चूहा पुराण
जिन चूहों को तुम सदा समझ रहे थे तुच्छ।
उन चूहों की बुद्धि को पंडित समझें उच्च।।
कुछ वैज्ञानिकों ने किया एक प्रयोग प्रसिद्ध।
चूहों की श्रेष्ठता को जिसने कर दिया सिद्ध।।
आटा गेहूँ का लिया चोकर दिया निकाल।
तत्वहीन उस चूर्ण से बिस्कुट दिए बनाय।।
सूँघा इन बिस्कुटों को चूहों ने दिया त्याग।
बेवकूफ इन्सान थे खागए सह अनुराग।।
पौष्टिक आटे से किया बिस्कुट का निर्माण।
चूहों और मनुष्य को अवसर किया प्रदान।।
चूहे खाए चाव से तश्तरी कर दी साफ।
मूर्ख मनुष्यों ने मगर नहीं लगाया हाथ।।
बुद्धिमान गण ईश को तथ्य रहा यह ज्ञात।
चूहा खाता है प्रथम फिर वह खाते आप।।
तुम इन्सानों में अगर होती यदि कुछ बुद्धि।
चूहों का सम्मान कर तुम पा जाते सिद्धि।।
करते रहते हो सदा चूहों का अपमान।
दिखलाता है मूर्ख नर तेरा यह अज्ञान।।
चूहों का सम्मान कर उनको भोग लगाहु।
जाको चूहा न चखे वा तुमहूँ ना खाहु।।
...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...४ नवम्बर २००७




4 Comments:
हा हा!! सही है चुहा पुराण.
समीर जी,
धन्यवाद ।
वाह! वाह! चूहों के गुणों को पहचानने वाले आप पहले इंसान हैं। अच्छा लगा चूहा पुराण :)
प्रतीक जी,
बहुत धन्यवाद। अगली बार कोई चूहा दिखे तो बदली नज़रों से देखियेगा।
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