Thursday, April 26, 2007

कुछ अवधी कहावतें

१। अधाधुन्ध दरबार माँ गदहा पँजीरी खाँय।
(यह मेरी माँ तब कहती थीं जब उन्हें लगता था कि लोग हमारे परिवार की उदारता का नाजायज फायदा उठा रहे हैं।)
२। कत्त्थर गुद्दर सोवैं। मरजाला बैठे रोवैं।।
(कथरी गुदड़ी ओढ़ने वाला आराम से सो रहा है लेकिन फैन्सी कपड़ों वाला जाड़े से ठिठुर रहा है।)
३। काम नहीं कोउ का बनि जाय। काटी अँगुरी मूतत नाँय।
(यदि किसी की कटी हुई उँगली इनके मूतने से ठीक हो जाए तो ये वह भी नहीं करेंगे।)
४। करिया बाम्हन ग्वार चमार। इन दून्हों ते रह्यो होसियार।।
५। खरी बात जइसे मौसी का काजर।
६। गगरी दाना। सुद्र उताना।।
७। घर माँ नाहीं दाने। अम्मा चलीं भुनाने।।
८। घातै घात चमरऊ पूछैं, मलिकौ पड़वा नीके है।
(पड़वा मर रहा है। अगर मर गया हो चमार उसे खाल के लिये ले जायेगा।)
९। जग जीतेव मोरी रानी। बरु ठाढ़ होय तो जानी।।
१०। जस मतंग तस पादन घोड़ी। बिधना भली मिलाई जोड़ी।।
११। जबरा मारै, रोवन न देय।।
१२। जाड़ जाय रुई कि जाड़ जाय दुई।
१३। जाड़ लाग, जाड़ लाग जड़नपुरी। बुढ़िया का हगास लागि बिपति परी।।
१४। ठाढ़ा तिलक मधुरिया बानी। दगाबाज कै यहै निसानी।।
१५। त्रियाचरित्र न जानै कोय। खसम मारि कै सत्ती होय।।
१६। दिये न बिधाता, लिखे न कपार।
१७। धन के पन्द्रा मकर पचीस। जाड़ा परै दिना चालीस।।
१८। नोखे घर का बोकरा। खरु खाय न चोकरा।।
१९। नोखे गाँवैं ऊँट आवा। कोउ देखा कोऊ देखि न पावा।।
२०। बहि बहि मरैं बैलवा, बाँधे खाँय तुरंग।
२१। बरसौ राम जगै दुनिया। खाय किसान मरै बनिया।।
२२। बूढ़ सुआ राम राम थोरै पढ़िहैं।
२३। भरी जवानी माँझा ढील।
२४। लरिकन का हम छेड़तेन नाहीं, ज्वान लगैं सग भाई।
बूढ़ेन का हम छोड़तेन नाहीं चहे ओढ़ैं सात रजाई।।
२५। सूमी का धन अइसे जाय। जइसे कुंजर कैथा खाय।।
(कहते हैं कि हाथी समूचे कैथे के अन्दर का गूदा खाकर समूचे खोखले कैथे का मलत्याग करता है।)
२६। सोनरवा की ठुक ठुक, लोहरवा की धम्म।
२७। हिसकन हिसकन नौनिया हगासी।

...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...२६ अप्रैल २००७

Wednesday, April 18, 2007

जीवन के क्षण

जीवन कुछ जादुई क्षणों का नाम है
जीवन गत वसन्त की एक सुहानी शाम है
जीवन शिशु की मधुर मधुर मुस्कान है
यह गायक की परम सुरीली तान है
जीवन...

जीवन प्यारी के अधरों की लाली है
जीवन जीने की उमंग मतवाली है
जीवन पूरब में उषा की लाली है
अमराई में यह कोकिल की बोली है
जीवन...

जीवन वर्षा से यह सोंधी घास है
जी भर जीने का यह उल्लास है
जीने वालों को जीवन पर श्रद्धा और विश्वास है
जी भर जीने वाला मित्रो, होता नहीं हताश है
जीवन...

नभमंडल में चित्रित अगणित तारे हैं
विस्मय की भावना जगाने वाले हैं
इस अद्भुत विस्मय का जीवन नाम है
विस्मयरहित अभागा वह इन्सान है
जीवन...

जीवन सागर की अथाह गहराई है
जीवन नभमण्डल की असीम ऊंचाई है
नीचे गिरना, ऊंचे उठना जीवन का व्यापार है
जीवन पाकर यही हमें अधिकार है
जीवन...

सब दृष्यों में जीवन का इतिहास है
सबकी सांसों में जीवन का वास है
सभी सुरों में जीवन का संगीत है
सभी तरफ से आता अपना मीत है
जीवन...

लक्ष्मीनारायण गुप्त
१६ अप्रैल २००७

Monday, April 16, 2007

गीता का पद्यानुवाद

मेरा गीता का पद्यानुवाद अब दूसरे संस्करण में है। यह अनुवाद संस्कृत मूल के साथ सजिल्द और रंगीन चित्रों के साथ है। छपाई सुन्दर है। संयुक्त राज्य अमेरिका और कैनडा निवासियों के लिये मूल्य $१२.५० (US) रखा है। डाक खर्च मैं वहन करूँगा। भारतवासियों के लिये मूल्य २५० रुपए है। यदि आपको मेरी कवितायें पसन्द हैं तो आपको इस अनुवाद से निराशा नहीं होगी। यदि खरीदना चाहते हैं तो मुझे ई-मेल (gupta.laxmi@gmail.com) भेजें। कुछ और सूचना यहाँ पर है जो पहले संस्करण के लिए लिखी थीः

A Hindi Verse Translation of Gita
by
Laxmi N. Gupta
Professor of Math & Statistics, RIT
Rochester, NY

This translation is done for the speakers of Hindi language who are not conversant with Sanskrit. The translator has tried to preserve the original sense of Gita. An effort has been made not to inject his personal interpretation but to let the verses speak for themselves. The language has been kept as simple as possible. Some examples are given below:

जीर्ण हो जाते हैं जब नर के वसन
त्याग उनको पहनता वह नूतन
शरीर ऐसे ही जब हो जाता जीर्ण
आत्मा को मिलती हैं देहें नवीन (२-२२)

छेदते नहीं हैं इसको शस्त्र
जलता नहीं है यह अनल से
गीला नहीं करता इसको जल
सूखता नहीं है यह पवन से (२-२३)

अधर्म की जब होती है उन्नति
और धर्म का होता है अभाव
तब तब मैं अर्जुन मैं अपनी माया के द्वारा
करता हूँ मैं अपना प्रादुर्भाव (४-७)

करने को साधु जनों का संरक्षण
और करने को आतताइयों का मर्दन
धर्म संस्थापना की इच्छा के कारण
जनमता हूँ मैं युग युग में अर्जुन (४-८)

If interested in acquiring a copy of the book, send e-mail to:

lngsma@rit.edu or gupta.laxmi@gmail.com

भवदीय,

लक्ष्मीनारायण गुप्त
१६ अप्रैल २००७

Friday, April 06, 2007

आत्मज्ञान

यह दुनिया एक पहेली है,
जिसका हल मिला नहीं मुझको।
कितनी पोथी पुस्तक छानीं,
पर मानी नहीं मिला मुझको।
कितने संत असंत मिले,
कोई ज्ञानी नहीं मिला मुझको।
इतनी राहें नज़र अारहीं,
जाती कहां पता किसको।
राह दिखाते अंधों को,
अंधे खुद सभी मिले मुझको।
इतनी नदियां नज़र आरहीं,
है सागर कहां पता किसको।
सागर तक जाने के पहले,
सब सूख गई हैं यह देखो।
पास आरही जीवन-संध्या,
पर मारग नहीं मिला मुझको।
प्रभु को मानो, प्रभु को त्यागो,
बकवास निरी लगती मुझको।
आतमज्ञान जिसे कहते हैं,
क्या मृगतृष्णा ही है, मित्रो?

...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...६ अप्रैल २००७

Monday, April 02, 2007

एक सार्वभौमिक सार्वकालिक सत्य

यदि आप अपने कानों और आँखों को खुला रखें तो सत्य का ज्ञान कहीं भी और कभी भी हो सकता है। उदाहरण के लिये मैंने अपने विश्वविद्यालय में एक इश्तिहार लगा देखाः "I pod, You pod, We pod." यदि इन वाक्यांशों के पहले शब्द को अंग्रेज़ी में और दूसरे को हिन्दी में "d" का उच्चारण "द" करके देखें तो आप समझ जायेंगे कि मेरा अर्थ क्या है। इस सार्वभौमिक, सार्वकालिक तथ्य का उद्घोष विश्व में पहली बार नहीं हुआ है। मेरी माँ एक कहानी सुनाया करती थीं। एक दूल्हा अपनी बारात लेकर जा रहा था। रास्ते में एक तालाब पड़ा जहाँ पर कुछ नवयुवतियाँ स्नान कर रही थीं। एक युवती ने सहसा पाद दिया। दूल्हे राजा को यह अप्रत्याशित ध्वनि सुन कर जोर की हँसी आगई। नवयुवती न झेंपी, न शर्माई अपितु उसने इस सत्य को बेधड़क मुखरित कियाः

"पदन पोखरिया, पद्दै गाँव,

पद्दी बैठे गंग नहाँय।

कौन गाँव न पद्दा,

जहँ कन्त बिआहन जायँ।।"

पूरी कहानी याद नहीं है किन्तु दूल्हे मियाँ का विवाह इसी युवती से होने वाला था।

मूर्खदिवस की बधाई, कुछ देर से सही।

...लक्ष्मीनारायण गुप्त

...२ अप्रैल २००७

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