Friday, November 30, 2007

चलते चलो


दिल के दरिये में ग़म को डुबोते चलो

आँख भर आये आँसू बहाते चलो

सुर सज जाये तो गीत गाते चलो

सुर ना भी सजे गुनगुनाते चलो

पद थकें तो थकें किन्तु चलते चलो

अपने जीवन की गंगा बहाते चलो

कुछ भी चाहो नहीं, कुछ भी माँगो नहीं

जो मिले उस पर जीवन निभाते चलो

अगर हो सके मुस्कुराते चलो

किन्तु चलते चलो, किन्तु चलते चलो

हँसते हँसते चलो, रोते रोते चलो

किन्तु चलते चलो, किन्तु चलते चलो

जब तक जीवन है कर्तव्य करते चलो

मौत आयेगी तब तो ठहरना ही है

तब तक चलते चलो, तब तक चलते चलो

लक्ष्मीनारायण गुप्त

…30 नवम्बर 2007

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