साजन बिन
साजन बिन मोरा जिया घबरात
बिजुरी चमकै आधी रात
घनन घनन बदरा घघरात
सुनत सुनत मोरा जिया दहलात
सनन सनन सन पवन सुनात
हालैं हमरे कोमल गात
कोऊ अकेले मां पूछै न बात
बैरी बने बादर बिजुरी वात
बालम का परदेसवा सुहात
का करूँ सजनी बनै कइसे बात
साजन बिन मोरा जिया घबरात
…लक्ष्मीनारायण गुप्त
…5 सितम्बर 2007




3 Comments:
अच्छा ्गीत है।बधाई\
अब जाकर तो कभी कभी ऐसे मौके आते हैं इसमें घबराना कैसा. उत्सव मनाईये. :)
अच्छी रचना बन गई है.
परमजीत जी एवं समीर जी,
धन्यवाद। ऐसी ही कृपा बनाए रखिए।
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