Wednesday, March 19, 2008

होली की बेला

होली की बेला है, प्रवासी अकेला है

नहीं जलती इस देश में होली की ज्वाला है
दिखती नहीं यहाँ पर उपलों की माला है
गोझियों का भोग भी कहाँ लगने वाला है
होली की...

नहीं जानता यहाँ पर कोई प्रह्लाद की कहानी
हिरण्यकसिपु और होलिका की साजिश और बेईमानी
नहीं जानता कोई कान्हा और राधा के रास की कहानी
होली की...

नहीं उड़ाता हैं कोई यहाँ पर धुलहठी की धूल अम्बर तक
फागमण्डलियों के जोशीले सुर यहाँ नहीं जाते गगनमण्डल तक
कबीरें नहीं गाता कोई यहाँ धूल उड़ाने पर
होली की...

पिचकारियों से यहाँ कोई रंग नहीं चलाता
न ही अबीर और गुलाल कोई मुँह पर लगाता
न ही कोई हँस के गले से लगाता
होली की...

नहीं होता यहाँ होली पर हँसी और मजाक
न ही अल्हड़ जवानी का हास-परिहास
बूढ़े भी करते थे वहाँ होली पर रसिकपन की बात
होली की...


कहाँ है यहाँ युवा वृन्द का अविरल उत्साह
दिखता नहीं यहाँ बाल वृद्धों का उमड़ता हुलास
न ही भाभियों के चेहरों पर रंग और गुलाल
होली की...

...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...१९ मार्च २००८

9 Comments:

At 10:06 AM, Anonymous Priyankar said...

आपका 'नोस्टैल्जिया' समझ सकता हूं . होली पर ढेर सारी शुभकामनाएं और माथे पर चुटकी भर अबीर-गुलाल.

 
At 10:42 AM, Blogger रवीन्द्र प्रभात said...

आपने तो वातावरण होलीमय ही कर दिया .....! बधाईयाँ!

 
At 1:00 PM, Blogger Kaput Pratapgarhi said...

आपकी कविता अलग तरह की है।
होली का अनुभव जरूर लिखियेगा

 
At 7:04 PM, Blogger Laxmi N. Gupta said...

प्रियंकर जी, रवीन्द्र जी एवं प्रतापग्रही जी,

बहुत धन्यवाद और होली की बधाई।

 
At 8:42 AM, Blogger Udan Tashtari said...

सब कुछ जाना पहचाना भोगा हुआ सा लगता है...होली पर ढेर सारी शुभकामनाएं

 
At 3:08 PM, Blogger Lavanyam - Antarman said...

लक्ष्मी भाई साहब, बिलकुल सही फर्माया आपने !
यहाँ कहाँ अपने भारत - सी होली ?
परँतु, वसम्त का आगमन अवश्य हुआ है
आपको व रानी भाभी जी को भी होली की बधाइयाँ -
-- लावण्या

 
At 10:57 AM, Anonymous sangeeta agrawal said...

होली की शुभकामनाएँ

होली का त्योहर यहाँ ज़रूर मनता है
पर प्रवासी का ना होना मन को खलता है।
पिचकारी मे है रंग, ठंडाई मे है भंग
मन मे नही उमंग क्योंकि प्रवासी का नही है संग्।
गुलाल मे न अबीर, चलते नही नयन तीर
गुजियों मे नही स्वाद, प्रवासी की आती याद्।
होलिका दहन नही दिखता कही पर्।
क्योकि ग्लोबल वार्मिंग का है डर
प्रवासी खेलो होली ना करो मलाल
फ़िज़ायों मे भरा है रंग और गुलाल्।

 
At 1:08 PM, Blogger Laxmi N. Gupta said...

लावण्या जी, समीर जी,

बहुत धन्यवाद । शुभ होली।

 
At 1:11 PM, Blogger Laxmi N. Gupta said...

संगीता,

बहुत बढिया लिखा है। मन को अच्छा लगा। आप तो छुपी रुस्तम निकलीं। होली मुबारक हो।

 

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