चलते चलो
दिल के दरिये में ग़म को डुबोते चलो
आँख भर आये आँसू बहाते चलो
सुर सज जाये तो गीत गाते चलो
सुर ना भी सजे गुनगुनाते चलो
पद थकें तो थकें किन्तु चलते चलो
अपने जीवन की गंगा बहाते चलो
कुछ भी चाहो नहीं, कुछ भी माँगो नहीं
जो मिले उस पर जीवन निभाते चलो
अगर हो सके मुस्कुराते चलो
किन्तु चलते चलो, किन्तु चलते चलो
हँसते हँसते चलो, रोते रोते चलो
किन्तु चलते चलो, किन्तु चलते चलो
जब तक जीवन है कर्तव्य करते चलो
मौत आयेगी तब तो ठहरना ही है
तब तक चलते चलो, तब तक चलते चलो
…लक्ष्मीनारायण गुप्त
…30 नवम्बर 2007




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