(फिलहाल में इज़रायल में घटी एक सत्य घटना पर आधारित)
ससुर दामाद में बात हुई
कथा बड़ी यह विचित्र हुई
दामाद को हुई बड़ी कठिनाई
किसी तरह से मन की बात बताई
बोले, ससुर जी आपकी बेटी
रहती है मुझसे रूठी रूठी
खोई खोई सी वह रहती है
पूछो तो कुछ नहीं कहती है
ससुर जी, कृपया सहायता कीजिए
अपनी कन्या पर एक जासूस लगा दीजिए
हो सकता है कुछ गड़बड़ी हो
कन्या आपकी किसी और के प्यार में पड़ी हो
सुन कर यह दामाद की दरख्वास्त
ससुर जी ने किया एक जासूस तैनात
देखेगा जो बिटिया की गतिविधियों को
रिपोर्ट करेगा फिर ससुर दामाद को
सुनिए यह उत्तम कथानक प्यारो
अक्सर रहती थी बिटिया अपनी माँ के पास यारो
जासूस को हुई कुछ परेशानी
करनी पड़ती थी उसे सासू जी की भी निगरानी
पाठको, यह हुई बड़ी हैरानी की बात
जासूस ने की जब की तहकीकात
पत्नी में कोई खामी नहीं थी
किन्तु सासू जी किसी के आगोश में पड़ीं थीं
बिटिया को पता था यह प्रेम व्यापार
चिन्तायें थीं उसके मन में हजार
इसी चिन्ता में वह रहती थी खोई
पति ने सोचा वह दिल अपना खोई
ससुर जी ने बड़ी शिक्षा पाई
कर दिया सासू जी को बाई बाई
...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...२५ जुलाई २००७
At present, this blog is set up to publish my Hindi poems and accept comments from the readers. Some contributions from others are also published from time to time. Laxmi N. Gupta
Wednesday, July 25, 2007
Sunday, July 15, 2007
हरि किरपा, एक व्यंग्य कविता
(चेतावनीः जिन्हें "हगास" जैसे शब्द सुरुचिपूर्ण न लगते हों, कृपया आगे न पढ़ें। जो बहुत अधिक आस्तिक या बहुत पक्के नास्तिक हों उन्हें भी शायद बुरा लगे। मैंने यह कविता ज़रा शरारत के मूड में लिखी है। माफ़ कीजियेगा।)
बिना हरि किरपा के हगास भी नहीं आती है।
इसीलिये नास्तिकों को कब्जियत हो जाती है।।
पहला चूरन चार्वाक ने बनाया होगा।
कर्ज के घी से जब अजीरण हुआ होगा।।
श्राद्ध माह में प्रति दिन तीन दावतें होती हैं।
पंडितों को किन्तु कोई बीमारी नहीं लगती है।।
राम नाम जैसी कोई दवाई नहीं आती है।
बिना हरि किरपा के हगास भी नहीं आती है।।
नास्तिक करते हैं अपना जिगर खराब।
चरणामृत की जगह पीते हैं शराब।।
तभी तो उन पर महामारी आती है।
बिना हरि किरपा के हगास भी नहीं आती है।।
इसलिये सज्जनो रामनाम का चूरन खाइए।
रबड़ी मलाई भर पेट खा जाइए।।
खाना है यदि हलवा पूरी, मोहनभोग और रबड़ी।
कचौरी, मालपुए और सोहनपपड़ी।।
तो हरि किरपा बिन बात नहीं बनती है।
बिना हरि किरपा के हगास भी नहीं आती है॥
कब्ज, मधुमेह और दिल की बीमारी।
भक्तों को ये नहीं लगती हैं सारी।।
इसलिये प्यारो मन्दिरों, मस्जिदों और गिरजों में जाओ।
घंटे घड़ियाल बजाओ और रोओ गिड़गिड़ाओ।।
प्रेम से फिर मस्ती मनाओ।
और जितना चाहो उतना खाओ।।
प्रभु की किरपा से महामारी नहीं आती है।
बिना हरि किरपा के हगास भी नहीं आती है।।
...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...११ जुलाई २००७
बिना हरि किरपा के हगास भी नहीं आती है।
इसीलिये नास्तिकों को कब्जियत हो जाती है।।
पहला चूरन चार्वाक ने बनाया होगा।
कर्ज के घी से जब अजीरण हुआ होगा।।
श्राद्ध माह में प्रति दिन तीन दावतें होती हैं।
पंडितों को किन्तु कोई बीमारी नहीं लगती है।।
राम नाम जैसी कोई दवाई नहीं आती है।
बिना हरि किरपा के हगास भी नहीं आती है।।
नास्तिक करते हैं अपना जिगर खराब।
चरणामृत की जगह पीते हैं शराब।।
तभी तो उन पर महामारी आती है।
बिना हरि किरपा के हगास भी नहीं आती है।।
इसलिये सज्जनो रामनाम का चूरन खाइए।
रबड़ी मलाई भर पेट खा जाइए।।
खाना है यदि हलवा पूरी, मोहनभोग और रबड़ी।
कचौरी, मालपुए और सोहनपपड़ी।।
तो हरि किरपा बिन बात नहीं बनती है।
बिना हरि किरपा के हगास भी नहीं आती है॥
कब्ज, मधुमेह और दिल की बीमारी।
भक्तों को ये नहीं लगती हैं सारी।।
इसलिये प्यारो मन्दिरों, मस्जिदों और गिरजों में जाओ।
घंटे घड़ियाल बजाओ और रोओ गिड़गिड़ाओ।।
प्रेम से फिर मस्ती मनाओ।
और जितना चाहो उतना खाओ।।
प्रभु की किरपा से महामारी नहीं आती है।
बिना हरि किरपा के हगास भी नहीं आती है।।
...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...११ जुलाई २००७
Tuesday, July 10, 2007
जीवन के द्वन्द्व
नहीं सही है कभी विरह की व्यथा जिन्होंने,
मधुर मिलन का मान करेंगे कैसे?
कभी कलह की कटुता जिनके पास न आई,
प्रेम भाव का मोल करेंगे कैसे?
नहीं सहा है दुःख गरीबी का पल भर भी जिनने,
वे नर धन की कद्र करेंगे कैसे?
जिनसे पीड़ा का कोई सम्बन्ध नहीं है,
औरों की पीड़ा जानेंगे कैसे?
द्वेष कभी न उठा चित्त में जिनके,
कैसे राग उठेगा उनके मन में?
कभी अँधेरा जिनके पास न आया,
वे प्रकाश का मान करेंगे कैसे?
...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...१० जुलाई २००७
मधुर मिलन का मान करेंगे कैसे?
कभी कलह की कटुता जिनके पास न आई,
प्रेम भाव का मोल करेंगे कैसे?
नहीं सहा है दुःख गरीबी का पल भर भी जिनने,
वे नर धन की कद्र करेंगे कैसे?
जिनसे पीड़ा का कोई सम्बन्ध नहीं है,
औरों की पीड़ा जानेंगे कैसे?
द्वेष कभी न उठा चित्त में जिनके,
कैसे राग उठेगा उनके मन में?
कभी अँधेरा जिनके पास न आया,
वे प्रकाश का मान करेंगे कैसे?
...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...१० जुलाई २००७
Monday, July 09, 2007
विश्व हिन्दी सम्मेलन
सुना है हो रहा है विश्व हिन्दी सम्मेलन।
हो रहा है एक वृहत् आयोजन।।
बड़े बड़े नेता और बड़े बड़े विद्वान।
पधारेंगे अपनी बढ़ायेंगे शान।।
भाषण होंगे, होंगे कविसम्मेलन।
होगा साहित्य और राजनीति का मिलन।।
भाषणों की किन्तु होगी बहुतायत।
जबान सस्ती है नहीं इसकी कोई कीमत।।
सरकारी लोग भी भाषण देंगे।
सम्भवतः वे अंग्रेज़ी में बोलेंगे।।
सुना है कुछ लोग यह भी कहेंगे।
हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र में मान्यता दिलायेंगे।।
सरकारी लोग भी इसका समर्थन करेंगे।
और भाषणों के बाद तालियाँ बजायेंगे।।
मैं सोचता हूँ हिन्दी संयुक्त राष्ट्र की भाषा बन सकती है।
वैसे ही जैसे यह भारत की राज्य भाषा बन पड़ी है।।
केवल एक प्रस्ताव पास करा दो।
हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र की एक भाषा बना दो।।
केवल उसमें एक शर्त लगा दो।
मित्रो, एक पन्थ दो काज बना लो।।
हिन्दी संयुक्त राष्ट्र की एक भाषा बन जायेगी।
जिस दिन हिन्दी यथार्थ में भारत की राज्यभाषा बन जायेगी।।
...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...९ जुलाई २००७
हो रहा है एक वृहत् आयोजन।।
बड़े बड़े नेता और बड़े बड़े विद्वान।
पधारेंगे अपनी बढ़ायेंगे शान।।
भाषण होंगे, होंगे कविसम्मेलन।
होगा साहित्य और राजनीति का मिलन।।
भाषणों की किन्तु होगी बहुतायत।
जबान सस्ती है नहीं इसकी कोई कीमत।।
सरकारी लोग भी भाषण देंगे।
सम्भवतः वे अंग्रेज़ी में बोलेंगे।।
सुना है कुछ लोग यह भी कहेंगे।
हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र में मान्यता दिलायेंगे।।
सरकारी लोग भी इसका समर्थन करेंगे।
और भाषणों के बाद तालियाँ बजायेंगे।।
मैं सोचता हूँ हिन्दी संयुक्त राष्ट्र की भाषा बन सकती है।
वैसे ही जैसे यह भारत की राज्य भाषा बन पड़ी है।।
केवल एक प्रस्ताव पास करा दो।
हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र की एक भाषा बना दो।।
केवल उसमें एक शर्त लगा दो।
मित्रो, एक पन्थ दो काज बना लो।।
हिन्दी संयुक्त राष्ट्र की एक भाषा बन जायेगी।
जिस दिन हिन्दी यथार्थ में भारत की राज्यभाषा बन जायेगी।।
...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...९ जुलाई २००७
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