पिछली प्रविष्टि में "ढोल, गँवार.." की चर्चा की गई थी और मैंने यह मत व्यक्त किया तहा कि यह तुलसी का नारी विरोधी दृष्टिकोण व्यक्त करता है। लोगों को लगा कि मैंने यह लेख बहुत शीघ्र समाप्त कर दिया। कुछ और कहने की आवश्कता है। पहले मैं पिछले लेख के तर्क को संक्षिप्त में दुहराता हूँ। उपर्युक्त चौपाई समुद्र के द्वारा कही गई है। इस प्रसंग में वाल्मीकि रामायण में समुद्र वही सारी बातें कहता है जो गोस्वामी जी ने उससे कहलवाई हैं किन्तु इस चौपाई के कथन को छोड़ कर। स्पष्ट है कि यह गोस्वामी जी की स्वयं की धारणा है।
अब मैं श्रीरामचरितमानस से कुछ उद्धरण दे रहा हूँ। विद्वान पाठक स्वयं निर्णय करें कि इनसे तुलसी नारी विरोधी लगते हैं या नहीं।
१। बालकाण्ड में सती रामचन्द्र जी की परीक्षा लेने सीता का वेष लेकर जाती हैं। सती राम से कपट करती हैं जिसके वारे में गोस्वामी जी कहते हैः
"सती कीन्ह चह तहउँ दुराऊ। देखहु नारिसुभाउ प्रभाऊ।।"
तो नारी का सहज स्वभाव कपट का है। इसी प्रसंग में जब सती लौट कर शिव जी के पास आती हैं तो वे पूछते हैं कि कैसे परीक्षा ली। सती कहती है कि उन्होंने कोई परीक्षा नहीं ली। शिव जी ध्यान लगा कर जान लेते हैं कि सती ने क्या किया था। शिव जी अपने मन में प्रण करते हैं कि अब सती के इस शरीर से उनका कोई शारीरिक सम्पर्क नहीं होगा। आकाशवाणी के एनाउन्सर को इस प्रण का पता चल जाता है किन्तु सती तो महज़ एक स्त्री हैं, इसलिये उन्हें कुछ पता नहीं चलता। शिव जी पूछने से उत्तर नहीं देते तो गोस्वामी जी उनसे यह सोचवाते हैं:
"सती हृदय अनुमान किय सब जानेउ सर्वग्य।
कीन्ह कपटु मैं शम्भु सन नारि सहज जड़ अग्य।।"
वे स्वयं भी मानती हैं कि नारियाँ तो स्वाभाविक रूप से जड़ और अज्ञानी होती हैं।
२। अयोध्याकाण्ड में जब मन्थरा कैकेई को फुसला रही है, कैकेई पहले यूँ सोचती हैः
" काने, खोरे, कूबरे कुटिल कुचाली जानि।
तिय विसेषि पुनि चेरि कहि भरतमातु मुस्कानि।।"
(रामचन्द्रप्रसाद की टीकाः जो काने, लँगड़े और कुबड़े हैं, उन्हें कुटिल और कुचाली जानना चाहिए। फिर स्त्रियाँ उनसे भी अधिक कुटिल होती हैं और दासी तो सबसे अधिक। इतना कहकर भरत जी की माता मुसकरा दीं।)
३। रामचन्द्र जी के वन चले जाने पर पुरी के लोग कैकेई की ही नहीं, सारी नारियों की निन्दा करते हुए कहते हैं:
" सत्य कहहिं कवि नारि सुभाऊ। सब बिधि अगहु अगाध दुराऊ।।
निज प्रतिबिम्बु बरुकु गहि जाई। जानि न जाइ नारि गति भाई।।"
(कवियों का कहना ठीक ही है कि स्त्री का स्वभाव सब तरह से अग्राह्य, अथाह और भेदभरा है। अपने प्रतिबिम्ब को कोई भले ही पकड़ ले किन्तु स्त्रियों की गति नहीम जानी जाती।)
४। अरण्यकाण्ड में अनसूया सीता को नारी धर्म की शिक्षा देते हुए कहती हैं:
" सहज अपावन नारि पति सेवत शुभ गति लहइ।"
(स्त्री तो सहज ही अपावन होती है...)
५। अरण्यकाणड में शूर्पणखा के प्रणयनिवेदन की भूमिका बाँधते हुए कागभुसुण्डि जी गरुड़ से कहते हैः
"भ्राता, पिता, पुत्र उरगारी। पुरुष मनोहर निरखत नारी।।
होइ विकल सक मनहिं न रोकी। जिमि रविमनि द्रव रबिहि बिलोकी।।"
(हे गरुड़, स्त्री सुन्दर पुरुष को देखते ही, चाहे वह भाई, पिता, पुत्र ही क्यों न हो, विकल हो जाती हैं और अपने मन को रोक नहीं सकती हैं जैसे सूर्य को देखकर सूर्यमणि पिघल जाती है।)
लगता है वलात्कार के सारे केस औरतें ही करती होंगी।
६। किष्किंधाकाण्ड में सीतावियोग में प्रकृतिवर्णन करते हुए रामजी कहते हैं:
"महावृष्टि चलिफूटि किंयारी। जिमि सुतंत्र भए बिगरहिं नारी।।"
(महावृष्टि से क्यारियाँ फूट गई हैं और उनसे ऐसे पानी बह रहा है जैसे स्वतंत्रता मिलने से नारियाँ बिगड़ जाती हैं।)
७। लक्ष्मणशक्ति के मौके पर राम जी विलाप करते हुए कहते हैं:
"जस अपजस सहतेउँ जग माहीं। नारि हानि विसेष दुख नाहीं।"
(मैं संसार मे यश अपयश ले लेता। स्त्री की क्षति कोई खास बात नहीं है।)
८। लंकाकाण्ड में रावण मन्दोदरी की सलाह ठुकराते हुए कहता हैः
"नारि सुभाव सत्य सब कहहीं। अवगुन आठ सदा उर रहहीं।
साहस, अनृत, चपलता माया। भय अविवेक, असौच अदाया।।"
(नारी के स्वभाव के बारे में कवि सत्य ही कहते हैं कि सदा ही उनके हृदय में आठ अवगुण रहते हैं: साहस, असत्य, चपलता, माया (छल कपट), भय, अविवेक, अपवित्रता, और निर्ममता।"
यह सूची पूरी नहीं है अपितु केवल वे प्रसंग दिए हैं जिनके बारे में मैं पहले से कुछ जानता था।
...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...२७ जनवरी २००७
At present, this blog is set up to publish my Hindi poems and accept comments from the readers. Some contributions from others are also published from time to time. Laxmi N. Gupta
Saturday, January 27, 2007
Saturday, January 20, 2007
राम की सेना का सागरावतरण
राम की वानर भालु सेना का सागर पार उतरने की घटना के वर्णन में वाल्मीकि रामायण और रामचरितमानस में कुछ महत्वपूर्ण अन्तर हैं। इस प्रविष्टि में इन अन्तरों पर कुछ प्रकाश डालने का प्रयास करूँगा। मोटे तौर पर दोनों में इक ही घटनाक्रम है। राम समुद्र से रास्ता माँगते हैं, कई दिन तक पूजा पाठ करते हैं किन्तु जब समुद्र कोई रास्ता नहीं बताता तब राम कुपित होकर अपने वाणों से समुद्र को सोखने को प्रस्तुत होते हैं। समुद्र मानव रूप में प्रकट होकर बताता है कि नल नामक वानर के डाले हुए पत्थर पानी में नहीं डूबेंगे और इस प्रकार से समुद्र पर पुल बनता है।
रामचरितमानस में लक्ष्मण को राम का समुद्र की प्रार्थना करना नहीं अच्छा लगता और जब राम समुद्र को सोखना चाहते हैं, लक्ष्मण इस कार्य का अनुमोदन करते हैं:
"विनय न मानत जलधि जड़, गए तीनि दिन बीति।
बोले राम सकोप तब भय बिन होइ न प्रीति।।
......................................................
अस कहि रघुपति चाप चढ़ावा। यह मत लछिमन के मन भावा।।"
वाल्मीकि रामायण में जब राम कुपित होकर सागर को सोखना चाहते हैं, लक्ष्मण उन्हें इस उग्र कर्म से विरत करने का प्रयास करते हैं:
"ततस्तु तं राघमुग्रवेगं, प्रकर्षमाणं धनुरप्रमेयम्।
सौमित्रिरुत्पत्य विनिःश्वसन्तं, मामेति चोक्त्वा धनुराललम्बे।।"
(युद्धकाणड २१-३३)
तदनन्तर श्रीरघुनाथ जी रोषसे लंबी साँस लेते हुए अपने भयंकर वेगशाली अनुपम धनुष को पुनः खींचने लगे। यह देख सुमित्राकुमार लक्ष्मण उछलकर उनके पास जा पहुँचे और 'बस, बस, अब नहीं, अब नहीं' ऐसा कहते हुए उन्होंने उनका धनुष पकड़ लिया।
(गीताप्रेस गोरखपुर का अनुवाद)
समुद्र जब प्रकट होकर विनय करता है, इसका वर्णन रामचरित मानस में ऐसा हैः
" गगन समीर अनल जल धरनी। इन कइ नाथ सहज जड़ करनी।।
तब प्रेरित माया उपजाए। सृष्टि हेतु सब ग्रन्थनि गाए।।
प्रभु आयस जेहि कहँ जस अहई। सो तेहि भाँति रहे सुख लहई।।
प्रभु भल कीन्ह मोंहि सिख दीन्हीं। मरजादा पुनि तुम्हरी कीन्ही।
ढोल गँवार सूद्र पशु नारी। सकल ताड़ना के अधिकारी।।"
इस आखिरी चौपाई पर बहुत कुछ वादविवाद हुए हैं। अब देखिए वाल्मीकि जी कैसे इस घटना का वर्णन करते हैं:
"पृथिवी वायुराकाशमापो ज्योतिश्च राघव।
स्वभावे सौम्य तिष्ठन्ति शास्वतं मार्गमाश्रिताः।।
तत्स्वभावो ममाप्येष यदगाधोsहमप्लवः।
विकारस्तु भवेद् गाध एतत् ते प्रवदाम्यहम्।।"
(युद्धकाण्ड २२-(२६, २७))
सौम्य रघुनन्दन, पृथ्वी, वायु, आकाश, जल और तेज- ये सर्वदा अपने स्वभाव में स्थित रहते हैं, अपने सनातन मार्ग को कभि नहीं छोड़ते- सदा उसी के आश्रित रहते हैं। मेरा भी यह स्वभाव ही है जो मैं अगाध और अथाह हूँ- कोई मेरे पार नहीं जा सकता। यदि मेरी थाह मिल जाय तो यह विकार- मेरे स्वभाव का व्यतिक्रम ही होगा। इसलिए मैं आपसे पार होने का यह उपाय बताता हूँ।
आमतौर से वाल्मीकि रामायण में विस्तार है और रामचरितमानस में सूक्ष्मता किन्तु इस प्रसंग में इसका विपरीत सत्य है। दोनों ही प्रकृतिक शक्तियों के स्वभाव की बात करते हैं किन्तु तुलसीदास जी इसका और स्पष्टीकरण करते हुए "ढोल, गँवार.." की बात छेड़ते हैं। ध्यान देने की बात है कि समुद्र कहता है कि " ढोल, गँवार, शूद्र, पशु और नारी सभी ताड़ना के अधिकारी हैं, यह मर्यादा आपकी (भगवान राम) की की हुई है।" रामचन्द्रजी कुछ न कहकर इसका मूक समर्थन करते हैँ। इसलिए मेरे विचार में तुलसीदास जी का मत स्पष्ट है। कभी और तुलसीदास जी की अन्य नारीविरोधी मान्यताओं के बारे में लिखेंगे।
...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...२० जनवरी २००७
रामचरितमानस में लक्ष्मण को राम का समुद्र की प्रार्थना करना नहीं अच्छा लगता और जब राम समुद्र को सोखना चाहते हैं, लक्ष्मण इस कार्य का अनुमोदन करते हैं:
"विनय न मानत जलधि जड़, गए तीनि दिन बीति।
बोले राम सकोप तब भय बिन होइ न प्रीति।।
......................................................
अस कहि रघुपति चाप चढ़ावा। यह मत लछिमन के मन भावा।।"
वाल्मीकि रामायण में जब राम कुपित होकर सागर को सोखना चाहते हैं, लक्ष्मण उन्हें इस उग्र कर्म से विरत करने का प्रयास करते हैं:
"ततस्तु तं राघमुग्रवेगं, प्रकर्षमाणं धनुरप्रमेयम्।
सौमित्रिरुत्पत्य विनिःश्वसन्तं, मामेति चोक्त्वा धनुराललम्बे।।"
(युद्धकाणड २१-३३)
तदनन्तर श्रीरघुनाथ जी रोषसे लंबी साँस लेते हुए अपने भयंकर वेगशाली अनुपम धनुष को पुनः खींचने लगे। यह देख सुमित्राकुमार लक्ष्मण उछलकर उनके पास जा पहुँचे और 'बस, बस, अब नहीं, अब नहीं' ऐसा कहते हुए उन्होंने उनका धनुष पकड़ लिया।
(गीताप्रेस गोरखपुर का अनुवाद)
समुद्र जब प्रकट होकर विनय करता है, इसका वर्णन रामचरित मानस में ऐसा हैः
" गगन समीर अनल जल धरनी। इन कइ नाथ सहज जड़ करनी।।
तब प्रेरित माया उपजाए। सृष्टि हेतु सब ग्रन्थनि गाए।।
प्रभु आयस जेहि कहँ जस अहई। सो तेहि भाँति रहे सुख लहई।।
प्रभु भल कीन्ह मोंहि सिख दीन्हीं। मरजादा पुनि तुम्हरी कीन्ही।
ढोल गँवार सूद्र पशु नारी। सकल ताड़ना के अधिकारी।।"
इस आखिरी चौपाई पर बहुत कुछ वादविवाद हुए हैं। अब देखिए वाल्मीकि जी कैसे इस घटना का वर्णन करते हैं:
"पृथिवी वायुराकाशमापो ज्योतिश्च राघव।
स्वभावे सौम्य तिष्ठन्ति शास्वतं मार्गमाश्रिताः।।
तत्स्वभावो ममाप्येष यदगाधोsहमप्लवः।
विकारस्तु भवेद् गाध एतत् ते प्रवदाम्यहम्।।"
(युद्धकाण्ड २२-(२६, २७))
सौम्य रघुनन्दन, पृथ्वी, वायु, आकाश, जल और तेज- ये सर्वदा अपने स्वभाव में स्थित रहते हैं, अपने सनातन मार्ग को कभि नहीं छोड़ते- सदा उसी के आश्रित रहते हैं। मेरा भी यह स्वभाव ही है जो मैं अगाध और अथाह हूँ- कोई मेरे पार नहीं जा सकता। यदि मेरी थाह मिल जाय तो यह विकार- मेरे स्वभाव का व्यतिक्रम ही होगा। इसलिए मैं आपसे पार होने का यह उपाय बताता हूँ।
आमतौर से वाल्मीकि रामायण में विस्तार है और रामचरितमानस में सूक्ष्मता किन्तु इस प्रसंग में इसका विपरीत सत्य है। दोनों ही प्रकृतिक शक्तियों के स्वभाव की बात करते हैं किन्तु तुलसीदास जी इसका और स्पष्टीकरण करते हुए "ढोल, गँवार.." की बात छेड़ते हैं। ध्यान देने की बात है कि समुद्र कहता है कि " ढोल, गँवार, शूद्र, पशु और नारी सभी ताड़ना के अधिकारी हैं, यह मर्यादा आपकी (भगवान राम) की की हुई है।" रामचन्द्रजी कुछ न कहकर इसका मूक समर्थन करते हैँ। इसलिए मेरे विचार में तुलसीदास जी का मत स्पष्ट है। कभी और तुलसीदास जी की अन्य नारीविरोधी मान्यताओं के बारे में लिखेंगे।
...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...२० जनवरी २००७
Sunday, January 07, 2007
हवाई यात्रा
पुत्री एक सुजाता रही, राज्य हवाई कहँ वह गई।
हम सोचा तब हमहूँ जाई, पुत्री से मिलि करि कै आई।
थोड़ा भ्रमणौं भी करि आवौं, पत्नी संग यात्रा सुख पावौं।
इतना जब हम निश्चय कीन्हा, गमन डिट्र्वायट कहँ करि दीन्हा।
डिट्र्वायट से फीनिक्स जावहुँ, तहँ से मावी द्वीप सिधावहुँ।
अइसी हम योजना बनाई, अगर विधाता होंहि सहाई।
बैठे हम विमान पर जाई, पर विमान तौ कतहुँ न जाई।
पाइलट तब यहु बचनु सुनावा, गड़बड़ कछु उपकरण बतावा।
दुइ घंटा विलम्बु होइ जाई, तब हम गए सनाका खाई।
अगर और देरी हुइ जाई, मावी का विमानु उड़ि जाई।
परिचारिका सांत्वना दिलाई, होइहइ तुम कहँ राम सहाई।
हमहूँ तब प्रसन्न होइ गएऊ, तीस मिनट हैं अबहुँ बचेऊ।
कूकुर इक रनवे पै धावा, पाइलट यह तब हमहिं बतावा।
पन्द्रह मिनट विमानु घुमावा, तबहिं कहूँ वह उतरन पावा।
अगिल विमानु पकरि ना पाई, तब दीन्हीं हम राम दोहाई।
तब एजेन्ट जतनु बहु कीन्हा, सैनफ्रन्सिस्को राउटिंग कीन्हा।
एक रात फीनिक्स बिताई, पाँच डालर का पीज़ा खाई।
दुसरे दिन सैनफ्रैन हम जाई, मावी कै उड़ान नहिं पाई।
बोले ओपेन टिकट तुम्हारा, यासे नहिं होवै निस्तारा।
इक टर्मिनल से दुसरेहि जाई, गाँठिन महँ पीरा भइ भाई।
दुसरि रात सैनफ्रन्सिस्को बीती, तुमहिं सुनावहुँ आपनि बीती।
झगड़ा झँझट इतना कीन्हा, प्रिय मुख भए रोष के चीन्हा।
भारी झंझट के उपरान्ता, हमहिं टिकट तिन दीन्हेउ ताता।
होनोलूलू तक पहुँचावा, वहँ मावी कै उड़ान पावा।
मावी पहुँचि बहुत सुख पावा, बिटिया का हम हृदय लगावा।
दुइ दिन तक हम मावी रहे, सुख उपजत निशि-दिन सुख नए।
ज्वालामुखी पहाड़ दिखावा, हाना सड़क चले सुख पावा।
तिसरे दिन कै कथा बताई, सबहिं कवाई चले पराई।
वाईमेवा कैनयन देखा, कहि न जाइ अति रुचिर विशेषा।
हिन्दू मन्दिर वहँ इक सुन्दर, गोरे हिन्दुन विरचित मनुहर।
देखत मन प्रसन्न हुइ गयो, प्रभु विरचत निशि-दिन सुख नयो।
बीचैं बहु रमणीक बनाई, सुन्दर नारी परैं दिखाई।
तन कै उनके सुन्दर रचना, प्रभु किरपा से हमहुँ देखना।
कवई से मावी तक आए, झगड़ा झंझट नहिं कछु भए।
मावी से फिनिक्स तक जावैं, आइटर्नैरी यहै बतावै।
एअरलाइन वचन सुनाई, तुम्हरो यहँ आरक्षण नाहीं।
पत्नी ने तब करी लड़ाई, हम तो आजहिं फीनिक्स जाई।
पत्नी जबहिं कुपित होइ जावै, जमराजहुँ का मज़ा चखावै।
दुइ घंटा यहि दुविधा रही, पत्नी बहुत निपुण मम सही।
पत्नी के प्रसाद से भाई, हमहूं घर तक लौटि के आई।
...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...७ जनवरी २००७
हम सोचा तब हमहूँ जाई, पुत्री से मिलि करि कै आई।
थोड़ा भ्रमणौं भी करि आवौं, पत्नी संग यात्रा सुख पावौं।
इतना जब हम निश्चय कीन्हा, गमन डिट्र्वायट कहँ करि दीन्हा।
डिट्र्वायट से फीनिक्स जावहुँ, तहँ से मावी द्वीप सिधावहुँ।
अइसी हम योजना बनाई, अगर विधाता होंहि सहाई।
बैठे हम विमान पर जाई, पर विमान तौ कतहुँ न जाई।
पाइलट तब यहु बचनु सुनावा, गड़बड़ कछु उपकरण बतावा।
दुइ घंटा विलम्बु होइ जाई, तब हम गए सनाका खाई।
अगर और देरी हुइ जाई, मावी का विमानु उड़ि जाई।
परिचारिका सांत्वना दिलाई, होइहइ तुम कहँ राम सहाई।
हमहूँ तब प्रसन्न होइ गएऊ, तीस मिनट हैं अबहुँ बचेऊ।
कूकुर इक रनवे पै धावा, पाइलट यह तब हमहिं बतावा।
पन्द्रह मिनट विमानु घुमावा, तबहिं कहूँ वह उतरन पावा।
अगिल विमानु पकरि ना पाई, तब दीन्हीं हम राम दोहाई।
तब एजेन्ट जतनु बहु कीन्हा, सैनफ्रन्सिस्को राउटिंग कीन्हा।
एक रात फीनिक्स बिताई, पाँच डालर का पीज़ा खाई।
दुसरे दिन सैनफ्रैन हम जाई, मावी कै उड़ान नहिं पाई।
बोले ओपेन टिकट तुम्हारा, यासे नहिं होवै निस्तारा।
इक टर्मिनल से दुसरेहि जाई, गाँठिन महँ पीरा भइ भाई।
दुसरि रात सैनफ्रन्सिस्को बीती, तुमहिं सुनावहुँ आपनि बीती।
झगड़ा झँझट इतना कीन्हा, प्रिय मुख भए रोष के चीन्हा।
भारी झंझट के उपरान्ता, हमहिं टिकट तिन दीन्हेउ ताता।
होनोलूलू तक पहुँचावा, वहँ मावी कै उड़ान पावा।
मावी पहुँचि बहुत सुख पावा, बिटिया का हम हृदय लगावा।
दुइ दिन तक हम मावी रहे, सुख उपजत निशि-दिन सुख नए।
ज्वालामुखी पहाड़ दिखावा, हाना सड़क चले सुख पावा।
तिसरे दिन कै कथा बताई, सबहिं कवाई चले पराई।
वाईमेवा कैनयन देखा, कहि न जाइ अति रुचिर विशेषा।
हिन्दू मन्दिर वहँ इक सुन्दर, गोरे हिन्दुन विरचित मनुहर।
देखत मन प्रसन्न हुइ गयो, प्रभु विरचत निशि-दिन सुख नयो।
बीचैं बहु रमणीक बनाई, सुन्दर नारी परैं दिखाई।
तन कै उनके सुन्दर रचना, प्रभु किरपा से हमहुँ देखना।
कवई से मावी तक आए, झगड़ा झंझट नहिं कछु भए।
मावी से फिनिक्स तक जावैं, आइटर्नैरी यहै बतावै।
एअरलाइन वचन सुनाई, तुम्हरो यहँ आरक्षण नाहीं।
पत्नी ने तब करी लड़ाई, हम तो आजहिं फीनिक्स जाई।
पत्नी जबहिं कुपित होइ जावै, जमराजहुँ का मज़ा चखावै।
दुइ घंटा यहि दुविधा रही, पत्नी बहुत निपुण मम सही।
पत्नी के प्रसाद से भाई, हमहूं घर तक लौटि के आई।
...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...७ जनवरी २००७
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