Thursday, March 22, 2007

मच्छर विषाद


(बी बी सी पर पढ़ा कि वैज्ञानिकों ने जेनेटिकली माडीफाइड (जी एम) मच्छर बनाया है जो मलेरिया नहीं फैला सकेगा। यह कविता मैंने मच्छर की तरफ से लिखी है।)

क्या मिल गया इन्सान तुझे मेरे दिल को दुखा के।

मच्छर को मलेरिया से यूँ जुदा करा के।।

पंडित बिना पोथी है ज्यूँ औ मुल्ला बिन मस्जिद।

मच्छर मलेरिया वगैर यूँ ही है निश्चित।।

अमृत की अस्मिता ही क्या अमरत्व के बिना।

मच्छर बिना मलेरिया जीता हुआ मुर्दा।।

मच्छर बिना मलेरिया तड़पते ही रहेंगे।

जीते हुए निर्जीव से बिलखते ही रहेंगे।।

मच्छर की अस्मिता मिटा के तुझको क्या मिला।

करना पड़ेगा तुझको कभी यम से मुकाबला।।

तूने बनाई डी डी टी हमें मारने के लिए।

हम मरे पर मरे हम मच्छरत्व के लिए।।

मच्छरत्व हमारा मिटाके तुझे कुछ न मिलेगा।

ऐसी भयावह मृत्यु तू फिर भी मरेगा।।

सोचेगा तू इस मौत से था मलेरिया ही भला।

मच्छर के जीने का मज़ा क्यूँ छीना था भला।।

मच्छर बिना मलेरिया है यूँ ही तेजहीन।

ई डी के मर्ज़ वाला ज्यूँ है वायाग्रा विहीन।।

(ई डी = एरेक्टाइल डिस्फ़न्क्शन)

...लक्ष्मीनारायण गुप्त

...२२ मार्च २००७

Saturday, March 10, 2007

मुर्गभक्षी बछड़ा


होनी होती तो कह देइत, या अनहोनी कही न जाय।

कोलकाता की खबर एक अब, बाँची अन्तरजाल पर भाय।।

इक किसान के मुर्गी मुर्गा, कोई जानवर रह्यो चबाय।

एक महीने के अन्दर माँ, अड़तालीस मुर्ग खपि जायँ।।

एक रात का पहरा लागा, बछवा चिकेनकूप तन जाय।

पकरि के मुर्गा को थूथुन ते, अंखा पंखा दियो गिराय।।

एक मिनट के भीतर भीतर, वहि मुर्गा का गयो चबाय।

या गति देखी जब किसान ने, मन माँ गयो सनाका खाय।।

जोतिसी ते तब कारन पूछ्यो, अत्रा पत्रा दियो खुलाय।

जोतिसी बोल्यो हे किसान जी, बछवा यहु साधारण नायँ।।

देवी मइया के बघवा ने, यहु अवतार लियो है आय।

पिछला जनम याद है यहिको ताते मुर्गा रह्यो चबाय।।

अगर निवारण करना चाहौ, दुर्गा चौकी देव बिठाय।

देवी मइया की सेवा माँ, बकिया मुर्ग देव कटवाय।।

एतना जतन करौ जो मालिक, तुरत भवानी होयँ सहाय।

देवी मइया की किरपा ते, बछवा साधारन हुइ जाय।।

...लक्ष्मीनारायण गुप्त

...१० मार्च २००७

Friday, March 02, 2007

होली


सजनी, आ अब खेलें होली

बहुत होगई आँखमिचौली।

धूपछाँव के रंग से गोरी

बिधना ने भी रची रंगोली।

एक बार तू मुझे बुला ले

एक रंग ही मुझे लगा दे।

एक बार अपनी चितवन से

मुझको शाहंशाह बना दे।

होली के मौसम में गोरी

इक फुहार ही इधर चला दे।

तन में रंग लगा दे गोरी

मन में रंग चढ़ा दे गोरी।

हम तुम अन्तरंग हो जायें

ऐसी धूम मचा दे गोरी।

सजनी, आ हम खेलें होली

बहुत हो गई आँखमिचौली।

...लक्ष्मीनारायण गुप्त

...२ मार्च २००७

(सभी पाठकों को होली की शुभ कामनायें)

NARAD:Hindi Blog Aggregator Hindi Blogs. Com - हिन्दी चिट्ठों की जीवनधारा
blogvani