Sunday, February 25, 2007

चिटठाकारी (२)


भाई समीर जी कहते हैं कि मैंने कड़ी तोड़ कर बड़ा अपराध किया है तो भाई माफ करना। कहते भी हैं:

छमिय चूक अनजानत केरी। चहिय मित्र उर दया घनेरी।।

तो प्रश्न तो वही हैं:

१। आपके लिये चिट्ठाकारी का क्या महत्व है?

२। चिट्ठाकारी ने आपके जीवन को कैसे प्रभावित किया है?

३। आप किन विषयों पर लिखना पसंद/नापसंद करते है?

४। आप किन चिट्ठाकारों से मिलना चाहते हैं?

५। आपकी बहुत अधिक मनपसंद दो पुस्तकें कौन हैं?

पाँच शिकारों के नाम हैं:

१। उन्मुक्त (unmukta-hindi.blogspot.com)

२। रवि रतलामी ( raviratlami.blogspot.com)

३। सुनील दीपक (kalpana.it/hindi/blog)

४। अतुल अरोड़ा (rojnamcha.blogspot.com)

५। अनूप भार्गव (anoopbhargava.blogspot.com)

माफ कीजियेगा कि इन कड़ियों को सजीव करने का तरीका मुझे नहीं आता है।

...लक्ष्मीनारायण गुप्त

...२५ फरवरी २००७

चिट्ठाकारी


उड़नतश्तरी वाले हैं जो समीरलाल

पूछे हैं उन्होंने कुछ अजीब सवाल

पहले तो समीर जी पुरस्कार की बधाई हो

ठेठ भारतीय परम्परा के अनुसार दावत कब देने वाले हो

मेरे लिये चिट्ठाकारी के क्या हैं माने

यह तो गुरू हम भी नहीं जानें

लेकिन करता हूँ कुछ प्रयत्न

आशा है आपको पसंद आएगा मेरा यत्न

पहले तो अपनी बात लिखी हुई देखने में अच्छी लगती है

सभी को छपास की ख्वाहिश होती है

दूसरों को पढ़ना भी अच्छा लगता है

प्रायः बड़ा ज्ञानवर्धक होता है

मिलते हैं कभी कभी बड़े अच्छे मित्र

चिट्ठाकारी जिनकी है चित्र-विचित्र

चिट्ठा लिखने से कभी कभी यह भान होता है

स्वयं को कुछ अधिक पहचान लेता हूँ

औरों को जानकर खुशी होती है

कभी कभी अपनी कमी ज़ाहिर होती है

पसंद है लिखना मुझे व्यंग्यात्मक कविता

होजाता है व्यंग्य कभी कभी तीखा

भाते है लिखने मुझे पौराणिक आख्यान

भरा है जिनमें अथाह मनोवैज्ञानिक ज्ञान

कभी करता हूँ मैं प्रेम की बातें

हुई नहीं हैं जिनसे कभी मुलाकातें

कभी कभी मैं भक्ति की बात करता हूँ

कभी परमात्मा के होने पर भी संदेह करता हूँ

धर्म की रूढ़ियों पर मैं प्रहार करना चाहता हूँ

कभी कभी प्रतिक्रिया के भय से रुक जाता हूँ

संस्मरण लिखना भी अच्छा लगता है

अपनी बात बताने को दिल चाहता है

चिट्ठाकारों से जिनसे मैं मिलना चाहता हूँ

लम्बी है सूची कुछ नाम बताता हूँ

फुरसतिया, लाल्टू और सुनील दीपक से मिलने की लालसा रखता हूँ

पुस्तकें तो मैं पढ़ता ही रहता हूँ

रामायण महाभारत बार बार पढ़ता हूँ

अच्छा लगता है मुझे ओशो साहित्य

श्रीलाल शुक्ल का भी हूँ प्रशंसक

पढ़िए अवश्य ही राग दरबारी

तस्लीमा नसरीन की लज्जा भी न्यारी

...लक्ष्मीनारायण गुप्त

...२५ फरवरी २००७

Tuesday, February 13, 2007

ढोल गँवार इत्यादि


रामचरितमानस की रचना में गोस्वामी तुलसीदास जी ने दो मुख्य स्रोतों का सहारा लिया हैः वाल्मीकि रामायण और अध्यात्म रामायण। अध्यात्म रामायण ब्रह्माण्ड पुराण का एक हिस्सा है। इसकी रचना चौदहवीं सदी की मानी जाती है।

"ढोल गँवार शूद्र पशु नारी। ये सब ताड़न के अधिकारी।।"

का मूल स्रोत पता लगाने के लिये मैंने अध्यात्म रामायण में राम का समुद्र से रास्ता माँगने का प्रसंग पढ़ा। मेरे पास स्वामी तपस्यानंद की संस्कृत मूल के साथ अंग्रेज़ी टीका है। कृपया मुलाहज़ा फ़रमाइए। समुद्र राम से निवेदन करता हैः

"त्वामहं मायया छन्नं लोलपा मानुषाकृतिम्। जडबुद्धिर्जडो मूर्खः कथं जानाति निर्गुणम्।।

दण्ड एव हि मूर्खाणां सन्मार्गप्रापकः प्रभो। भूतानाममश्रेष्ठ पशूनां लगुडो यथा।।"

--अध्यात्म रामायण ३-७५,७६

आपने अपनी माया से अपने को आवृत्त करके मनुष्य रूप धारण किया है। मैं मूर्ख जड़बुद्धि आप निर्गुण को कैसे पहचान सकता था। मूर्ख व्यक्ति दण्ड के भय से ही सन्मार्ग पर चलते हैं जैसे पशु को सही रास्ते पर चलाने के लिये डंडे का सहारा लेना पड़ता है।

तो गँवार और पशु यहाँ पर ताड़ना के अधिकारी हैं। गोस्वामी जी ने इस फे़हरिस्त में ढोल, शूद्र और नारी जोड़ दिये हैं, यह प्रतीत होता है।

नारी की ताड़ना का बखेड़ा बहुत लोगों ने उठाया है किंतु मेरी जानकारी में शूद्रों की ताड़ना का विरोध किसी ने नहीं किया है। इसका कारण यह हो सकता है कि शूद्र नाम की कोई एक जाति नहीं है। यह एक जातियों का समूह है जिसकी सदस्यता भी विवादास्पद है। तुलसी परम्परागत वर्णाश्रम धर्म के समर्थक हैं और वह उत्तरकाण्ड में कलियुग के समाज का वर्णन करते हुए कहते हैं:

"जे वर्णाधम तेलि कुम्हारा। श्वपच किरात कोल कलवारा।।

नारि मरी गृह सम्पति नासी। मूड़ मुड़ाय भये सन्यासी।।

ते विप्रन संग आपु पुजावहिं। उभय लोक निज हाथ नसावहिं।।"

ये अधम जातियों के लोग तेली, कुम्हार, चाण्डाल, किरात, कोल, कलवार (शराब बनाने और बेचने वाली जाति) पत्नी के मरने पर और घर की सम्पत्ति नष्ट हो जाने पर सर मुड़ाकर संन्यासी बन जाते हैं और अपनी पूजा ब्राह्मणों से करवाते हैं और इस प्रकार से अपने दोनों लोकों की बरबादी करते हैं।

यह ध्यान देने की बात है कि कबीर, नानक और दादू जैसे संत तुलसी के पूर्वकालीन हैं और जाति के बन्धनों के विरोधी हैं। मीरा और रैदास तुलसी के समकालीन हैं। यह सर्वविदित है कि रैदास चमार थे और मीरा (जो क्षत्रिय कुल की रानी थीं) ने रैदास से दीक्षा ली थी। इस दीक्षा के बारे में तुलसी का मत इन पंक्तियों से स्पष्ट है।

यह भी ध्यान देने की बात है कि वाल्मीकि की रामायण में माया सीता का कोई जिक्र नहीं है किंतु अध्यात्म रामायण में राम असली सीता को अग्नि में रखते हैं और रावण माया सीता का हरण करता है। असली सीता को प्रकट करने के लिये सीता की अग्निपरीक्षा आवश्यक है। इस प्रकार से राम के चरित्र का यह कलंक दूर किया जाता है।

मैं यहाँ पर बताना चाहता हूँ कि मैं तुलसी का विरोधी नहीं हूँ। मैंने रामचरितमानस बहुत बार पढ़ी है और बहुत सारी चौपाइयाँ मुझे कंठस्थ हैं किंतु उनकी कुछ बातें खटकती हैं जिनके बारे में या तो लोग बात नहीं करना चाहते हैं या लीपा पोती करके आँखों में धूल झोंकना चाहते हैं। मैं आँख खोल कर चलने का हिमायती हूँ और मानता हूँ कि परमात्मा ने हमें बुद्धि इसी लिये दी है कि हम इसका उपयोग करें और किसी का भी अन्धानुसरण न करें।

...लक्ष्मीनारायण गुप्त

...१३ फरवरी २००७

Sunday, February 11, 2007

अजनबी


दिन के उजाले में जो दिख नहीं पाता,

उसे रात के तुम अँधेरे में देखो।

दिखता नहीं है खुली आँख से जो,

उसे आँख को बन्द करके ही देखो।

जागते हुए जो दिखता नहीं है,

उसे सोते सोते सपनों में देखो।

मजलिसों में कभी जो दिखाई न देता,

उसे जाके तुम बीराने में देखो।

जिसे मुद्दतों से दूरी से देखा,

आज उसको अपने आग़ोश में देखो।

सदियों से जिसकी निशानी न देखी,

उसे आज अपनी चौखट पे देखो।

जिसे तुमने खुद से सदा दूर समझा,

उसे अपने प्रिय की निगाहों में देखो।

सदा रोते रोते जिसे तुमने ढ़ूँढ़ा,

वही हँसते हँसते आया है देखो।

अजनबी जिसको हमेशा था माना,

परिचित पुराना वह निकला है देखो।

...लक्ष्मीनारायण गुप्त

...११ फरवरी २००७

Friday, February 02, 2007

सास-जमाई आख्यान

पता चला है कि मध्यप्रदेश के किसी गाँव में कोई व्यक्ति घर जमाई बन कर आया। किसी प्रकार सासू जी और जमाई जी एक दूसरे पर फिदा हो गए और सहपलायन कर गए। मैं सोचता हूँ कि कोई लोकोक्ति होनी चाहिए जो यह कहे कि ऐसे कार्य में सफलता नहीं मिलेगी। उदाहरण के लियेः
"बिटिया को छोड़ अम्मा को धावे, अम्मा मिलै न बिटिया पावै।"
बहरहाल दो कवितायें प्रस्तुत कर रहा हूँ, एक सासू जी की तरफ से और एक जमाई जी की तरफ से।

सासू जी

मोहें हो गई जमाई जी से प्रीत
जमाना कुछ भी कहे
मोहें जमाई की छवि भाई
दिल अपना और प्रीत पराई
तब मैं भी क्या करती भाई
मोहें.....

सभी मान मर्यादा तोड़ी
और जमाई जी की हो ली
जो कुछ कहना चाहो कह लो
बोलो मुझसे या न बोलो
मोहें...

दिल तो मेरा है मतवाला
जिसमें प्यार का बहता नाला
बहा जमाई उसमें यारा
वह भी क्या करता बेचारा
मोहें...

जमाई जी

सासू जी मोहें प्यारी लगें
जमाना कुछ भी कहे
उनकी बिटिया इतनी सुन्दर
वो तो हैं उससे भी सुन्दर
सासू जी...

जब से सासू जी को देखा
ओठों पर वह स्मित रेखा
काटी समाज की लक्ष्मणरेखा
सासू जी...

बिटिया का था प्यार वो कच्चा
सासू जी का प्यार है पक्का
रोटी से पूरी बेहतर लगे
सासू जी...

सासू जी से नेह लगाके
उनकी बिटिया को ठुकराके
हम तो प्रेमपुजारी होके
भाग गए हम उनको लेके
सासू जी...

...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...२ फरवरी २००७

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