Wednesday, September 05, 2007

साजन बिन

साजन बिन मोरा जिया घबरात
बिजुरी चमकै आधी रात
घनन घनन बदरा घघरात
सुनत सुनत मोरा जिया दहलात
सनन सनन सन पवन सुनात
हालैं हमरे कोमल गात
कोऊ अकेले मां पूछै न बात
बैरी बने बादर बिजुरी वात
बालम का परदेसवा सुहात
का करूँ सजनी बनै कइसे बात
साजन बिन मोरा जिया घबरात

…लक्ष्मीनारायण गुप्त
…5 सितम्बर 2007

3 Comments:

At 4:01 AM, Blogger परमजीत बाली said...

अच्छा ्गीत है।बधाई\

 
At 10:57 AM, Blogger Udan Tashtari said...

अब जाकर तो कभी कभी ऐसे मौके आते हैं इसमें घबराना कैसा. उत्सव मनाईये. :)

अच्छी रचना बन गई है.

 
At 7:56 PM, Blogger Laxmi N. Gupta said...

परमजीत जी एवं समीर जी,

धन्यवाद। ऐसी ही कृपा बनाए रखिए।

 

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