आज उनसे तू तू मैं मैं होगई
जीतके भी हार मेरी होगई
कौन अब किसको मनाएगा स्वयं ही सोचलो
कौन प्रातः चाय अब ऑफर करेगा सोचलो
कौन अब सारी कहेगा सोचलो
कौन पिक्चर के टिकट लाएगा यह भी सोचलो
दूसरे दिन शाम को मैं पुष्प लाऊँगा
मान परिपूरित प्रिया को मैं मनाऊँगा
जीता तो भी हार मानूँगा
है तुम्हारी शपथ तुमसे फिर वही मुस्कान माँगूँगा
प्रिय तुम्हारे नयन में यह नीर कैसा
मूर्ख हूँ मैं जो किया परिहास ऐसा
मान जाओ प्रिये अब इस ओर देखो
फिर मेरी 'रानी' बनो इस ओर देखो
...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...१७ जुलाई २००८
At present, this blog is set up to publish my Hindi poems and accept comments from the readers. Some contributions from others are also published from time to time. Laxmi N. Gupta
Thursday, July 17, 2008
Sunday, July 13, 2008
हिन्दी सुभाषित
१। पर उपदेश कुशल बहुतेरे। जे आचरहिं ते नर न घनेरे।।
---गोस्वामी तुलसीदास
२। गोधन, गजधन, बाजिधन और रतनधन खान।
जब आवै सन्तोष धन सब धन धूरि समान।।
----सन्त कबीर
३। रहिमन धागा प्रेम का मत तोड़ो चिटकाय।
तोड़े से फिर ना जुड़ै, जुड़े गाँठ पड़ि जाय।।
----रहीम
४। रहिमन याचकता भली जो थोरेहु दिन होय।
हित अनहित या जगत में जानि परै सब कोय।।
----रहीम
५। कबिरा घास न निन्दिये जो पाँवन तर होय।
उड़ि कै परै जो आँख में खरो दुहेलो होय।।
----सन्त कबीर
६। सुखं हि दु:खान्यनुभूय शोभते घनान्धकारेमिवदीपदर्शनम्।
सुखातयोयाति नरोदरिद्रताम् धृत: शरीरेण मृत: स: जीवति।।
----शूद्रक (मृच्छकटिक नाटक)
(सुख की शोभा दुःख के अनुभव के बाद होती है जैसे घने अंधकार में दीपक की। जो मनुष्य सुख से दुःख में जाता है वह जीवित भी मृत के समान जीता है।)
७। कबिरा यह तन खेत है, मन, बच, करम किसान।
पाप, पुन्य दुइ बीज हैं, जोतैं, बवैं सुजान।।
----सन्त कबीर
८। का बरखा जब कृखी सुखाने। समय चूकि पुनि का पछिताने।।
-----गोस्वामी तुलसीदास
९। रहिमन देखि बड़ेन को लघु न दीजिये डारि।
जहाँ काम आवै सुई काह करै तरवारि।।
-----रहीम
१०। अजगर करैं न चाकरी, पंछी करैं न काम।
दास मलूका कहि गये सब के दाता राम।।
----- सन्त मलूकदास
११। तुलसी बुरा न मानिये जो गँवार कहि जाय।
जैसे घर का नरदवा भला बुरा बहि जाय।।
------गोस्वामी तुलसीदास
१२। कादर मन कँह एक अधारा। दैव दैव आलसी पुकारा।।
------गोस्वामी तुलसीदास
१३। परहित सरिस धर्म नहिं भाई। परपीरा सम नहिं अधमाई।।
------गोस्वामी तुलसीदास
१४। निजभाषा उन्नति अहै सब उन्नति को मूल
-------भारतेन्दु हरिश्चंद्र
१५। सब तै भले बिमूढ़, जिन्हैं न ब्यापै जगत गति
-------गोस्वामी तुलसीदास
१६। भोगविलास ही जिनके जीवन का प्रयोजन
आलसी, असंयत करें अत्यधिक भोजन।
मार करता है इन निर्बलों की तवाही
करे कृश वृक्ष को ज्यों पवन धराशाई।।
----गौतम बुद्ध (धम्मपद ७) (मेरा अनुवाद)
१७। जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी
-----महर्षि वाल्मीकि (रामायण)
( अपने को जन्म देनेवाली जन्मभूमि स्वर्ग से भी अधिक श्रेष्ठ है)
१८। काजर की कोठरी में कैसे हू सयानो जाय
एक न एक लीक काजर की लागिहै पै लागिहै।
-----अज्ञात
१९। होनवार बिरवान के होत चीकने पात।
-----अज्ञात
२०। जेहिं बिधना दारुण दुःख देहीं। ताकै मति पहिलेहि हरि लेंहीं।।
-----गोस्वामी तुलसीदास
२१। करमगति टारे नाहिं रे टरी।
-----सन्त कबीर
२२। तुलसी जसि भवतव्यता तैसी मिलै सहाय।
आपु न आवै ताहिं पै ताहिं तहाँ लै जाय।।
-----गोस्वामी तुलसीदास
२३। नहिं असत्य सम पातकपुंजा। गिरि सम होंहिं कि कोटिक गुंजा।।
-----गोस्वामी तुलसीदास
२४। जा दिसि बहै बयार, ताहि दिसि टटवा दीजै।
-----अज्ञात
२५। मूरख के मुख बम्ब हैं, निकसत बचन भुजंग।
ताकी ओषधि मौन है विष नहिं व्यापै अंग।।
-----(मुझे याद नहीं)
२६। बढ़त बढ़त सम्पति सलिल मन सरोज बढ़ि जाय।
घटत घटत पुनि ना घटै तब समूल कुम्हिलाय।।
------(मुझे याद नहीं)
२७। बड़ा हुआ तो क्या हुआ जैसे लम्ब खजूर।
पंथी को छाया नहीं फल लागैं अति दूर।।
------(मुझे याद नहीं)
२८। करत करत अभ्यास के जड़ मति होंहिं सुजान।
रसरी आवत जात ते सिल पर परहिं निशान।।
------(मुझे याद नहीं)
२९। भले भलाइहिं सों लहहिं, लहहिं निचाइहिं नीच।
सुधा सराहिय अमरता, गरल सराहिय मीच।।
------गोस्वामी तुलसीदास
३०। पिबन्ति नद्यः स्वमेय नोदकं, स्वयं न खादन्ति फलानि वृक्षः।
धाराधरो वर्षति नात्महेतवे, परोपकाराय सतां विभूतयः।।
-------अज्ञात
(नदियाँ स्वयं अपना पानी नहीं पीती हैं। वृक्ष अपने फल स्वयं नहीं खाते हैं। बादल अपने लिये वर्षा नहीं करते हैं। सन्तों का अस्तित्व केवल परोपकार के लिये होता है।)
३१। नेकी कर और दरिया में डाल।
----किस्सा हातिमताई(?)
३२। नीम हकीम खतरे जान। खतरे मुल्ला दे ईमान।।
----अज्ञात
३३। ऊँच अटारी मधुर वतास। कहैं घाघ घर ही कैलाश।
----घाघ भड्डरी (अकबर के समकालीन, कानपुर जिले के निवासी)
३४। अरहर की दाल औ जड़हन का भात
गागल निंबुआ औ घिउ तात
सहरसखंड दहिउ जो होय
बाँके नयन परोसैं जोय
कहै घाघ तब सबही झूठा
उहाँ छाँड़ि इहवैं बैकुंठा
-----घाघ
३५। झूठा मीठे बचन कहि रिन उधार लै जाय
लेत परम सुख ऊपजै लै के दियो न जाय
लै के दियो न जाय ऊंच अरू नीच बतावै
रिन उधार की रीति माँगते मारन धावै
कह गिरधर कविराय रहै वो मन में रूठा
बहुत दिना होइ जायँ कहै तेरो कागद झूठा
-----गिरधर
---गोस्वामी तुलसीदास
२। गोधन, गजधन, बाजिधन और रतनधन खान।
जब आवै सन्तोष धन सब धन धूरि समान।।
----सन्त कबीर
३। रहिमन धागा प्रेम का मत तोड़ो चिटकाय।
तोड़े से फिर ना जुड़ै, जुड़े गाँठ पड़ि जाय।।
----रहीम
४। रहिमन याचकता भली जो थोरेहु दिन होय।
हित अनहित या जगत में जानि परै सब कोय।।
----रहीम
५। कबिरा घास न निन्दिये जो पाँवन तर होय।
उड़ि कै परै जो आँख में खरो दुहेलो होय।।
----सन्त कबीर
६। सुखं हि दु:खान्यनुभूय शोभते घनान्धकारेमिवदीपदर्शनम्।
सुखातयोयाति नरोदरिद्रताम् धृत: शरीरेण मृत: स: जीवति।।
----शूद्रक (मृच्छकटिक नाटक)
(सुख की शोभा दुःख के अनुभव के बाद होती है जैसे घने अंधकार में दीपक की। जो मनुष्य सुख से दुःख में जाता है वह जीवित भी मृत के समान जीता है।)
७। कबिरा यह तन खेत है, मन, बच, करम किसान।
पाप, पुन्य दुइ बीज हैं, जोतैं, बवैं सुजान।।
----सन्त कबीर
८। का बरखा जब कृखी सुखाने। समय चूकि पुनि का पछिताने।।
-----गोस्वामी तुलसीदास
९। रहिमन देखि बड़ेन को लघु न दीजिये डारि।
जहाँ काम आवै सुई काह करै तरवारि।।
-----रहीम
१०। अजगर करैं न चाकरी, पंछी करैं न काम।
दास मलूका कहि गये सब के दाता राम।।
----- सन्त मलूकदास
११। तुलसी बुरा न मानिये जो गँवार कहि जाय।
जैसे घर का नरदवा भला बुरा बहि जाय।।
------गोस्वामी तुलसीदास
१२। कादर मन कँह एक अधारा। दैव दैव आलसी पुकारा।।
------गोस्वामी तुलसीदास
१३। परहित सरिस धर्म नहिं भाई। परपीरा सम नहिं अधमाई।।
------गोस्वामी तुलसीदास
१४। निजभाषा उन्नति अहै सब उन्नति को मूल
-------भारतेन्दु हरिश्चंद्र
१५। सब तै भले बिमूढ़, जिन्हैं न ब्यापै जगत गति
-------गोस्वामी तुलसीदास
१६। भोगविलास ही जिनके जीवन का प्रयोजन
आलसी, असंयत करें अत्यधिक भोजन।
मार करता है इन निर्बलों की तवाही
करे कृश वृक्ष को ज्यों पवन धराशाई।।
----गौतम बुद्ध (धम्मपद ७) (मेरा अनुवाद)
१७। जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी
-----महर्षि वाल्मीकि (रामायण)
( अपने को जन्म देनेवाली जन्मभूमि स्वर्ग से भी अधिक श्रेष्ठ है)
१८। काजर की कोठरी में कैसे हू सयानो जाय
एक न एक लीक काजर की लागिहै पै लागिहै।
-----अज्ञात
१९। होनवार बिरवान के होत चीकने पात।
-----अज्ञात
२०। जेहिं बिधना दारुण दुःख देहीं। ताकै मति पहिलेहि हरि लेंहीं।।
-----गोस्वामी तुलसीदास
२१। करमगति टारे नाहिं रे टरी।
-----सन्त कबीर
२२। तुलसी जसि भवतव्यता तैसी मिलै सहाय।
आपु न आवै ताहिं पै ताहिं तहाँ लै जाय।।
-----गोस्वामी तुलसीदास
२३। नहिं असत्य सम पातकपुंजा। गिरि सम होंहिं कि कोटिक गुंजा।।
-----गोस्वामी तुलसीदास
२४। जा दिसि बहै बयार, ताहि दिसि टटवा दीजै।
-----अज्ञात
२५। मूरख के मुख बम्ब हैं, निकसत बचन भुजंग।
ताकी ओषधि मौन है विष नहिं व्यापै अंग।।
-----(मुझे याद नहीं)
२६। बढ़त बढ़त सम्पति सलिल मन सरोज बढ़ि जाय।
घटत घटत पुनि ना घटै तब समूल कुम्हिलाय।।
------(मुझे याद नहीं)
२७। बड़ा हुआ तो क्या हुआ जैसे लम्ब खजूर।
पंथी को छाया नहीं फल लागैं अति दूर।।
------(मुझे याद नहीं)
२८। करत करत अभ्यास के जड़ मति होंहिं सुजान।
रसरी आवत जात ते सिल पर परहिं निशान।।
------(मुझे याद नहीं)
२९। भले भलाइहिं सों लहहिं, लहहिं निचाइहिं नीच।
सुधा सराहिय अमरता, गरल सराहिय मीच।।
------गोस्वामी तुलसीदास
३०। पिबन्ति नद्यः स्वमेय नोदकं, स्वयं न खादन्ति फलानि वृक्षः।
धाराधरो वर्षति नात्महेतवे, परोपकाराय सतां विभूतयः।।
-------अज्ञात
(नदियाँ स्वयं अपना पानी नहीं पीती हैं। वृक्ष अपने फल स्वयं नहीं खाते हैं। बादल अपने लिये वर्षा नहीं करते हैं। सन्तों का अस्तित्व केवल परोपकार के लिये होता है।)
३१। नेकी कर और दरिया में डाल।
----किस्सा हातिमताई(?)
३२। नीम हकीम खतरे जान। खतरे मुल्ला दे ईमान।।
----अज्ञात
३३। ऊँच अटारी मधुर वतास। कहैं घाघ घर ही कैलाश।
----घाघ भड्डरी (अकबर के समकालीन, कानपुर जिले के निवासी)
३४। अरहर की दाल औ जड़हन का भात
गागल निंबुआ औ घिउ तात
सहरसखंड दहिउ जो होय
बाँके नयन परोसैं जोय
कहै घाघ तब सबही झूठा
उहाँ छाँड़ि इहवैं बैकुंठा
-----घाघ
३५। झूठा मीठे बचन कहि रिन उधार लै जाय
लेत परम सुख ऊपजै लै के दियो न जाय
लै के दियो न जाय ऊंच अरू नीच बतावै
रिन उधार की रीति माँगते मारन धावै
कह गिरधर कविराय रहै वो मन में रूठा
बहुत दिना होइ जायँ कहै तेरो कागद झूठा
-----गिरधर
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