Monday, February 18, 2008

बाग़-ए-दुनिया

इस बाग़ में अब बहार नहीं आएगी
इन डालों में कोपलें नहीं फूटेंगी
ए कलियाँ अब अधखिली रह जाएंगी
घोर बरसात की बात नहीं पूछो अब
इस सावन को फुहार भी नहीं आएगी
अस्ताचल को जा रहा है सूरज
इन किरणों से अब धूप नहीं आएगी
शुष्क हो रही है जीवन की धारा
इस नदी में अब बाढ़ नहीं आएगी
ग़म नहीं यह तो नियम है जीवन का
बहार-ए-बाग़-ए-दुनिया चन्द दिन के लिए आएगी

---लक्ष्मीनारायण गुप्त
---१८ फरवरी २००८

3 Comments:

At 11:45 AM, Blogger Udan Tashtari said...

बहुत खूब, लक्ष्मी जी..क्या बात है.

 
At 8:47 PM, Blogger Mired Mirage said...

बहुत सुन्दर !
घुघूती बासूती

 
At 9:12 AM, Blogger Laxmi N. Gupta said...

समीर जी, घुघूती जी,

प््रोत््साहन के लिए बहुत धन््यवाद।

 

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