(बी बी सी पर पढ़ा कि वैज्ञानिकों ने जेनेटिकली माडीफाइड (जी एम) मच्छर बनाया है जो मलेरिया नहीं फैला सकेगा। यह कविता मैंने मच्छर की तरफ से लिखी है।)
क्या मिल गया इन्सान तुझे मेरे दिल को दुखा के।
मच्छर को मलेरिया से यूँ जुदा करा के।।
पंडित बिना पोथी है ज्यूँ औ मुल्ला बिन मस्जिद।
मच्छर मलेरिया वगैर यूँ ही है निश्चित।।
अमृत की अस्मिता ही क्या अमरत्व के बिना।
मच्छर बिना मलेरिया जीता हुआ मुर्दा।।
मच्छर बिना मलेरिया तड़पते ही रहेंगे।
जीते हुए निर्जीव से बिलखते ही रहेंगे।।
मच्छर की अस्मिता मिटा के तुझको क्या मिला।
करना पड़ेगा तुझको कभी यम से मुकाबला।।
तूने बनाई डी डी टी हमें मारने के लिए।
हम मरे पर मरे हम मच्छरत्व के लिए।।
मच्छरत्व हमारा मिटाके तुझे कुछ न मिलेगा।
ऐसी भयावह मृत्यु तू फिर भी मरेगा।।
सोचेगा तू इस मौत से था मलेरिया ही भला।
मच्छर के जीने का मज़ा क्यूँ छीना था भला।।
मच्छर बिना मलेरिया है यूँ ही तेजहीन।
ई डी के मर्ज़ वाला ज्यूँ है वायाग्रा विहीन।।
(ई डी = एरेक्टाइल डिस्फ़न्क्शन)
...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...२२ मार्च २००७