम छोड़ दो
तैयार होकर उसके साथ जाओ
उसके साथ अपनी भी सेहत बनाओ
यही नहीं अपनी शादी भी बचाओ

---लक्ष्मीनारायण गुप्त
---३० नवम्बर २००८

Saturday, November 29, 2008

प्यार की लड़ाई

अजब है यह प्यार की लड़ाई
जो हारा वह जीत गया भाई
हार के प्रेमिका करे मान गुमान
प्रियतम तब होवे बड़ा परेशान
ग्लानि से भरे प्रियतम का मन
प्यारी से वह तब करे यह अनुवेदन
मै ग़लत था प्रिये, अब मानो मेरी बात
माफ करो मुझे, देखो उठाके आँख
प्रियतम यूँ जब मनौना करता है
प्यारी का दिल भी पसीजने लगता है
प्रिय फिर उसका दुलार करता है
अपने अमर प्रेम का इज़हार करता है
फूल माले प्यार से पेश करता है
चाकलेट, रसमलाई लाता है
रूठी प्रेमिका मान जाती है
प्रिय को फिर दिल से लगाती है
रोते रोते वह हँसने लगती है
चुम्बनों के साथ उसे माफ करती है
इस तरह दोनों ही जीत जाते भाई
अजब है यह प्यार की लड़ाई

---लक्ष्मीनारायण गुप्त
---२९ नवम्बर २००८

Saturday, November 22, 2008

चार समोसे

पहले यह पढ़िएः

http://simplebrowser.blogspot.com/2008/11/rs10000-for-four-samosas.html


अब कविता पढ़िएः

समोसा खायो रे
बड़ा मज़ा आयो रे

अब पैसे चुकाओ बाबू
हालैन्ड तक पछताओ बाबू

दस हज़ार रुपए के चार समोसे
पहले खायें फिर दिल को मसोसें

मेरे समोसों में है वाजीकरण
पत्नी को खुश करेंगे, यह मेरा वचन

पैसे देते जाओ
मेरी ज़िन्दगी बनाओ
सोनपुर के मेले से कुछ बैल लेते जाओ
इन बैलों जैसी शक्ति पाओ
रोज़ ग़र मेरा समोसा खाओ

अरे, अरे दरोगा जी आइए
इतना गुस्सा न खाइए
मुफ़्त समोसा खाइए
इन परदेशियों की बात न मानिए
दस हज़ार में अपना कट भी बताइए

अरे दरोगा जी, अब डंडे से न मारिए
नौ हज़ार नौ सौ नब्बे लौटाता हूँ
अब रहम करिए
हुज़ूर आप माई बाप हैं
अब हवालात में न डालिए

---लक्ष्मीनारायण गुप्त
---२२ नवम्बर 0८

Wednesday, November 12, 2008

खटमल स्तोत्र

कुछ दिन पहले अखबार में समाचार पढ़ा था कि अमेरिका आने वाले प्रवासियों के साथ कुछ खटमल भी आ गए हैं। उनमें से कुछ भारतीय खटमल भी होंगे। जैसा कि आप जानते होंगे कि जहाँ तक खटमलों का सम्बन्ध है, यह देश बड़ा असहिष्णु है। उनके नाश के साधन बहुत हैं। अब ज़रा भारतीय खटमल के दुःखों की कल्पना करिए। उस जीव की जिसकी प्रशंसा में ये कविताएँ लिखी गई हैं:

‍१। कमले कमला शेते, हरश्शेते हिमालये
क्षीराब्धौ च हरिश्शेते, मन्ये मत्कुण शंकयः

कमला कमल पर सोती हैं, शिव जी हिमालय पर सोते हैं, विष्णु भगवान क्षीरसागर पर सोते हैं। मेरी मान्यता है कि यह सब खटमल की आशंका से है।

२। मन्नन द्विवेदी गजपुरी की एक कविता की शुरू की दो पंक्तियाँ हैः

सुनिए महाराज खटकीरा
आप न जानी पर की पीरा

३। घाघ भड्डरी कह गए हैं:

ई दुनिया माँ तीन कसाई
खटमल पिस्सू बाम्हन भाई
(ब्राह्मणों का क्षमाप्रार्थी हूँ।)

प्रसिद्ध इन्डोलोजिस्ट हाइनरिक ज़िमर की पुस्तक में एक आख्यान आता है कि ‍१९वीं शताब्दी की बम्बई में कुछ पैसे कमाने में निपुण लोग एक खटमलों वाली खटिया लेकर धर्मभीरु लोगों के दरवाजों पर खटिये पर लेट कर अपने को कटवाते थे और लोग उन्हें इस पुण्य कार्य के लिए पैसे देते थे।
(Philosophies of India by Heinrich Zimmer; Bollingen Series/Princeton 1989; pg 279)

अब मेरे विचार में आवश्यकता है एक खटमल बचाओ आन्दोलन की। हो सकता है इसे अमेरिका में संकटापन्न जाति (endangered species) का दर्जा मिल जाये।

---लक्ष्मीनारायण गुप्त
---‍१२ नवम्बर २००८