जब मेरी उम्र यही कुछ ८-९ साल की थी, कुछ महत्वपूर्ण घटनायें घटीं। मेरे गाँव से एक मील कम दूर पर एक गाँव में मेरे पिता जी की बुआ और उनका परिवार रहता था किन्तु हमारे परिवारों में दुश्मनी चल रही थी और आना जाना, बात-चीत कुछ भी नहीं होती थी। एक दिन एक शव-यात्रा जा रही थी। गंगा जी तक जाने का रास्ता हमारे घर के सामने से जाता था। पिता जी ने पता लगाया तो उन्हें पता चला कि यह उनकी बुआ की शव-यात्रा है। पिता जी सब काम छोड़ कर बारात के साथ हो लिए। इस घटना के दो-तीन महीने याद हमारे दरवाजे पर एक रथ रुका, जिसमें एक वृद्ध दम्पति आए थे। हम बच्चों को नहीं पता था किन्तु पिता जी की बुआ के सबसे बड़े पुत्र अपनी पत्नी के साथ आए थे। उन्होंने बताया कि वे एक असाध्य रोग से पीड़ित हैं और इस दुनिया में अधिक दिनों के लिए नहीं हैं। ऊन्होंने कहा कि उनकी बड़ी इच्छा है कि वे २० साल से चली आ रही हमारे परिवारों के बीच की अनबन को मिटा के ही इस दुनिया सेजायें। मेरे पिता जी उनसे उम्र में कम से कम २० साल छोटे थे, उन्होंने पैर छू के कहा, " भाई साहब, मैं भी यही चाहता हूँ।" तब से हमारी रिश्तेदारी फिर से स्थापित हुई और परिवारों में आना, जाना फिर शुरू हुआ। कुछ ही महीनों में ताऊ जी की मृत्यु हो गई।
यह रिश्ता फिर से चलने का शुभ परिणाम कुछ महीनों में ही हमें मिला। मेरे पिता जी किसानों को सूद पर पैसा उधार दिया करते थे। काफी सारा पैसा कई गाँवों में इस तरह फैला हुआ था। कुछ हजार रुपयों का कर्ज गाँव के रईस ठाकुरों पर भी था। मेरे बड़े भाई ने यह पूछने की धृष्टता की कि यह कर्ज वे कब चुका रहे है। वैमनस्यता इस बात से शुरू हुई और बढ़ती गई। ठाकुर लोग हमारे दुश्मन हो गए। मेरे पिता जी बैलगाड़ी पर सामान लेकर दो नौकरों के साथ पास के एक बड़े गाँव में सप्ताह में दो दिन वहाँ के बाज़ार में अपनी परचून की दूकान लगाते थे। ठाकुरों ने गुण्डे लगा कर डराना धमकाना शुरू किया। आखिरकार पिता जी ने दूकान ले जाना छोड़ दिया। ठाकुरों ने लोगों को उकसाया कि वे हमारा कर्ज न अदा करें, यह कह कर कि बनिए क्या कर लेंगे। काफी सारा पैसा डूब गया। ठाकुरों की कृपा से हमारे घर में गरीबी ने पदार्पण किया।
इतने पर भी ठाकुरों का पेट नहीं भरा और मेरे पिता पर १०० रुपए का झूठा मुकदमा दायर किया, गाँव पंचायत में जिसके सरपंच थे ठाकुर के छोटे भाई। तो यह कोई आश्चर्य की बात नहीं थी कि ठाकुर मुकदमा जीत गए किन्तु अपील में हार गए। अब वे बहुत चिढ़े। हमारे घर में सेंध लगी। काफी माल चुराया गया। जब पिता जी ने रपट की, तहकीकात हुई और पुलिस (जो अवश्य ही चोरों से मिली हुई थी। हमारे घर में सभी को विश्वास था कि चोरी ठाकुरों ने ही कराई है।) ने कहा कि यह सेंध तो इतनी सँकरी है कि इससे तो कोई इन्सान घुस ही नहीं सकता। मेरे पिता जी को घंटों थाने पर गर्मी के दिनों में भूखे प्यासे बिठाए रखा और उन पर झूठी रपट लिखाने का इलजाम पुलिस लगा रही थी। हम लोगों ने अपने नए फिर से मिले सम्बंधियों और मेरी बहन के ससुर को सूचित किया। इन लोगों ने दौड़ धूप कर एक कांग्रेसी नेता से सम्पर्क किया। बड़ी मुश्किल से पिता जी घर लौट कर आए, नेता जी के प्रयत्न से। पुलिस को और नेता जी को शायद घूस भी देनी पड़ी होगी किंतु मुझे इसका सही ज्ञान नहीं है।
बहुत सालों बाद जब मैंने श्रीलाल शुक्ल का दरबारी राग पढ़ा तो मुझे लगा कि मेरे परिवार ने कुछ हद तक वह भोग रखा है जो इस उपन्यास के पात्रों ने भोगा है। गाँव का जीवन अब तो और भी अधिक कुत्सित है।
"अहा, ग्राम्य जीवन भी क्या है,
ऐसी सुविधा और कहाँ है?
क्यों न इसे सब का मन चाहे?"
मैथिलीशरण गुप्त जी की ये पंक्तियाँ मेरे गाँव पर नहीं लागू होतीं हालाँकि मैंने सातवें दर्जे में ग्राम्य जीवन पर लिखे एक लेख की शुरुआत इसी उद्धरण से की थी और उस पर मुझे अच्छे अंक भी मिले थे।
...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...16 जून 2007
At present, this blog is set up to publish my Hindi poems and accept comments from the readers. Some contributions from others are also published from time to time. Laxmi N. Gupta
Saturday, June 16, 2007
Monday, June 11, 2007
काले वर की व्यथा
(कुछ दिन पूर्व बिहार के एक गाँव में एक वधू ने वर को बहुत काला बता कर उससे शादी करने से इंकार कर दिया। किन्तु वर ने हार नहीं मानी और लड़की के दरवाजे पर दो दिनों तक धरना देता रहा। अन्ततः कन्या ने द्रवित होकर उससे शादी करना मंजूर कर लिया। यह कविता इसी सत्य घटना पर आधारित है।)
मुझको काला समझ प्रिये क्यों शादी से इंकार किया
दिल तो काला नहीं हमारा उस पर ज़रा न ध्यान दिया
नहीं हमारे दिल से पूछा बीत रही क्या उस पर है
यह कैसा है न्याय प्रिये क्यों इस पर नहीं विचार किया
इतनी आसानी से प्यारी हम तो हार नहीं मानेंगे
जब तक दिल न तुम्हारा पिघले दरवाजे पर धरना देंगे
सत्याग्रह का अस्त्र अहिंसक तुम पर यहीं चलायेंगे
जब तक हाँ तुम नहीं कहोगी आसन यहीं जमायेंगे
काले से तुम क्यों डरती हो काले ही थे कृष्ण कन्हैया
मोहित जिन पर राधा प्यारी मोहित उन पर सारी सखियाँ
मोहित जिन पर हुईं जानकी रामचन्द्र भी काले थे
सुन्दरता से ज्यादा सुन्दर तुलसी उनको माने थे
हमने निश्चय किया सुन्दरी तेरा हाथ सँभालेंगे हम
काले तन की कोमलता से तेरे मन को मोहेंगे हम
किसी बात की कमी तुम्हें महसूस न होने देंगे हम
सारे उर का प्रेम सुन्दरी तुम पर आज उँड़ेलेंगे हम
मान भी जाओ हमदम अब तुम इतना हमको नहीं सताओ
लालू के इस पुण्यदेश में मेरी पत्नी बन कर आओ
मेरा जैसा प्रेमी तुमको नहीं मिलेगा प्यारी फिर
छोड़ प्रचंड रूप यह देवी करुणामय अब हो मुझ पर
…लक्ष्मीनारायण गुप्त
…11 जून 2007
मुझको काला समझ प्रिये क्यों शादी से इंकार किया
दिल तो काला नहीं हमारा उस पर ज़रा न ध्यान दिया
नहीं हमारे दिल से पूछा बीत रही क्या उस पर है
यह कैसा है न्याय प्रिये क्यों इस पर नहीं विचार किया
इतनी आसानी से प्यारी हम तो हार नहीं मानेंगे
जब तक दिल न तुम्हारा पिघले दरवाजे पर धरना देंगे
सत्याग्रह का अस्त्र अहिंसक तुम पर यहीं चलायेंगे
जब तक हाँ तुम नहीं कहोगी आसन यहीं जमायेंगे
काले से तुम क्यों डरती हो काले ही थे कृष्ण कन्हैया
मोहित जिन पर राधा प्यारी मोहित उन पर सारी सखियाँ
मोहित जिन पर हुईं जानकी रामचन्द्र भी काले थे
सुन्दरता से ज्यादा सुन्दर तुलसी उनको माने थे
हमने निश्चय किया सुन्दरी तेरा हाथ सँभालेंगे हम
काले तन की कोमलता से तेरे मन को मोहेंगे हम
किसी बात की कमी तुम्हें महसूस न होने देंगे हम
सारे उर का प्रेम सुन्दरी तुम पर आज उँड़ेलेंगे हम
मान भी जाओ हमदम अब तुम इतना हमको नहीं सताओ
लालू के इस पुण्यदेश में मेरी पत्नी बन कर आओ
मेरा जैसा प्रेमी तुमको नहीं मिलेगा प्यारी फिर
छोड़ प्रचंड रूप यह देवी करुणामय अब हो मुझ पर
…लक्ष्मीनारायण गुप्त
…11 जून 2007
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