Monday, June 23, 2008

सुअर को एलर्जी



(27 जून 08 की “The Week” पत्रिका से साभार)





खुदा की बड़ी उसपे मेहर हो गई

एक सुअर की बच्ची को एलर्जी हो गई

सुअर-कन्या को कीचड़ से एलर्जी हो गई

सुअरत्व के खिलाफ यह बात हो गई

सुअर को दलदल से नफरत हो गई

बड़े कमाल की यह बात हो गई



सिन्डर्स नामसे सुअर-कन्या जानी गई

भाई बहनों के साथ कीचड़ में खेलने न गई

बारह साल की एली उसकी मालकिन द्रवित हुई

सिन्डर्स की दशा उससे देखी न गई

बड़े कमाल-------



सिन्डर्स को नन्ही नन्ही बूटियाँ पहनाई गईं

खुशी खुशी सिन्डर्स फिर कीचड़ में गई

एली की वह पेट सुअरिया बन गई

हैम और सासेज बनने से वो बच गई

बड़े कमाल---------

---लक्ष्मीनारायण गुप्त

---२३ जून २००८

Monday, June 09, 2008

एक फिल्मी स्टाइल का गीत

(“हमने तड़पाया तो बोलो क्या करोगे” की तर्ज पर)

जब कभी अरमान उभरेंगे तो बोलो क्या करोगे
जब हमारी याद आयेगी तो बोलो क्या करोगे
जब हमें ना भुला पाओगे तो बोलो क्या करोगे
क्या हमारे पास आओगे कहोगे माफ करदो
ग़र नहीं दी हमने माफी क्या करोगे
जब कभी----

हम तड़पते हैं तो तुम भी तड़पते हो
हम तुम्हें जो मिल न पाए क्या करोगे
हम तुम्हारी धड़कनों में बस रहे हैं
हमने ठुकराया तो बोलो क्या करोगे
जब कभी---

तुम हमारे पास आओ हम तुम्हें अपनायेंगे
हमने अपनाया तो बोलो क्या करोगे
हम तुम्हारे, तुम हमारे हैं हमेशा
हमें तुमसे प्यार बोलो क्या करोगे
जब कभी---

---लक्ष्मीनारायण गुप्त
---9 जून 2008

Friday, June 06, 2008

एक मुरझाया सुमन

नहीं तुम पलकें बिछाना हमारी राह में, हम तेरे दीदार के लायक नहीं

तरस हरगिज़ नहीं खाना तुम हमारे हाल पर, हम तेरी रहमत के अधिकारी नहीं

गीत भी मेरे नहीं तुम गुनगुनाना, तुमको भायें गीत वे मेरे नहीं

मेरी तनहाई पर प्रियतम तुम नहीं मायूस होना, तेरी मायूसी के हम लायक नहीं

भूल जाना प्रिये मुझको, कोई पागल मिला था, सोच यह लेना सही

तुम हमारी मौत पर भी नहीं आँसू बहाना, ज़िन्दगी से मौत है बेहतर कहीं

जब तुम्हारे द्वार से निकले जनाज़ा, तनिक दरवाजे से आकर झाँक लेना

अगर मुमकिन हो मेरी जाँ, एक मुरझाया सुमन मेरे कफ़न पर डाल देना



---लक्ष्मीनारायण गुप्त

---३ जून २००८