Friday, November 30, 2007

चलते चलो


दिल के दरिये में ग़म को डुबोते चलो

आँख भर आये आँसू बहाते चलो

सुर सज जाये तो गीत गाते चलो

सुर ना भी सजे गुनगुनाते चलो

पद थकें तो थकें किन्तु चलते चलो

अपने जीवन की गंगा बहाते चलो

कुछ भी चाहो नहीं, कुछ भी माँगो नहीं

जो मिले उस पर जीवन निभाते चलो

अगर हो सके मुस्कुराते चलो

किन्तु चलते चलो, किन्तु चलते चलो

हँसते हँसते चलो, रोते रोते चलो

किन्तु चलते चलो, किन्तु चलते चलो

जब तक जीवन है कर्तव्य करते चलो

मौत आयेगी तब तो ठहरना ही है

तब तक चलते चलो, तब तक चलते चलो

लक्ष्मीनारायण गुप्त

…30 नवम्बर 2007

Sunday, November 04, 2007

चूहा पुराण

जिन चूहों को तुम सदा समझ रहे थे तुच्छ।
उन चूहों की बुद्धि को पंडित समझें उच्च।।

कुछ वैज्ञानिकों ने किया एक प्रयोग प्रसिद्ध।
चूहों की श्रेष्ठता को जिसने कर दिया सिद्ध।।

आटा गेहूँ का लिया चोकर दिया निकाल।
तत्वहीन उस चूर्ण से बिस्कुट दिए बनाय।।

सूँघा इन बिस्कुटों को चूहों ने दिया त्याग।
बेवकूफ इन्सान थे खागए सह अनुराग।।

पौष्टिक आटे से किया बिस्कुट का निर्माण।
चूहों और मनुष्य को अवसर किया प्रदान।।

चूहे खाए चाव से तश्तरी कर दी साफ।
मूर्ख मनुष्यों ने मगर नहीं लगाया हाथ।।

बुद्धिमान गण ईश को तथ्य रहा यह ज्ञात।
चूहा खाता है प्रथम फिर वह खाते आप।।

तुम इन्सानों में अगर होती यदि कुछ बुद्धि।
चूहों का सम्मान कर तुम पा जाते सिद्धि।।

करते रहते हो सदा चूहों का अपमान।
दिखलाता है मूर्ख नर तेरा यह अज्ञान।।

चूहों का सम्मान कर उनको भोग लगाहु।
जाको चूहा न चखे वा तुमहूँ ना खाहु।।

...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...४ नवम्बर २००७

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